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विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ और लांसेट की रिपोर्ट के मुताबिक भारत सहित दुनिया के तमाम देश इस बात को तरजीह नहीं दे रहे हैं कि जन्म के पहले दो सालों में नवजातों पर निवेश देश की खुशहाली का बड़ा कारण बन सकता है। लांसेट की ताजा रिपोर्ट के अनुसार अगर इन शिशुओं के पैदा होने के दो सालों में इनके पालन-पोषण पर समुचित ध्यान दिया जाए तो उनका भावी जीवन उनकी सामाजिक, आर्थिक और शारीरिक अक्षमताओं से बच सकता है। इससे गरीब-अमीर के बीच जन्मजात विभेद पर भी अंकुश पाया जा सकता है। आज दुनिया में 25 करोड़ ऐसे बच्चे हैं, जो पूर्ण विकास हासिल नहीं कर पाते। इनमें से बड़ी संख्या भारत के बच्चों की है। यहां आज भी हर पांचवां बच्चा गैर-प्रशिक्षित दाइयों द्वारा जना जाता है। रिपोर्ट के अनुसार भारत अपने बच्चों की खुशहाली और स्वास्थ्य के पैमाने पर दुनिया के 180 देशों में 131वें स्थान पर है। तथाकथित ग्रोथ और गरीबी हटाने के दिखावटी उपायों से पांच साल से कम उम्र के करोड़ों बच्चों के विकास को भारी ख़तरा है। अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय विकास एजेंसी (यूएसएड) की रिपोर्ट के अनुसार मध्याह्न भोजन की योजना के कारण भारत के स्कूलों में बच्चे तो बढ़े हैं, लेकिन वे शिक्षार्जन शायद ही कर पा रहे हैं। इसका ताजा उदाहरण बिहार में देखने को मिला, जहां शिक्षकों की हड़ताल के कारण मध्याह्न भोजन बंद हुआ तो बच्चों की स्कूलों में उपस्थिति भी कम हो गई। रिपोर्ट कहती है कि उत्तर प्रदेश में चार में से तीन बच्चे ब्लैकबोर्ड पर लिखे दो संयुक्त मात्र शून्य अक्षरों को मौखिक रूप से पढ़ नहीं सकते। मौखिक रीडिंग प्रवाह (ओरल रीडिंग फ्लूएंसी) जानने के इस अध्ययन में बताया गया कि इसी वजह से इन बच्चों में बड़े होने पर भी शिक्षा ग्रहण करने की क्षमता का विकास नहीं होता है और वे पीछे रह जाते हैं। नतीजतन आगे की पढ़ाई बाधित हो जाती है। अगर वे किसी तरह डिग्री ले लेते हैं तो नौकरी की दौड़ में काफी पीछे रह जाते हैं। ग्रामीण भारत के बच्चे इसके सबसे ज्यादा शिकार होते हैं और आजीविका के लिए वे कृषि में ही ठहर जाते हैं, जिनसे दो वक्त की रोटी भी उपलब्ध नहीं हो पाती। लांसेट की सिफारिश है कि सरकारें अगर बच्चों की पैदाइश के दो साल तक निवेश करें तो गरीबी खत्म हो सकती है।
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