--Advertisement--

संदर्भ / ट्रम्प की कसौटी पर भारत-अमेरिका व्यापार



India-US trade
X
India-US trade
  • बहुपक्षीय और द्विपक्षीय व्यापार में संतुलन लाने के अमेरिकी प्रयास और उसके परिणाम

Dainik Bhaskar

Nov 09, 2018, 11:41 PM IST

‘अमेरिका को फिर महान’ बनाने का अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का संकल्प चुनावी नारे के रूप में शुरू हुआ था। दो साल पहले नवंबर में ही उनकी चुनावी जीत में इसने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका यह संकल्प अमेरिका की आर्थिक व सैन्य शक्ति पर अत्यधिक निर्भर है।

 

16 जून 2015 को राजनीति में आने के पहले न्यूयॉर्क के रियल एस्टेट क्षेत्र के दिग्गज व्यवसायी रहे ट्रम्प ने 20 जनवरी 2017 को अमेरिका के 45वें राष्ट्रपति पद की शपथ ग्रहण करते ही अपनी सैन्य सशक्तीकरण योजना के तहत रक्षा बजट बढ़ाने का फैसला किया। इसके साथ उन्होंने देश की अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए कई कदमों की शृंखला शुरू की। उनके मुताबिक अर्थव्यवस्था विशाल व्यापार घाटे के कारण टिकाऊ नहीं रह गई है।
11 नवंबर 2017 को वियतनाम की यात्रा पर जाते समय अपने एयर फोर्स वन विमान में मौजूद पत्रकारों से उन्होंने पूछा, ‘पिछले साल हमने 800 अरब डॉलर (साढ़े छह लाख करोड़ रु. से ज्यादा) गंवा दिए, है न? क्यों?’ उन्होंने इसे चुनाव अभियान में कई बार दोहराया अौर  राष्ट्रपति बनने के बाद पिछले  दो साल से दोहरा रहे हैं।

ट्रम्प के भाषणों से लगता है कि उनका पक्का मानना है कि उनके पूर्ववर्तियों द्वारा किए गए ‘मूर्खतापूर्ण व्यापार सौदों’ और पिछले कुछ दशकों में अपनाई गई कुछ आर्थिक नीतियों ने अमेरिका को अन्य देशों के साथ बहुपक्षीय व द्विपक्षीय दोनों व्यापार मोर्चों पर घाटे की स्थिति में ला दिया। उन्होंने सारे बहुपक्षीय व्यापार समझौतों की समीक्षा करने को कहा और सारे द्विपक्षीय समझौतों को कसौटी पर कसने को कहा, जिसे उनके प्रशासन के अधिकारी ‘ट्रेड स्ट्रेस टेस्ट’ कहते हैं। इसका मतलब है कि हर रिश्ते की व्यापारिक नज़रिये से जांच की जाएगी। फिर चाहे रिश्ता कितना ही रणनीतिक हो अथवा अमेरिका के सहयोगी देश ही क्यों न हो। इस टेस्ट के प्रश्न कुछ ऐसे हैं : वे कौन-से क्षेत्र हैं जहां किसी देश को अमेरिका से लाभ मिल रहा है?

कौन-से क्षेत्र हैं जहां कोई देश अमेरिकी उत्पादों पर ऊंचा शुल्क लगा रहा है? वे कौन-से क्षेत्र हैं जहां अन्य देश द्वारा थोपे गए शुल्क अमेरिका द्वारा लगाए शुल्कों के अनुपात में ज्यादा है? कौन-से शुल्क अमेरिकी किसानों और स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग के लिए नुकसानदायक है?
स्ट्रेस टेस्ट का आइडिया ट्रम्प का है पर इसे उनके तीन निकट सहयोगी लागू कर रहे हैं- वाणिज्य मंत्री विल्बर रॉस, अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि रॉबर्ट लाइटहिज़र और व्हाइट हाउस में उनके मुुख्य आर्थिक सलाहकार लैरी कडलो। इस टेस्ट में ट्रम्प की टीम कई दूसरे प्रश्न भी पूछती है। इस तरह अन्य देशों के शुल्क व नीतियां निशाने पर है ताकि नौकरियां व मैन्युफैक्चरिंग अमेरिका वापस लाई जा सके। इस स्ट्रेस टेस्ट के शीर्ष पर पहले ऐसे 10 देश हैं, जिनके साथ अमेरिका का सबसे ज्यादा व्यापार घाटा है।

मैक्सिको, कनाडा, जापान,जर्मनी, इटली और दक्षिण कोरिया के साथ भारत इसमें शामिल है। शीर्ष पर चीन है, जिसके साथ 2017 में अमेरिका का व्यापार घाटा 375 अरब डॉलर (दो लाख करोड़ रुपए से अधिक) का था। जाहिर है चीन ट्रम्प की हिट लिस्ट में है। पिछले छह माह में उन्होंने चीनी उत्पादों पर 25 फीसदी आयात शुल्क थोप रखा है, जो 250 अरब डॉलर से ज्यादा होता है।
पिछले हफ्ते ट्रम्प ने चेतावनी दी कि यदि उन्हें चीन से साफ-सुथरा व्यापारिक व्यवहार न मिला तो वे चीनी उत्पादों पर आयात शुल्क का एक और दौर चलाएंगे, जो 267 अरब डॉलर का होगा। पिछले हफ्ते चुनाव अभियान के दौरान उन्होंने दावा किया कि चीन पर उनकी नीति कारगर रही। उन्होंने कहा, ‘उन्हें कड़ी चोट लगी है। उनकी अर्थव्यवस्था बहुत बुरी हालत में है।’ चीन के बाद उन्होंने टॉप 10 के अन्य देशों को निशाना बनाया। गौरतलब है कि राष्ट्रपति बनने के बाद पहले ही हफ्ते  में उन्होंने ट्रांस-पेसेफिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट से हटने के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे।
सितंबर में ट्रम्प ने दक्षिण कोरिया के साथ अपने प्रशासन के पहले व्यापार सौदे पर दस्तखत किए। उन्होंने कहा कि इसमें व्यापार घाटा कम करने और अमेरिकी उत्पाद दक्षिण कोरिया को निर्यात करने के अवसरों का विस्तार करने की दिशा में सुधार किए गए हैं। अक्टूबर में उन्होंने दो पड़ोसियों कनाडा व मैक्सिको से यूएस-मैक्सिको-कनाडा (ट्रेड) एग्रीमेंट किया, जिसने नॉर्थ अमेरिकन फ्री ट्रेड एग्रीमेंट का स्थान लिया।

इसके पहले सितंबर में ट्रम्प और जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने घोषणा की कि दोनों देश व्यापार पर बातचीत करेंगे। भारत एक और देश है, जिसके साथ ट्रम्प ने व्यापार को लेकर विचार-विमर्श शुरू किया है। दोनों तरफ के अधिकारियों ने इस पर चुप्पी साध रखी है। लेकिन पिछले माह ट्रम्प ने संकेत दिया कि भारत के साथ व्यापारिक रिश्ते जांच के घेरे में है। उन्होंने भारत को ‘टैरीफ किंग’ कहा। पर्यवेक्षकों के मुताबिक यह वार्ता के दौरान आजमाई जाने वाली ट्रम्प की चालबाजी का हिस्सा है।
अपनी पूर्ववर्ती भूमिका में राष्ट्रपति ट्रम्प सफल रियल एस्टेट व्यवसायी रहे हैं और उन्हें भारत के नियामक व शुल्कों संबंधी माहौल का व्यक्तिगत अनुभव है। वे बिज़नेस के माहौल को सुधारने के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रयासों से प्रभावित हैं। सच तो यह है कि जनवरी 2017 में राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रम्प ने सैकड़ों नियम-कायदे हटाए हैं और लगता है कि इसकी प्रेरणा मई 2014 के बाद मोदी द्वारा किए इसी तरह के प्रयासों से आई है।

लेकिन, इसके साथ उन्हें लगता है कि ऐसे क्षेत्र भी हैं जहां भारत की नीतियां अमेरिकी उत्पादों के लिए रोक लगाने वाली भले न हो पर वह अनुकूल भी नहीं हैं। इसमें नया कुछ नहीं है। पिछले कई दशकों से यह बात द्विपक्षीय व्यापार वार्ताओं के एजेंडे में रही है। अब जब उनकी टीम ने भारत पर ट्रेड स्ट्रेस टेस्ट पूरी कर ली है, तो वे जल्दी ही नया समझौता चाहते हैं।
व्यापार समझौते में भारत-अमेरिका रणनीतिक संबंधों को तेजी से आगे ले जाने की संभावना है और दोनों के बीच व्यापार समझौते की गैर-मौजूदगी से भारत अमेरिकी परिदृश्य से बाहर भी हो सकता है अथवा दोनों देशों की उस रणनीतिक भागेदारी में अस्थायी ठहराव भी आ सकता है, जिसका ग्राफ वाजपेयी युग के बाद से ऊपर ही जाता रहा है।(ये लेखक के अपने विचार हैं)

Bhaskar Whatsapp
Click to listen..