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संदर्भ / केवल राहुल के मोदी विरोध से बात नहीं बनेगी

Dainik Bhaskar

Jan 14, 2019, 10:43 PM IST


Only Rahul will not talk about Modi's opposition
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Only Rahul will not talk about Modi's opposition

  • प्रधानमंत्री से खफा सारे लोगों को अपने पक्ष में लाकर मतदाताओं का नया आधार नहीं बन सकता

कभी भूले हुए जमाने में लोकतंत्र में नेता सारे नागरिकों से बात करते थे। इनमें बहुत बड़ी संख्या उन्हें वोट न देने वाले लोगों की भी होती, क्योंकि सार्वजनिक पद सार्वजनिक भरोसे की जिम्मेदारी समझे जाते थे। अब वे सिर्फ उनसे बात करते हैं, जिन्हें वे अपना ‘आधार’ कहते हैं।

 

डोनाल्ड ट्रम्प को लाखों लोग मूर्ख, नस्लवादी और न जाने क्या-क्या कहते हैं। लेकिन, उतने वे समर्थकों में लोकप्रिय होते जाते हैं। हिंदू वोटों पर सवार होकर सत्ता में आई नरेन्द्र मोदी की भाजपा को लीजिए। इसने 20 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले उत्तर प्रदेश के लोकसभा और विधानसभा चुनाव में भी कोई मुस्लिम प्रत्याशी खड़ा नहीं किया और फिर भी दोनों चुनावों में विपक्ष का सफाया कर दिया। वे मुस्लिम और ज्यादातर दलितों को बाहर रख सकते थे, क्योंकि उनके पास ज्यादातर उच्च व मध्यवर्ग के वोट थे। इसीलिए 10 फीसदी आरक्षण सरकार के बड़े फैसलों में से एक है।


ऐसे में राहुल गांधी किस मतदाता वर्ग को संबोधित कर रहे हैं? केवल मोदी विरोध से बात नहीं बन सकती। सिर्फ 31 फीसदी लोगों ने मोदी को 2014 में वोट दिए थे। अब कई और लोग उन्हें नापसंद करते होंगे। उन पर राहुल के लगातार हमलों से ये लोग प्रोत्साहित हुए होंगे। यदि मोदी के खिलाफ गुस्सा आपकी एकमात्र प्रेरणा है तो संभावना यही है कि मौजूद विकल्पों में से आप उसे चुनेंगे जिसे आप सर्वश्रेष्ठ समझते हैं। बंगाल में ममता बनर्जी हो सकती हैं, उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा, बिहार में लालू यादव, केरल  में वामदल और तेलंगाना, ओडिशा, और दिल्ली में क्रमश: केसीआर, नवीन पटनायक और अरविंद केजरीवाल। यदि राहुल का अभियान मोदी की छवि इतनी बिगाड़ दे कि लोग उन्हें सत्ता से बेदखल कर दें तो क्या वे कांग्रेस को चुनेंगे? आज तो इसकी बहुत ही कम संभावना है। 


1989 तक कांग्रेस का आधार इतना बड़ा था कि वह सबकुछ जीत सकती थी : उसमें निम्न वर्ग, अल्पसंख्यक, आदिवासी, ब्राह्मण, कुछ मध्यवर्गीय जातियां और बड़ी संख्या में गरीब लोग थे। भाजपा तब शहरी व्यापारी और हिंदू मध्यवर्ग तक सीमित थी। इसलिए इंदिरा गांधी तोे उपहास के स्वर में जनसंघ/भाजपा को बनिया पार्टी ही कहती थीं। इसी तरह जब तक वे थीं भाजपा उनकी पार्टी को कभी ‘मुस्लिम’ पार्टी नहीं कह सकी। पोटा (आतंकवाद रोकथाम कानून’) को वापस लेने से शुरू हुए असमंजस से भरे यूपीए दशक में कांग्रेस ने मोदी को ऐसा करने का मौका दे दिया।

 

एक बार 1989 में राजीव ने यह आधार गंवाना शुरू किया पर कांग्रेस ने बचे हुए वोटों और भाजपा विरोधी राजनीतिक ताकतों को इकट्‌ठा करके खुद को बचाया और फली-फूली भी। 2014 के बाद अब पार्टी को उससे ज्यादा कुछ करने की जरूरत होगी। सौ दिन बाद बड़ी परीक्षा के पहले कांग्रेस के पास शायद पंजाब को छोड़कर कहीं वफादार मतदाता नहीं है।

 

शहरी मध्यवर्ग खासतौर पर विशाल 25 से कम आयु वर्ग का समूह, अब भी मोदी समर्थक है। आप सिर्फ मोदी से खफा सारे लोगों को एक छाते के नीचे लाकर मतदाताओं का नया आधार नहीं बना सकते। आप मोदी को नुकसान पहुंचा सकते हैं पर फायदा मित्रों-शत्रुओं में बंट जाएगा। अभी तो राहुल की रणनीति 2010-14 के अरविंद केजरीवाल की शैली की है।

 

अन्ना हजारे और आरएसएस की ताकत का इस्तेमाल करके केजरीवाल ने यूपीए की खासतौर पर कांग्रेस की विश्वसनीयता को नष्ट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने कांग्रेस की ‘सब चोर है’ वाली छवि गढ़ी। बस हुआ यह कि कांग्रेस से दूर गए सभी मतदाता उनके पास नहीं आए। उन्होंने इसके लिए आधार तैयार नहीं किया था। उनके फायदे दिल्ली तक सीमित रहे। अन्य जगहों पर वे उन मतदाताओं को सिर्फ मोदी की ओर मोड़ने में सफल रहे। यह विकल्प दिए बिना विशुद्ध रूप से नकारात्मकता की राजनीति का खतरा है।

 

इसके लिए पहले आपको आधार परिभाषित करना होता है। राहुल के सामने यही खतरा है। तीन हिंदी प्रदेशों में राहुल गांधी की सफलता, सुर्खियां बटोरने में उनकी काबिलियत और ट्विटर पर उन्हें मिल रहे समर्थन ने उनके बौद्धिक समर्थकों और मोदी विरोधी वाम-उदारवादियों को उत्साहित कर दिया है। परंतु लाखों की तादाद में आ रहे रीट्वीट और लाइक्स ईवीएम में नहीं गिने जाते। राहुल गुरिल्ला शैली में हमले तो कर रहे हैं लेकिन इसका फायदा क्या हुआ है? मुस्लिम पार्टी की छवि तोड़ने के लिए राहुल मंदिरों की यात्राएं कर रहे हैं, अपना जनेऊ दिखा रहे हैं और अपने उच्च ब्राह्मण गोत्र जाहिर कर रहे हैं।

 

इसी दौरान उनकी पार्टी तीन तलाक, सबरीमला, सवर्णों के आरक्षण जैसे अहम धर्मनिरपेक्ष-उदारवादी मुद्दों पर खामोश रही। भरोसे की यही कमी तब दिखी जब उनकी पार्टी ने नागरिकता अधिनियम में  संशोधन के मुद्दे पर लोकसभा का बहिष्कार किया। यह अधिनियम एक तरह से देश में जायोनिज़म (किसी एक धर्म के अनुयायी के लिए देश-निर्माण)  को कानूनी जामा पहनाता है। यहां बहस जायोनिज़्म को लेकर नहीं है। इजरायल ने स्वयं को वैचारिक आधार पर यहूदी राष्ट्र बनाया जबकि इसके उलट भारत ने धर्मनिरपेक्ष संविधान बनाया। अब इसे चुनौती दी जा रही है और कांग्रेस बहिष्कार के अलावा कुछ नहीं कर पा रही।

 

असम समेत देश भर के हिंदू और मुस्लिम यह सब देख रहे हैं। यह भाजपा को रास आता है। पार्टी का जनाधार भी यही चाहता है। पार्टी जब अवैध प्रवासियों को दीमक कहती है तो उसके समर्थक तालियां बजाते हैं। अगर पार्टी संविधान में संशोधन करके यह स्पष्ट कर देती है कि इनमें भी केवल मुस्लिम ही दीमक हैं, तो समर्थकों की खुशी का ठिकाना नहीं रहता। कांग्रेस को यह भी नहीं पता कि उसका आधार क्या है या अगले कुछ महीनों में जब चुनाव प्रचार शुरू हो जाएगा तो वह किसे अपना आधार बनाना चाहती है?

 

 विशुद्ध मोदी विरोध चाहे जितना क्रोध से भरा हो, वह कभी चुनावी विकल्प नहीं बन सकता। वह ज्यादा से ज्यादा मोदी को इतना नुकसान पहुंचा सकता है कि लोकसभा में पार्टी की सीटें 200 से कम हो जाएं। परंतु क्या इससे आप 100 सीटों का आंकड़ा पार कर पाएंगे? राज्यवार देखेंगे तो पाएंगे कि अगर मई तक लोगों का भाजपा से बुरी तरह मोहभंग हो जाए तो भी ज्यादातर राज्यों में कांग्रेस उनकी स्वाभाविक पसंद नहीं होगी। राहुल गांधी के लिए यही कठोर वास्तविकता है।  
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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