संपादकीय / उमस के इस दौर में मानसून के बिना मन सूना-सूना



editorial on Delay of monsoon
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editorial on Delay of monsoon

Dainik Bhaskar

Jun 24, 2019, 10:19 PM IST

बारिश सिर पर है और सूरज ज़िद पर अड़ा है। उमस का दौर है। जैसे गर्मी में धूल उड़ती है, वैसे ही बारिश की खबरें यहां वहां से आ रही हैं। किसान बारिश की उम्मीद पाले बैठा है और केंन्द्र सरकार के सालाना छह हजार रुपए वाला फॉर्म भरकर तसल्ली पा रहा है। पटवारी, तहसीलदारों को योजना के बारे में ज्यादा कुछ अता-पता नहीं है इसलिए धूल में लट्ठ चला रहे हैं। जो इन्कम टैक्स दे रहा है, उससे भी कह रहे हैं कि फॉर्म तो भरो, देखते हैं।

 

मिलेगा कि नहीं, इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है। न पटवारी के पास। न तहसीलदार के पास। बहरहाल, मौसम बदलने को है, लेकिन बदल नहीं रहा। बिहार सरकार के मंत्री ही सही हैं तो कम से कम बारिश आने के बाद मुजफ्फरपुर में बच्चों की मौत तो रुक ही जाएगी। मुजफ्फरपुर से याद आता है कि देशभर में ही अब लीची की खपत कम हो गई है। लोग डर के मारे खरीद भी नहीं रहे हैं और खा भी नहीं रहे हैं। ऊंचे भाव वाली लीची को मुजफ्फरपुर ने जमीन दिखा दी है। कोई नहीं पूछ रहा है उसे। वैसे असल कारण लीची नहीं है। भूख है।

 

दरअसल, लीची शरीर का पानी सुखा देती है। भूखे बच्चे लीची खाते हैं, जो बिहार में खूब पैदा होती है। पानी सूखता है और वे इस बीमारी की चपेट में आ जाते हैं। जहां तक बात मानसून की हो तो मन में ठंडक बरसने लगती है। ठंडक माहौल में भी घुल चुकी है लेकिन वैसी नहीं जैसी मानसून के बाद घुलती है। अभी पंद्रह दिन पहले की ही बात है, पारा 46 डिग्री से भी ऊपर था और लोग त्रहिमाम् कर रहे थे। उस दौर से तो राहत मिल चुकी है पर बूंदाबांदी से काम चलने वाला नहीं है। झमाझम बारिश जो चाहिए, वह अभी दूर की कौड़ी नज़र आ रही है। कोई कहता है इस महीने के आखिरी तक मानसून आ ही जाएगा। सुनकर मन को तसल्ली भी होती है लेकिन, मानसून है कि आ ही नहीं रहा।  

 

फिलहाल मानसून बादलों की कोख में है और धरती की दाई अर्ज़ कर रही है कि बादल कभी भी बांझ न हों। कभी न कभी बरसें जरूर। गलियों की धूल, आस- पास की जमी हुई गर्द बादलों को पुकार रही है कि आइए! हमारा कल्याण कीजिए। बादल हैं कि किसी की नहीं सुन रहे। मन बादलों की तरह भारी हुआ जा रहा है। ग़म से भरा है। तम से भरा है। हृदय से हृदय को तौला जा रहा है, लेकिन बरस कोई नहीं रहा। न बादल। न मन।

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