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सेकंड आर्टिकल / फ्रांस में भारतीय सैनिकों का स्मारक और दुनिया को महायुद्ध का सबक



dainik bhaskar second article on current issue
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Dainik Bhaskar

Nov 09, 2018, 12:22 AM IST

साठ से भी ज्यादा राष्ट्राध्यक्ष एकत्र होकर सहयोगी राष्ट्रों और जर्मनी के बीच हुए प्रथम विश्वयुद्ध के खत्म होने का शताब्दी समारोह मनाएंगे। उस भीषण युद्ध के सौ साल बाद जर्मनी की चांसलर एंगेला मर्केल भी आर्मिस्टिस (युद्धविराम) जश्न में शामिल होंगी, क्योंकि आज कोई विजयी या पराजित राष्ट्र नहीं है।

 

भारत सहित पूरी दुनिया को 1914 से 1918 के बीच बहुत कुछ भुगतना पड़ा। किस बात के लिए? इस बारे में कोई कुछ नहीं बता सकता। फ्रांसीसी दैनिक ले फिगोरो ने इस विरोधाभास की कुछ ऐसी व्याख्या की है : ‘इस समारोह का अर्थ है अपने विकल्प चुनना।’

 

फ्रेंच राष्ट्रपति एमेन्युएल मैक्रां महायुद्ध के स्थलों की  एक हफ्ते की ‘मेमोरियल एंड टेरिटोरियल जर्नी’ पर जाएंगे। फ्रांसीसियों के लिए कई कार्यक्रम जीत के जश्न से बढ़कर और भी कुछ हैं। इसमें तीन संदेश हैं। एक, ‘पोइलस’ (दाढ़ी न बनाए हुए) को याद करना, जैसाकि फ्रांसीसी सैनिकों को महायुद्ध के दौरान कहा जाता था, खुद को पुननिर्मित करने की एक राष्ट्र के रूप में फ्रांस की क्षमता का जश्न मनाना और शायद सबसे महत्वपूर्ण संदेश है ‘नई बहुपक्षीयता’ को बढ़ावा देना। 

 

पेरिस में 11 नवंबर को जर्मनी सहित उन सब देशों के वहां मौजूद प्रतिनिधि -जिन्होंने महायुद्ध में भाग लिया- इसी बहुलता को चुनने के प्रतीक होंगे। फ्रांस ने भारतीय योगदान को नहीं भुलाया है। पेरिस ने हाल ही में ‘इंडियन मिलिटरी मैमोरियल’ का निर्माण करने के लिए उत्तरी फ्रांस के विलेर गिस्लां में जमीन दी है। स्मारक में कांसे का अशोक चिह्न और युद्ध में शहीद हुए सैनिकों के लिए प्रशस्ति-स्तंभ है।

 

फ्रांस और बेल्जियम में सिख और गोरखाओं सहित 1.30 लाख भारतीय सैनिकों ने उस महायुद्ध में लड़ाई लड़ी, जिसमें 90 लाख लोग मारे गए। इनमें से एक-चौथाई भारतीय सैनिक कभी स्वदेश नहीं लौटे। मार्च 2015 में फ्रांस के नव-शपेल की लड़ाई में सिख रेजीमेंट के 80 फीसदी सैनिक शहीद हुए।

 

कुछ वर्षों पहले एक सैन्य इतिहासकार डेविड ओमिसी ने ‘इंडियन वॉइसेस ऑफ द ग्रेट वॉर : सोल्जर्स लेटर्स, 1914-18’ लिखी थी। भारतीय सैनिकों द्वारा परिवारों को भेजे ये पत्र गहराई तक छूते हैं। भारतीय सैनिकों की यूरोप की यह पहली यात्रा थी (और कई के लिए तो अंतिम भी रही)। फ्रांस में आने के बाद एक भारतीय सैनिक ने अपने परिवार को लिखा- ‘पेरिस क्या है। यह तो स्वर्ग है!’ जल्द ही उसे पता लग गया कि मोर्चे की खंदकें तो नर्क है।

 

7 अक्टूबर 1927 को ही फ्रांस ने महायुद्ध में भारत के योगदान को अधिकृत रूप से मान्य किया था। सहयोगी देशों की सेनाओं के कमांडर-इन-चीफ मार्शल फर्डिनेंड फोच ने भारतीय सैनिकों को भावपूर्व श्रद्धांजलि अर्पित की थी। तब भारतीय सैनिकों के सामने स्पष्ट नहीं था कि वे किस उद्‌देश्य के लिए इतनी बहादुरी से लड़े।

 

क्या अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में यह एक सबक नहीं है : आज जर्मनी और फ्रांस गहरे मित्र हैं और मिलकर यूरोप का निर्माण करने का प्रयास कर रहे हैं। कोई संदेह नहीं कि यह बेहतर रास्ता है। (क्लाड अर्पी, फ्रांसीसी मूल के इतिहासकार व विदेश मामलों के विशेषज्ञ )

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