सेकंड आर्टिकल / स्वदेशी टेक्नोलॉजी से बनी है इंजन रहित सेमी हाई स्पीड ट्रेन



Engineless semi high speed train made of indian technology
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Engineless semi high speed train made of indian technology

  • इंजन रहित सेमी हाई स्पीड ट्रेन को बनाने में स्वदेशी टेक्नोलॉजी से बनाया गया है

Dainik Bhaskar

Oct 31, 2018, 11:46 PM IST

विजय दत्त . गत सोमवार को चेन्नई की इंटिग्रल कोच फैक्ट्री से देश की पहली इंजन रहित सेमी हाई स्पीड ट्रेन ‘ट्रेन 18’ बाहर निकली जो अंतत: शताब्दी एक्सप्रेस की जगह लेगी। इसे बिना इंजन वाली पहली ट्रेन कहा जा रहा है पर यह वही टेक्नोलॉजी है, जो सारी मेट्रो ट्रेनों और उपनगरीय ईएमयू ट्रेनों में इस्तेमाल हो रही है। नया यह है कि टेक्नोलॉजी का विस्तार सेमी हाई स्पीड और हाई स्पीड ट्रेनों में किया गया है।

यह सुधार भारत में बहुत समय से अपेक्षित था।


खास बात यह है कि ट्रेन पूरी तरह स्वदेशी टेक्नोलॉजी से बनाई गई है, जिससे लागत में 40 फीसदी की बचत हुई, जिसका फायदा मेट्रो ट्रेन को भी स्वदेशीकरण व लागत घटाने में मिलेगा। भारत इस टेक्नोलॉजी का निर्यातक भी बन सकता है। बुलेट ट्रेनों का स्वदेशीकरण भी तीव्र होगा। अब दिल्ली-मुंबई और दिल्ली-कोलकाता एक रात की यात्रा होगी। शताब्दी जैसी लोको हॉल्ड ट्रेनों में लगने वाले झटकों से भी मुक्ति मिल जाएगी।

चूंकि यह कम जगह घेरती है, इसलिए 24 की जगह 26 कोच चलाए जा सकेंगे और ट्रैक, सिग्नलिंग और अन्य असेट पर कोई निवेश भी नहीं करना होगा। यात्री वहन क्षमता आठ फीसदी बढ़ जाएगी। लेकिन, यह तो शुरुआत है। जल्द ही अगला संस्करण ट्रेन 2020 आएगा।

इस समय पूरी दुनिया में ट्रेनों में एल्यूमिनियम बॉडी वाले कोच होते हैं। इससे प्रति कोच छह टन वजन कम होता है और 10 फीसदी ऊर्जा की बचत होती है। यात्री क्षमता तो खैर बढ़ती ही है। भारत ट्रांसपोर्ट में इस एल्यूमिनियम क्रांति को चूक गया, जो ऊर्जा की जबर्दस्त मांग वाले इस देशपर बहुत भारी पड़ रही है। कैनेडियन पेसिफिक में 80 फीसदी वैगन स्टॉक एल्यूमिनियम एलॉय के हैं, जिससे 10 फीसदी से भी ज्यादा ऊर्जा की बचत होती है।

भारतीय रेल अपने लगभग हर वैगन स्टॉक में पुरानी शैली के फौलाद का इस्तेमाल कर रही है। सारी हाई और सेमी हाई स्पीड ट्रेन व वॉशिंगटन मेट्रो जैसी मेट्रो में पिछले तीस साल से अधिक समय से एल्यूमिनियम इस्तेमाल हो रहा है। यहां तक कि दिल्ली एयरपोर्ट के लाइन कोच भी एल्यूमिनियम के हैं।

लोकोमोटिव शेल के लिए टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की बजाय हमारी इंडस्ट्री की मदद लेना बेहतर होगा जैसा कि अभी किया जाता है। दुनिया में एल्यूमिनियम एलॉय की वेल्डिंग और संबंधित टेक्नोलॉजी में बहुत तेजी से सुधार हो रहा है। निकट भविष्य में स्कैंडियम आधािरत सीरीज 7000 का अलॉय और फ्रिक्शन स्वर्ल जैसी वेल्डिंग टेक्नोलॉजी इस्तेमाल होने लगेगी। एल्यूमिनियम फोम जैसा नया मटेरियल अा रहा है।

इसलिए ट्रक, बस और कार में भी एल्यूमिनियम लाना चाहिए। शुरुआत में सिर्फ एल्यूमिनियम वेल्डिंग जैसे कुछ कम्पोनेंट लाने होंगे। इसलिए इंडस्ट्री की मदद लेने से  विभिन्न सेक्टरों के संसाधनों का अधिकतम उपयोग व टेक्नोलॉजी का समय पर अपडेशन सुनिश्चित हो सकेगा। इससे मिशन इलेक्ट्रिक मोबिलिटी ऑन रोड्स में बहुत मदद मिलेगी। (लेखक रेलवे बोर्ड के पूर्व सदस्य )
 

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