मंडे पॉजिटिव / आतंक, कर्फ्यू व गरीबी के साए में कड़ी मेहनत से पाई मंजिल

Dainik Bhaskar

May 27, 2019, 10:21 AM IST



Hard-to-ground floor with panic, curfew and poverty
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Hard-to-ground floor with panic, curfew and poverty
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  • गांव के लड़कों के साथ गलियों में खेला क्रिकेट, कश्मीर में सुविधाएं नहीं मिलीं तो पंजाब जाकर महिला आईपीएल में बनाई जगह

मेरा जन्म शोपियां जिले (कश्मीर) के बरारीपुरा गांव में हुआ। पांच भाई-बहनों में मैं सबसे बड़ी हूं। बचपन से ही क्रिकेट के प्रति मेरी दीवानगी थी। लड़कों को क्रिकेट खेलते देखकर मैं भी खेलना चाहती थी। एक बार कुछ लड़के क्रिकेट खेलने टोली बनाकर निकले तो मैं भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ी। मैंने उनसे पूछा किं मैं भी खेल सकती हूं क्या? तो उन्होंने बल्ला थमा दिया। उसंबके बाद आज तक मैंने बल्ला नहीं छोड़ा है। स्कूल से आकर मैं गांव की गलियों में लड़कों के साथ क्रिकेट खेलने लगी। जब छोटी थी तो मुझ पर किसी ने गौर नहीं किया।

 

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सब चल जाता था, लेकिन बड़ी हुई तो लोगों की सवालिया निगाहें बल्ला थामे लड़की पर उठने लगीं। चूंकि पिता गुल मोहम्मद वानी मेरा सपोर्ट कर रहे थे, इसलिए कोई कुछ बोल नहीं पाता था। यह वह समय था जब लड़कियां घर से बाहर निकलती नहीं थीं। उन्हें पांचवीं, आठवीं से आगे पढ़ाया नहीं जाता था और जल्दी हाथ पीले कर दिए जाते थे। उस समय मेरे जिले में आतंक चरम पर था। महीने में 20 दिन हम कर्फ्यू के साए में रहते थे। परिवार चलाने के लिए पिता को  अपने सेब के छोटे से बाग में  कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी। कर्फ्यू के कारण कई-कई दिन पिता काम नहीं कर पाते थे तो हमारी फांके करने की नौबत आ जाती थी। ऐसी स्थिति में भी पिता मजबूती से मेरे साथ खड़े रहे, वे कहते थे कि अपना ध्यान क्रिकेट से मत हटाओ। 


क्रिकेट के नए गुर सीखने के लिए मैं यू-ट्यूब पर वीडियो देखने लगी और सचिन तेंदुलकर को अपना आदर्श बना लिया। 2003 से 2006 के बीच मैंने अपने राज्य के लिए अंडर-13, अंडर-14, अंडर-15 और अंडर-16 की टीम में क्रिकेट खेलकर झंडे गाड़े। स्कूल टीम की ओर से 2005 में हम लोग मध्य प्रदेश के भोपाल में टूर्नामेंट खेलने गए थे, उसमें हमने मध्य प्रदेश की टीम को हरा दिया। मैं खासतौर पर बताना चाहती हूं कि हमारे राज्य में शाम 6 बजे बाद परिवहन बंद हो जाता है। आप कहीं फंस गए तो अगली सुबह ही बस या अन्य साधन मिलेगा, ऐसे माहौल में प्रैक्टिस के लिए मुझे शोपियां से श्रीनगर जाना-आना पड़ता था। कई बार प्रैक्टिस नहीं कर पाती थी। 12वीं के बाद पढ़ने और प्रोफेशनल क्रिकेट खेलने के लिए भी यहां कोई सुविधा नहीं थी। मेरी छोटी बहन को एक गंभीर बीमारी थी, उसके इलाज के खर्च के कारण हमारी खस्ता हालत और खस्ता हो गई थी।

 

इसलिए मैंने 2005 में क्रिकेट खेलना छोड़ दिया। कुछ वर्ष बाद मेरे टीचर खालिद हुसैन घर आए और कहने लगे कि तुम्हें दोबारा क्रिकेट खेलना चाहिए। तुम पैसों की चिंता मत करो और खेल पर ध्यान दो। यह सुनकर मैं उत्साह से भर गई और पांच वर्ष के गेप के बाद अपना पहला मैच 2012 में जम्मू क्रिकेट एसोसिएशन (जेकेसीए) के लिए खेलते हुए 65 रन बनाकर टीम को जिताया। जेकेसीए के लिए एक वर्ष खेला, लेकिन सरकार के पास न पैसा था न संसाधन थे। मुझे एहसास हो गया कि आगे क्रिकेट खेलना जारी रखना है तो जम्मू-कश्मीर छोड़ना होगा। बिगड़ती कानून-व्यवस्था के साथ सुविधा विहीन इस राज्य ने खिलाड़ियों के लिए रास्ते बंद कर रखे थे। उधर, मैंने सुना था कि पंजाब में एक सीजन में खिलाड़ियों के लिए चार कैंप लगते हैं। मैंने 2013 में पंजाब की महिला डिस्ट्रिक्ट टीम की तरफ से खेलते हुए डबल सेंचुरी मारी थी। इसके बाद सभी संबंधित लोगों का मुझे पर ध्यान गया। इंटर यूनिवर्सिटी क्रिकेट टूर्नामेंट के दौरान मेरी मुलाकात गुरु नानकदेव यूनिवर्सिटी के क्रिकेट कोच रणजीत सिंह से हुई।

 

मेरा खेल देखकर वे बोले अमृतसर आ जाइए, वहां आपको सही दिशा के साथ सुविधाएं भी मिलेंगी। घर की दयनीय हालत मुझे पता थी, इसके बावजूद पिता ने अमृतसर में रहने की अनुमति दे दी। राज्यस्तर पर लगातार मेरा प्रदर्शन श्रेष्ठ रहा, लेकिन कश्मीर सरकार से कभी आर्थिक मदद नहीं मिली। पिता दिन-रात मजदूरी करके पैसा जमा करने लगे ताकि मैं पंजाब में प्रैक्टिस जारी रख सकूं। पिता और मेरी मेहनत रंग लाई और मेरा चयन पंजाब महिला क्रिकेट टीम में हो गया। यहीं से मेरे प्रोफेशनल क्रिकेट की शुरुआत हुई। 2018 में हुए महिला टी-20 टूर्नामेंट में मैं 355 रनों के साथ तीसरी श्रेष्ठ खिलाड़ी रही। इसी वर्ष मुझे राष्ट्रीय महिला क्रिकेट टीम के कैंप के लिए चुना गया। अप्रैल में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड से फोन आया कि ‘सीनियर वीमैन चैलेंचर ट्रॉफी वन-डे टूर्नामेंट-2019’ (IPL) में मेरा चयन हो गया है। 2 मई को मुझे ज्वाइन करना है। मेरे लिए यह बड़ी उपलब्धि थी। मैंने ‘इंडिया रेड’ के लिए खेला था। यह खबर सुनकर खुशी से पिता के आंसू नहीं रुक रहे थे। उन्होंने मिठाई बांटी। मेरे गांव में पूरे दिन बिजली गुल रहती है, ऐसे में मेरा मैच देखने के लिए लोग फोन चार्ज रखकर नेट बैलेंस बचाकर रखते थे। इन सबके साथ कुछ ऐसे लोग भी हैं जो आज भी मेरे पीछे कड़वा बोलते हैं। मेरे परिवार से कहते हैं कि लड़की को इस तरह आज़ादी मत दो। यह हमारे कल्चर के खिलाफ है, इसकी शादी करवा दो।


मीडिया में कई बार सुनती रहती हूं कि शोपियां में एक मजदूर की लड़की कश्मीर की एकमात्र महिला क्रिकेट खिलाड़ी है और अब वह पंजाब महिला क्रिकेट टीम की ओर से खेल रही है, तो बहुत सुकून मिलता है। खुदा ने मेरी और पिता की मेहनत का इतना अच्छा इनाम दिया है। कश्मीर में बहुत प्रतिभाएं हैं, लेकिन सुविधाएं न होने वे निखर नहीं पाती हैं। मेरी कोशिश यही रहेगी कि जिस बच्चे में हुनर है, उसे मैं सबसे पहले कश्मीर से बाहर निकालूं।
(जैसा उन्होंने दैनिक भास्कर को बताया)

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