संदर्भ / खैरात बांटना चुनाव में जीत की गारंटी नहीं

शेखर गुप्ता

शेखर गुप्ता

Dec 10, 2018, 10:41 PM IST



Government schemes do not guarantee victory in elections
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Government schemes do not guarantee victory in elections
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  • तेलंगाना में लोगों को मुफ्त में बहुत कुछ देने के बाद भी केसीआर को और भी कुछ करना पड़ा

इससे पहले कि आप तेलंगाना और उसकी राजधानी हैदराबाद में ‘दीवारों पर लिखी इबारत’ पढ़ें, आपको दीवारों के रंग पर ध्यान देना चाहिए। मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव (केसीआर) और उनकी पार्टी टीआरएस ने पूरे प्रदेश को गुलाबी रंग में रंग दिया था।

 

मैंने कभी किसी एक दल का दृश्य प्रचार पर ऐसा प्रभुत्व नहीं देखा। गुजरात में भाजपा और कांग्रेस के बीच इसका अनुपात 20:1 का था। तेलंगाना में यह 90:1 रहा। मैंने जब अपनी खिड़की से देखा तो मुझे सात विशाल होर्डिंग दिखे जो केसीआर और टीआरएस के थे। अकेले राजधानी में ऐसे 698 होर्डिंग थे। 


यह ऐसा दुर्लभ चुनाव रहा, जिसमें सत्ताधारी दल ने पूरी तरह अपने पिछले प्रदर्शन के बल पर चुनाव लड़ा है। उन्होंने नए वादे भी नहीं किए केवल दीवारें रंगकर खैरात बांटकर और कल्याणकारी कार्यक्रमों के जरिये जो भी किया उसका बखान किया। कहीं घाटा बेकाबू तो नहीं हो रहा है?

 

यह पूछो तो उनका जवाब होता, ‘सब बकवास है। कैसा घाटा?’ प्रोफेसर केसीआर ने अर्थशास्त्र पर ज्ञान देते हुए कहा- ‘दुनिया में सबसे ज्यादा घाटे वाला देश कौन-सा है, अमेरिका? फिर जापान और चीन। लोगों को कुछ पता नहीं होता..बातें करते हैं।’ तमिलनाडु ने खैरात बांटने की राजनीति शुरू की खासतौर पर जयललिता ने।

 

केसीआर उसे अगले स्तर पर ले गए। राजस्थान में 2008-13 के दौरान कांग्रेस की सरकार को बाड़मेर के केयर्न तेल क्षेत्र के कारण कच्चे तेल की भारी रॉयल्टी मिली। वह चुनाव मुफ्त उपहारों की प्रयोगशाला बना, जिसमें सोनिया गांधी और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की सारी कल्पनाओं को साकार किया गया। लेकिन, मतदाताओं ने अशोक गहलोत की कांग्रेस सरकार को 200 सदस्यों वाली विधानसभा में 163-21 से सत्ता से बाहर कर दिया।

 

जयललिता की दोबारा जीत का श्रेय उन कार्यक्रमों को दिया गया, जिनके तहत वे मंगलसूत्र, मिक्सर-ग्राइंडर जैसी तमाम चीजें बांट रही थीं। परंतु हकीकत यह थी कि 13 प्रतिशत वोट उनसे दूर हुए थे और विपक्ष के वोट बंटे नहीं होते तो वे हार जातीं। इसलिए अभी यह सिद्ध नहीं हुआ है कि खैरात बांटना वोट पाने का पक्का तरीका है। लेकिन, यह बात केसीआर से मत कहिए। उन्हें दो बातों पर गर्व हैं- कार्यक्रम अमल में लाने का रिकॉर्ड और कल्पनाशीलता।

 
राज्य में युवतियों को उनके विवाह पर उपहार में एक लाख रुपए दिए जा रहे हैं। मुस्लिम युवतियों के लिए इसे ‘शादी मुबारक’ का नाम दिया गया है, जबकि बाकी के लिए ‘कल्याण लक्ष्मी।’ गरीबों के लिए दो बेडरूम वाले घर की योजना है, जिसका नाम ही ‘2 बीएचके योजना’ है। वे अपने पहले कार्यकाल में एेसे पांच लाख मकान बनवा रहे हैं।

 

मोदी की प्रधानमंत्री आवास योजना के बारे में पूछो तो कहते हैं- ‘बेकार स्कीम है। मोदी जो एक कमरे का मकान दे रहे हैं उनमें महिलाएं कहां कपड़े बदलेंगी?’ क्या 7.50 लाख रुपए में 2 बीएचके संभव है? कुछ इनोवेशन भी हैं। वे सरकारी जमीन दे रहे हैं, सीमेंट पर टैक्स माफ है, रेत मुफ्त है, थर्मल पॉवर प्लांट से सब्सिडी पर दी जा रही फ्लाई एश से ईंटें बनाई जा रही हैं।

 

प्रधानमंत्री आवास योजना के 1.50 लाख रुपए भी इसमें मिला दिए हैं। ये मुंबई के झुग्गी पुनर्वास के तहत बनाए घरों से बहुत अच्छे है। कुछ अन्य अच्छी-बुरी योजनाएं और भी हैं। उन्होंने अच्छे, मुफ्त सरकारी अस्पताल बनाए हैं। गर्भवती महिलाओं को लाने- ले जाने के लिए मुफ्त एंबुलेंस सुविधा है। घर लौटने वाली हर महिला व नवजात को एक सूटकेस दिया जाता है, जिसमें कपड़े, नवजात के काम की चीजें होती हैं। इसे केसीआर किट कहते हैं, जिस पर उनका बड़ा-सा चित्र होता है। 


लेकिन ‘रैयतु बंधु’ (किसान मित्र) योजना का खुले दिमाग से परिक्षण करने की जरूरत है। खेती का संकट राष्ट्रीय समस्या है और सब्सिडी से लेकर न्यूनतम समर्थन मूल्य तक हर कदम नाकाम रहा है। तेलंगाना किसान को हर फसल पर प्रति एकड़ 4 हजार रुपए देता है। फिर जमीन का आकार कुछ भी क्यों न हो। पिछले साल योजना पर 12,000 करोड़ रुपए खर्च हुए।

 

सौ एकड़ या इससे ज्यादा जमीन वाले धनी किसानों ने भी इसका फायदा उठाया है, जिसकी बहुत आलोचना हुई। आंकड़े अलग कहानी बताते हैं। 58.3 लाख लोगों को फायदा मिला (3.5 करोड़ की आबादी में यह बड़ी संख्या है), जिनमें सिर्फ 14,900 के पास 50 एकड़ या इससे ज्यादा जमीन है। सिर्फ 1.15 लाख यानी फायदा लेने वालों का 2 फीसदी से कम के पास 10 एकड़ से ज्यादा जमीन है।

 

इसलिए योजना में दम तो है पर क्या आप खर्च उठा सकते हैं? केसीआर तो शायद जवाब में बकवास ही कहेंगे। केसीआरोनॉमिक्स में सबके लिए कुछ न कुछ है।  सवाल यही है कि क्या लोग इसके बदले वोट देते हैं? खैराती राजनीति के घर तमिलनाडु में चुनाव में ज्यादातर सरकारें बदल दी जाती हैं। पंजाब में आटा-दाल  योजना के साथ मुफ्त बिजली आदि -जिनके कारण राज्य दिवालिया हो गया- के बावजूद अकाली-भाजपा गठबंधन हार गया।


जिन राज्यों में मुख्यमंत्री बार-बार चुने जाते हैं वे खैरात बांटने के चैम्पियन नहीं हैं : गुजरात, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल। कर्नाटक में कांग्रेस के सिद्धारमैया ने जयललिता शैली में खूब खैरात बांटी पर भाजपा को मात नहीं दे पाए। छत्तीसगढ़ में जरूर कह सकते हैं कि लगभग मुफ्त चावल देने की योजना से रमन सिंह दो बार चुनाव जीते।

 

मतदाता चतुर हैं। उन्हें मालूम है कि एक बार मुफ्त में कुछ मिला तो उसे वापस नहीं लिया जा सकता। नरेन्द्र मोदी मनरेगा की बहुत आलोचना करते थे पर सत्ता में आकर वे इसे और पैसा देते रहे हैं। लोगों को प्रतिद्वंद्वी से और अधिक की अपेक्षा होती है। भाजपा ने यहां मुफ्त गायें देने का वादा किया।

 

अब खैरात से ज्यादा कुछ चाहिए: पहचान, राज्यों की आपसी प्रतिद्वंद्विता, धर्म, राष्ट्रवाद और प्रदेश के चुनाव में उपराष्ट्रवाद। इसके साथ हम फिर तेलंगाना आ जाते हैं। नुक्कड़ सभाओं  में केसीआर के पुत्र और हैदराबाद के परेड ग्राउंड पर विशाल आम सभा में केसीआर को हमने मुट्ठी तानकर ‘जय...’ कहते देखा और लोगों ने जोर से…‘तेलंगाना’ का नारा लगाया।

 

अब ‘जय तेलंगाना’ का नारा आंध्र के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के सहयोगी महाकुटमी के मंच से उतनी ताकत से नहीं लगाया जा सकता था। सिर्फ खैरात बांटने से संभव है केसीआर को दूसरा कार्यकाल न मिले लेकिन, तेलंगाना गौरव की भावना के साथ वे ज्यादा मजबूत नज़र आए। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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