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संपादकीय / नोटबंदी के दो साल बाद कर आधार बढ़ने का दावा



dainik bhaskar editorial on demonetisation anniversary
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dainik bhaskar editorial on demonetisation anniversary

Dainik Bhaskar

Nov 09, 2018, 12:11 AM IST

नोटबंदी को दो साल पूरे होने पर सरकार ने उसे सही बताते हुए उसके फायदे गिनाए हैं वहीं विपक्ष ने फिर सरकार को चेताया है कि वह ऐसा दुस्साहस भरा कदम भविष्य में न उठाए। यह बहस चलनी चाहिए और इससे कम से कम भावना की बजाय तर्क पर आधारित चर्चा उठेगी और विवेक और तथ्य की बातें होंगी।

 

केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने नए संदर्भों में वह दलील पलट दी है, जिसमें कहा गया था कि नोटबंदी कालाधन और नकली नोटों को खत्म करने के साथ आतंकवाद और नक्सलवाद को कमजोर करने के लिए लाई गई है। जेटली ने अपनी फेसबुक पोस्ट पर लिखा है कि नोटबंदी का उद्‌देश्य बाजार में बिखरे नोटों को इकट्‌ठा करना था ही नहीं।

 

इरादा तो यह था कि अर्थव्यवस्था का कर प्राप्त करने का आधार बड़ा हो जाए और एक औपचारिक वातावरण निर्मित हो। जेटली ने दावा किया है कि नोटबंदी से प्रत्यक्ष कर का आधार तो बढ़ा ही है साथ में अप्रत्यक्ष कर के संग्रह में भी वृद्धि हुई है। अगर मई 2014 में आयकर दाताओं की संख्या 3.8 करोड़ थी तो अब वह 6.86 करोड़ हो गई है।

 

इसी प्रकार अप्रत्यक्ष कर संग्रह भी जीडीपी के 4.4 प्रतिशत से 5.4 प्रतिशत तक चला गया है। इससे कल्याणकारी योजनाएं चलाने के लिए सरकार को धन मिला है और वह जनता का भला कर रही है। जेटली ने यह भी दावा किया है कि इससे अर्थव्यवस्था नकदी से डिजिटल हुई है।

 

दूसरी ओर पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा है कि यह दुर्भाग्यपूर्ण कदम था और इसके जख्म अभी भी समाज और उसकी अर्थव्यवस्था पर पड़े हैं। डॉ. सिंह ने प्रमाण के तौर पर लघु और मझोले उद्यमों की स्थिति का उल्लेख किया है जो बुरी हालत में है।

 

उसी के कारण बाजार में नौकरियों का संकट है। डॉ. सिंह और जेटली की बहस में राजनीतिक पार्टीबंदी से इनकार नहीं किया जा सकता लेकिन, उसमें उन तथ्यों को नज़रंदाज नहीं किया जा सकता, जो नोटबंदी के दौरान दावे के रूप में आए और बाद में आंकड़ों के तौर पर प्रकट हुए।

 

डॉ. सिंह राजनेता से ज्यादा एक अर्थशास्त्री हैं और उन्हें नवउदारीकरण के कर्ताधर्ता के तौर पर हमेशा याद किया जाएगा। इसलिए इस आधार पर कि भाजपा और कांग्रेस की आर्थिक नीतियों में कोई सैद्धांतिक फर्क नहीं है, यह मानना पड़ेगा कि नोटबंदी जनता और अर्थव्यवस्था के लिए एक यातना देने वाला उपाय था।

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