संपादकीय / मायावती और अखिलेश के गठबंधन की कड़ी चुनौती

Dainik Bhaskar

Jan 14, 2019, 10:25 PM IST



Mayawati and Akhilesh's tough challenge for coalition
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Mayawati and Akhilesh's tough challenge for coalition
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  • बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच गठबंधन के एलान के बाद राजनीतिक उथल-पुथल की चर्चाएं तेज

उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच गठबंधन के एलान के बाद राजनीतिक उथल-पुथल की चर्चाएं तेज हो गई हैं। जहां भाजपा के लिए भावना रखने वाले इसे कांग्रेस के लिए झटका बता रहे हैं वहीं भाजपा विरोधी लोग इसे भाजपा की हार की गारंटी बता रहे हैं।

 

अगर 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा-सपा दोनों को मिले 22-22 प्रतिशत वोटों को जोड़ दिया जाए तो यह गठबंधन 42 प्रतिशत वोटों के साथ सबसे बड़े राजनीतिक प्रदेश की 60 से ज्यादा लोकसभा सीटों पर विजय हासिल कर सकता है। इस तरह 2014 में भाजपा को मिली 71 सीटों में से भारी कमी उसके लिए दिल्ली में सरकार बनाने की राह में खाई खड़ी करेगी।

 

हालांकि भाजपा का कहना है कि चुनाव सिर्फ अंकगणित नहीं होता और उसमें एक तरह का बीजगणित और रसायन शास्त्र भी काम करता है और नरेंद्र मोदी जैसा नेता होने के कारण राष्ट्रीय स्तर के चुनाव का पलड़ा उसके पक्ष में झुका हुआ है। भाजपा ने सपा और बसपा से जुड़ी दो प्रमुख जातियों के वोटों को अपना कभी नहीं माना और उसने उनसे इतर अन्य पिछड़ी और अन्य दलित जातियों पर अपना ध्यान केंद्रित रखा था।

 

फिर भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सपा और बसपा के जनाधार में भाजपा ने 2014 में सेंध लगाई थी। वह सेंध इस बार सपा और बसपा का गठबंधन भाजपा के जनाधार में लगा सकता है। सपा और बसपा का यह गठबंधन अल्पसंख्यक मतों को बंटने से रोकेगा और उम्मीद लगती है कि यह एक विजयी समीकरण बना सकेगा, पर कांग्रेस के अलग होने के कारण इस परिणति को एकदम पक्का नहीं मान सकते।

 

संभव है कि कांग्रेस के लिए छोड़ी गई दो सीटों की संख्या बढ़े और 12 जनवरी को घोषित इस गठबंधन के स्वरूप में कुछ बदलाव हो। अगर नहीं होता है तो भाजपा की विजय की संभावना के अलावा यह भी माना जा सकता है कि देश में 1996 की तरह त्रिशंकु संसद बनेगी और कांशीराम की आशाओं के अनुरूप मजबूत नहीं एक मजबूर सरकार बनेगी, जिसमें मायावती प्रधानमंत्री पद पर दावेदारी करेंगी।

 

देखना है कि सपा और बसपा का नेतृत्व कर रही मंडल और दलित आंदोलन की दूसरी पीढ़ी क्या मुलायम और कांशीराम की तरह 1993 जैसा कमाल कर पाएगी। इसके बावजूद अखिलेश और मायावती अयोध्या और उसके बहाने धार्मिक ध्रुवीकरण से भयभीत हैं।  
 

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