संपादकीय / ऊर्जा के नौ स्तरों के मातृ रूपों की पूजा का पर्व है नवरात्र - डॉ. कपिल तिवारी



Dainik Bhaskar

Oct 10, 2018, 12:32 AM IST

भारतीय ज्ञान परंपरा में ‘लीला’ शब्द का सबसे पहला प्रयोग तांत्रिक साहित्य में हुआ है। उसमें कहा गया है कि यह जगत ‘शक्ति’ के संकोच और प्रसार की लीला है। इस अर्थ में सृष्टि शक्ति के विस्तार का जीवन रूप है, जिसकी अधिष्ठात्री भगवती पराम्बा हैं।

 

तांत्रिक शास्त्र के दोनों रूपों यानी शैवागम और शक्तागम में शिव-शक्ति आराधना के विविध रूप, पद्धतियां, अनुष्ठान और मंत्रों का विशाल संसार रचा गया है। शास्त्र और लोगों में शक्ति पूजा के जितने भी रूप आज प्रचलित हैं, वे तांत्रिकशास्त्र की विभिन्न विधियों के रूप ही हैं।

 

हमारा सौभाग्य है कि हम ऐसी परंपरा की विरासत में जन्मे जहां ईश्वर माता के रूप में भी है। इस जगत में माता के अनुग्रह और कृपा को समझने के लिए हर मनुष्य के पास एक छोटा ही सही वास्तविक अनुभव है। विराट मातृ सत्ता के प्रति हमारे समर्पण के लिए यही अनुभव द्वार बन सकता है। श्री दुर्गा के नौ रूपों की आराधना का क्रम ‘ऊर्जा’ के नौ विभिन्न स्तरों के मातृ रूपों की पूजा के ‘क्रम अनुष्ठान’ हैं। शक्ति अपने भौतिक, मानसिक और चेतनापूर्ण विस्तार में ‘ऊर्जा’ की एक विराट समष्टि हैं।

 

वास्तव में भौतिक का विस्तार ‘पदार्थमय जगत’ से लेकर ‘मन’ तक है। अपनी जागृत अवस्था में मन विचार में और निद्रा की स्थिति में कल्पना की शक्ति से स्वप्न में व्यस्त रहता है। मार्क्सवादी चिंतक लेनिन ने विचारों को भी भौतिक शक्ति क्यों कहा था और श्रीदुर्गा सप्तशती में शक्ति के एक रूप को ‘निद्रा रूप संस्थिता’ कहकर क्यों नमन किया गया है?

 

सुषुप्ति की अवस्था में मन होता है, लेकिन विचार और स्वप्न के रूप में मन की कोई क्रिया नहीं होती-चेतन, अवचेतन के बाद मनोवैज्ञानिकों ने इसे ही अचेतन मन कहा है। मनुष्य को अच्छी और गहरी नींद का सुख तब ही प्राप्त होता है, जब मन अक्रिया में, अचेतन में चला जाए।

 

स्थूल भौतिक पदार्थ की न्यूनतम चेतना से ‘प्राणमय’ पेड़-पौधों, सहज इच्छा से चालित प्राणियों और मनुष्य तक श्री शक्ति अपने चैतन्य के अंश से अस्मिता और स्वबोध की स्फूर्ति देती है। अब हम सहज ही समझ सकते हैं कि मातृशक्तियों की प्रथम आधारभूत ‘श्रीकाली’ और ‘श्रीदुर्गा’ की शक्ति कितनी विराट है।

 

देवत्रयी में श्री विष्णु सृष्टि के पालनकर्ता तथा काल के विभिन्न रूपाें में नारायण की शक्ति के अवतारी हैं-अवतार शिव अथवा ब्रह्मा के नहीं, विष्णु के ही होते हैं। पालने वाले ही त्राण से मुक्ति दिलाने वाले दशावतारी होते हैं। उनकी आद्य शक्ति श्री लक्ष्मी को धन धान्य और ऐश्वर्य की देवी कहा गया है।

 

घरों में स्त्रियां स्वयं लक्ष्मीरूपा मानी जाती हैं। वे सुंदर, सुरुचिपूर्ण वस्त्रालंकारों से सज्जित होकर लक्ष्मी की स्वस्ति अर्चना करती हैं। स्त्रियां परिवारों की जीवंत लक्ष्मी हैं, जिनसे परिवार बनते अौर कुल की गरिमा बढ़ती है। वे ही घरों की शालीन-शोभा हैं। 

 

श्रीलक्ष्मी की अनंत शक्तियों में श्रीशक्ति के साथ माया शक्ति भी जुड़ी है। माया अदभुत शब्द है। इसके अर्थ का विस्तार विस्मित कर देता है। शायद ही संसार की किसी भाषा में कोई ऐसा शब्द होगा, जो अर्थों की इतनी विशाल समष्टि लिए व्यवहार किया जाता हो।

 

यह अकेला शब्द है जिसके मर्म को चेतना जानती है, लेकिन भाषा शायद पूरा नहीं कह पाती। इस जगत में उनकी कृपा के सभी रूप मायाशक्ति के रूप हैं-धन, संपदा, ऐश्वर्य किसी के भी पास सदा के लिए नहीं हैं। पाना और खोना एक साथ चलता है। लेकिन मनुष्य कभी अपनी समग्रता में उसे देख नहीं पाते। जो पाने में भी उसका खोना देख लें, वे उसके पार चले जाते हैं। यह सदविवेक भी श्रीलक्ष्मी की कृपा है। बिरले ही यह वरदान पाते हैं।

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