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महाभारत-2019 / भाजपा का मैनिफेस्टो लोगों को याद, ऐसा मैनिफेस्टो विपक्ष का भी आए: रवीश कुमार



रवीश कुमार, सीनियर एक्जीक्यूटिव एडिटर, एनडीटीवी। रवीश कुमार, सीनियर एक्जीक्यूटिव एडिटर, एनडीटीवी।
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रवीश कुमार, सीनियर एक्जीक्यूटिव एडिटर, एनडीटीवी।रवीश कुमार, सीनियर एक्जीक्यूटिव एडिटर, एनडीटीवी।

  • रवीश ने कहा- मोदी का रिकॉर्ड चुनाव जीतने का रहा, अब विपक्ष को उन्हें हराने की चुनौती लेना होगी
  • ‘भव्य मंच, विशाल रैलियां, हेलीकॉप्टर और पंडाल की साज-सजावट बता देंगे कि भारत में भ्रष्टाचार अभी है।’

Dainik Bhaskar

Nov 10, 2018, 08:10 AM IST

वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार मानते हैं कि नरेंद्र मोदी का रिकॉर्ड अपना चुनाव जीतने का रहा है। अब यह चुनौती विपक्ष को लेनी है कि वह उन्हें हरा सकता है कि नहीं। 2019 के लोकसभा चुनावों के विभिन्न मुद्दों पर भास्कर के अनिरुद्ध शर्मा से उनकी बातचीत के मुख्य अंश...

 

सवाल : क्या मोदी को हरा पाना नामुमकिन है?
जवाब : कोई हराना चाहे तो हरा सकता है। हराना चाहा तो बिहार -दिल्ली में हरा दिया। कर्नाटक में बहुत मेहनत करने के बाद भी जीत नहीं पाए। कश्मीर चला नहीं पाए। गोवा में जोड़तोड़ से सरकार बनाई। वो अलग बात है कि आप तर्क ले आते हैं। लेकिन अपना चुनाव जीतने का रिकॉर्ड तो मोदी का रहा ही है। ये चुनौती विपक्ष को लेनी है कि वो हरा सकता है कि नहीं।

 

सवाल : भाजपा के पास क्या मुद्दे होंगे?
जवाब : बहुत है बताने के लिए कि हमने पेट्रोल 90 रुपए कर दिया। नौकरी नहीं दे पाए। एमएसपी डबल नहीं दे पाए, जो वादा किया था। बाकी तो रोज उनके मंत्री काम छोड़कर पीएम के ट्वीट को रीट्वीट कर ही रहे हैं। आप प्रकाश जावड़ेकर के ट्विटर हैंडल पर जाइए। वे यही बताएंगे कि पांच साल मानव संसाधन मंत्री रहते हुए हमने प्रधानमंत्री के साढ़े तीन हजार ट्वीट को रीट्वीट किया।

 

सवाल : इस चुनाव में कांग्रेस के पास मोदी सरकार के खिलाफ क्या मुद्दे हैं?
जवाब : कांग्रेस को बताना चाहिए कि उनकी क्या नीतियां हैं। एक तो आप समग्र आलोचना करते हैं, जैसे आप मोदी की शिक्षा नीति की आलोचना करना चाहते हैं तो वो आलोचना क्या है और उसका विकल्प क्या है? हम हरा देंगे, हम जिता देंगे, ऐसा थोड़े होगा, ये कोई डब्ल्यूडब्ल्यूई का मैच थोड़े ही है। ये अच्छा हुआ न कि पिछली बार के इनके (भाजपा) मैनिफेस्टो को लोगों ने याद रखा। वैसा मैनिफेस्टो विपक्ष का भी आना चाहिए, जिसे लोग लंबे समय तक याद रखें और उस पर बात हो। और वो एक ठोस मैनिफेस्टो आना चाहिए ताकि जो सत्ता में आए उसकी एकाउंटेबिलिटी (जवाबदेही) इससे फिक्स हो। डिटेल में बताएं नौकरियों का क्या करेंगे, इन्होंने तो नहीं दिया, आप देंगे क्या? या आप डेटा मैनिपुलेट करेंगे या कोई करेगा तो आप क्या करेंगे। सबसे बड़ी बात कि आप संस्थानों की इंटीग्रिटी और स्वायत्तता को कैसे सुनिश्चित करेंगे।

 

सवाल : यूपी में सपा-बसपा गठबंधन हाेने पर भाजपा प्रदर्शन दोहरा पाएगी?
जवाब : अखिलेश कह रहे हैं कि वे दो कदम पीछे हटेंगे। मायावती कह रही हैं सम्मानजनक सीटें मिलेंगी तो गठबंधन होगा। ये सम्मानजनक सीटें क्या होती हैं। वे शर्तें रख रही हैं। दूसरी बात कि किसी की भी 71 सीटें नहीं आनी चाहिए, मैं नहीं चाहता कि किसी को 100% जीत इस चुनाव में मिले। कोई भी पक्ष इतना ताकतवर हो जाए कि आप सवाल पूछते रहे और आपको जवाब न मिले।

 

सवाल : विपक्ष आरोप लगाता है कि मोदी सरकार में सांप्रदायिकता बढ़ी है?
जवाब : एकदम सही आरोप लगाते हैं। इतने लोगों को मारा गया लिंचिंग में। ये विपक्ष का ही मामला नहीं है, सांप्रदायिकता तो बढ़ी है, ये मैं भी मानता हंू। मोदी सरकार ने जो राजनीतिक संस्कृति दी है, उसके उत्पाद देखिए। आप एक आलोचना कीजिए तो कितनी गंदी भाषा में गाली मिलती है। विपक्ष को ये मुद्दा उठाना ही चाहिए। यदि विपक्ष सांप्रदायिकता को केंद्र में नहीं रखता है तो वो जनता के बीच जाने लायक है ही नहीं।

 

सवाल : आपकी नजर में विपक्ष के पास सबसे सक्षम व्यक्ति कौन है और क्यों?
जवाब : अब वे ही नहीं बता रहे हैं तो हम क्या बताएं। अभी उपलब्ध में ऐसा कोई महान नेता नहीं है, जिसका कोई विकल्प न हो। न सत्ता पक्ष में न विपक्ष में। यदि आपके सवाल का आधार ये है कि विकल्प ही क्या है? जब लाल किले पर ये भाषण देते हैं तो जर्नलिस्ट बैठ जाते हैं यह ढूढ़ने कि क्या-क्या झूठ बोला गया। ये तो प्रधानमंत्री की स्थिति हो गई है। 

 

सवाल : अभी तक सरकार में भ्रष्टाचार का कोई भी बड़ा मामला सामने नहीं आया है?
जवाब : मेहुल भाई चले गए, माल्या चले गए। अगर करप्शन नहीं होता तो बीजेपी, कांग्रेस या किसी के पास रैली के लिए पांच रुपए नहीं होते। देश भ्रष्टाचार मुक्त हो जाएगा तो राजनीति और राजनेता से सादा आपको जीवन में कुछ भी नजर नहीं आएगा। चुनाव के भव्य मंच, विशाल रैलियां, हेलिकॉप्टर बता देंगे कि भारत में भ्रष्टाचार अभी है।

 

सवाल : नोटबंदी, जीएसटी कैसे फैसले हैं?
जवाब : दोनों फेल हैं। नोटबंदी की जांच ठीक से नहीं हुई है। अब प्रधानमंत्री भी इसकी बात नहीं करते हैं। जीएसटी को मलेशिया ने लागू किया था अब हटाया है। अब एक तथ्य ये भी सामने आ रहा है कि जीएसटी से उतना रेवेन्यू नहीं आ रहा जितना आना चाहिए। नोटबंदी फेल आइडिया था, उसे लागू करने की नीयत भी खराब थी। रिजर्व बैंक ने करीब पौने दो साल लगा दिए डेटा देने में। और जो डेटा दिया, वह भी चार लाइन में है। क्या रिजर्व बैंक को अलग रिपोर्ट नहीं देनी चाहिए थी कि नोटबंदी क्या था, नहीं था।
 

सवाल : मोदी सरकार की दो बड़ी कामयाबी और दो असफलताएं बताइए?
जवाब : झूठ को इंस्टीट्यूशनलाइज रूप दिया गया है, ये कोई छोटी बात नहीं है। दूसरी बात, आलोचना करने पर गाली देने, मारने वाले, बहिष्कार करने वाले आ जाते हैं ये क्या सामान्य कामयाबी है। सफलता यह है कि चुनाव इस बात पर लड़ने जा रहे हैं कि मेरा विकल्प बताओ। ये चुनाव भारत का सबसे ज्यादा झूठ बोले जाने वाला और प्रोपेगंडा का होने जा रहा है।

 

सवाल : देश के हर कोने से आरक्षण की मांग उठ रही है। इसका हल क्या है?
जवाब : इसका मतलब आरक्षण अच्छी व्यवस्था है। हल यही है कि आप नौकरी दीजिए, पटेल क्यों गए रिजर्वेशन मांगने। इसलिए कि जॉब नहीं था। 20-20 लाख फीस देकर जब वो इंजीनियरिंग पढ़कर आए तो 5 हजार रु. की नौकरी मिल रही थी। तो उनकाे लगा कि आरक्षण मिलना चाहिए। नौकरी सृजन का सिस्टम ढह गया है। इस पर न तो कांग्रेस बताती है, न ही बीजेपी के पास कोई समाधान है। यदि होता तो 4 साल हो गए हैं पता चल जाता।

 

सवाल : क्या विपक्ष बिना चेहरे के मोदी का सामना कर पाएगा?
जवाब : उस हिसाब से तो मनमोहन सिंह कोई चेहरा नहीं थे, लेकिन 10 साल प्रधानमंत्री रहे। चेहरा क्या होता है? क्या जो देखने में सुंदर हो, बाल ठीक से कंघी करता हो, कपड़े पहनने में ज्यादा ध्यान देता हो, दिन में 10 बार जैैकेट बदलता हो। बीजेपी में मोदी कहां राष्ट्रीय स्तर के नेता थे। गुजरात के बाहर जहां प्रचार करने जाते थे, चुुनाव हराकर आते थे। लेकिन बनने के बाद चला ही रहे हैं देश। अब जिसको चांस मिलेगा वह चला ही लेगा।

 

सवाल : धारणा बन रही है कि जर्नलिस्ट या तो राइटिस्ट है या लेफ्टिस्ट है या एक्टिविस्ट है। या टीवी पर फैसले सुना रहा है।
जवाब : इस सवाल का कोई महत्व नहीं है। सारे मीडिया को खत्म करके गोदी मीडिया बनाया गया। सारे अखबारों, टीवी चैनल्स की पांच साल की समीक्षा होनी चाहिए कि देश में हो क्या रहा था और मीडिया छाप-दिखा क्या रहा था। किसकी वंदना स्तुति की जा रही थी और किस अखबार, चैनल में किस नेता का ज्यादा विज्ञापन छप रहा था। पहले इसकी ऑडिटिंग होनी चाहिए। मीडिया एकतरफा फैसला सुना रहा है। सवाल ही फैसले के लहजे में रखे जाते हैं। सारा डिबेट देखिए, हिंदू-मुस्लिम डिबेट है।

 

सवाल : मीडिया बंटा हुआ है। या तो प्रो-मोदी या एंटी मोदी। आप क्या मानते हैं?
जवाब : 99.9% मीडिया प्रो-मोदी और एकतरफा हो गया है। ये जनता का इम्तिहान है कि चुनाव के चार महीनों में जिन अखबारों को वो उठाएगी और चैनलों को देखेगी, उसमें प्रोपेगंडा दिख रहा है या देश। इस चुनाव में जनता को अपनी आवाज के लिए भी लड़ना है। उसे पूछना है, उन नेताओं से जो उसके पास आएंगे कि ये अखबार ऐसा क्यों हो गया है, ये टीवी ऐसा क्यों हो गया है। कहीं इसमें आपकी भूमिका तो नहीं है।

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