संपादकीय / आम चुनाव के बीच चुनाव आयोग की साख पर सवाल



dainik bhaskar editorial on Question of credentials of EC
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dainik bhaskar editorial on Question of credentials of EC

Dainik Bhaskar

Apr 10, 2019, 01:04 AM IST

देश में शीर्ष पदों पर काम कर चुके साठ से अधिक पूर्व नौकरशाहों ने जब राष्ट्रपति को पत्र लिखकर यह चिंता जाहिर की कि भारतीय निर्वाचन आयोग नामक संवैधानिक संस्था विश्वसनीयता के संकट से गुजर रही है, तो यह पूरे देश की चिंता की ही अभिव्यक्ति है।

 

इन नौकरशाहों ने चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन के उदाहरण देते हुए एंटी सैटेलाइट मिसाइल के सफल परीक्षण की प्रधानमंत्री द्वारा की गई घोषणा, जल्दी ही रिलीज होने वाली प्रधानमंत्री पर बनी बायोपिक, उन पर बनी वेब सीरीज, नमो टीवी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा भारतीय सेना को मोदी की सेना बताने और राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह द्वारा भारतीय जनता पार्टी व प्रधानमंत्री मोदी की जीत की इच्छा जाहिर करने जैसे कई उदाहरण दिए हैं, जिसमें चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन होता प्रतीत होता है।

 

हालांकि, स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव के लिए जिम्मेदार निर्वाचन आयोग ने नोटिस जारी करने से आगे कोई कार्रवाई नहीं की है। हाल ही में आयकर व अन्य एजेंसियों द्वारा की गई छापे की कार्रवाई पर भी चुनाव आयोग ने वित्त मंत्रालय को सिर्फ ‘कड़ी सलाह’ देते हुए कहा है कि चुनाव के दौरान ऐसी कार्रवाई ‘निष्पक्ष’ और ‘भेदभावरहित’ होनी चाहिए। गौरतलब है कि मुख्य चुनाव आयुक्त संवैधानिक पद है और कार्यकाल के छह साल या 65 वर्ष की आयु पूरी होने के पहले उसे हटाया नहीं जा सकता और न उसकी सलाह के बिना अन्य किसी चुनाव आयुक्त अथवा क्षेत्रीय आयुक्तों को हटाया जा सकता है।

 

संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत के साथ प्रस्ताव पारित होने के आधार पर ही राष्ट्रपति उन्हें हटा सकते हैं। राजनीतिक दलों को आचार संहिता की पटरी पर रखने के लिए इतना संवैधानिक संरक्षण काफी होना चाहिए। फिर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन का कार्यकाल इस बात का उदाहरण है कि आयोग किस तरह अपना प्रभुत्व कायम कर सकता है, जबकि बूथ कैप्चरिंग जैसी आपराधिक चुनौतियां अब उतनी गंभीर नहीं रही है, जैसी शेषन के समय थी।

 

चुनाव आयोग से संबंधी संवैधानिक प्रावधानों में जो खामिया बताई जाती हैं उसमें एक है रिटायर्ड चुनाव आयुक्तों पर कोई सरकारी पद ग्रहण करने पर रोक न लगाना। क्या अब इसका वक्त आ गया है? चुनाव अायोग के लिए भी यह आत्मपरीक्षण का वक्त है कि वह अपनी साख कायम रखने के लिए क्या कर सकता है।

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