संपादकीय / चुनाव आचार संहिता पर पुनर्विचार समय की मांग



Demand for reconsideration time on Election Code of Conduct
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Demand for reconsideration time on Election Code of Conduct

Dainik Bhaskar

Apr 17, 2019, 10:29 PM IST

तमिलनाडु में द्रमुक प्रत्याशी के सीमेंट गोदाम से 11.48 करोड़ रुपए बरामद होने के बाद वेल्लोर लोकसभा का चुनाव रद्द करने का फैसला निष्पक्ष, स्वच्छ एवं पारदर्शी चुनाव की दृष्टि से अनुकरणीय फैसला है। चुनाव आयोग को देश के भविष्य को निर्धारित करने वाले लोकसभा जैसे महत्वपूर्ण चुनाव में कम से कम यह सुनिश्चित करना ही चाहिए कि इसे हर हाल में बिना मतदाताओं को प्रलोभन दिए कैसे संपादित किया जा सकता है।

 

चुनाव में नेताओं की भाषा, धर्म, जाति का प्रचार जैसे मुद्दों पर भी और ज्यादा सख्त फैसले लेने चाहिए। केवल चुनाव जीतने के लिए नेता किस-किस तरह के हथकंडे अपना रहे हैं। कोई धन का दुरुपयोग कर रहा है, तो कोई किसी को धमका रहा है। जोधपुर संसदीय सीट से चुनाव लड़ रहे भाजपा प्रत्याशी ने भरी चुनावी सभा में राज्य के अधिकारियों को धमकाते हुए कह दिया कि हमारी सरकार आई तो अफसरों को उल्टा लटका दूंगा। इधर, कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू ने मुसलमानों से कहा, ‘वे एकजुट हो जाएं तो कांग्रेस की जीत पक्की है।’ मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए इस प्रकार के हथकंडे बर्दाश्त नहीं किए जाने चाहिए।

 

ऐसे ही मामलों में चुनाव आयोग ने मेनका गांधी, योगी आदित्यनाथ, बसपा प्रमुख मायावती और सपा नेता आजम खान को 48 से 72 घंटे तक चुनाव प्रचार के लिए बैन किया। यह फैसला निष्पक्ष चुनाव की दिशा में एक कदम हो सकता है, लेकिन इससे नेताओं की जुबान सुधरने वाली नहीं है। समय की मांग है कि चुनाव आयोग को अपनी आचार संहिता पर पुनर्विचार करना चाहिए। मौजूदा आचार संहिता की अहमियत नेताओं और पार्टियों की नज़र में एक दस्तावेज से ज्यादा नहीं है।

 

हर पार्टी, हर नेता चुनाव के कानून, कायदों का कोई न कोई तोड़ निकाल ही लेते हैं। जहां तक चुनाव खर्च का सवाल है, एक भी ऐसा चुनाव नहीं होगा जो खर्च की गाइडलाइन का पालन करता हो। चुनाव आयोग को इस लोकसभा चुनाव में मिली शिकायतों का अध्ययन करने के बाद आगे के लिए सख्त और प्रभावी संहिता बनानी चाहिए। जब तक चुनाव आयोग रस्म अदायगी जैसे फैसले लेगा, नेताओं के मन में नियम के विरुद्ध बोलने, आचार संहिता तोड़ने जैसे काम करने का कोई खौफ नहीं रहेगा। पारदर्शी चुनाव के लिए करोड़ों मतदाताओं की आखिरी उम्मीद चुनाव आयोग ही है। ऐसे में शिकायतों का निपटारा सख्त फैसलों से ही होना चाहिए।

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