संपादकीय / पुलिस पर ही फूटने लगा है बुलंदशहर घटना का ठीकरा

Dainik Bhaskar

Dec 07, 2018, 10:52 PM IST



Police starts blame the Bulandshahr incident
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Police starts blame the Bulandshahr incident
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  • बुलंदशहर की घटना पुलिस की चौकसी और पर्याप्त संख्या बल की मांग करती है 

बुलंदशहर में गोकशी के शक में हुई इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की हत्या और हिंसा की खुफिया रिपोर्ट पूरे मामले में पुलिस की ही लापरवाही बता रही है।

 

एडीजी इंटेलिजेंस एसपी शिरोडकर की रिपोर्ट में यही कहा गया है कि अगर पुलिस समय से घटनास्थल पर पहुंच गई होती, गोवंश के अवशेषों से लदी गाड़ी रोक ली होती और आरोपियों पर रासुका लगा दिया होता तो हिंसा न होती। रिपोर्ट से जाहिर है कि पुलिस को वही सब करना चाहिए था जैसा कि हिंदू वाहिनी, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के लोग चाहते थे।

 

रिपोर्ट का रोचक पहलू यह भी है कि उसमें सुबोध कुमार सिंह की हत्या का आरोप एक फौजी पर लगाया जा रहा है, जो जम्मू में तैनात है। रिपोर्ट में उन लोगों का जिक्र नहीं है, जिन्हें पुलिस ने अभियुक्त बनाया है। रिपोर्ट कहती है कि गोकशी की सूचना सुबह 9.30 बजे आई है और सीओ व एडीएम ने वहां पहुंचने में देरी कर दी।

 

वे अगर गोवंश के अवशेष से लदी गाड़ी को रोक लेते तो न तो भीड़ इतनी नाराज होती और न ही ऐसी हिंसा होती। रिपोर्ट से यह लगता है कि उन लोगों को बचाने का प्रयास जारी है जो या तो गोकशी के असली साजिशकर्ता थे या जनता और भीड़ को भड़का रहे थे। इस बात पर कम चर्चा की जा रही है कि बुलंदशहर में तीन दिनों से इज्तिमा चल रहा था। वह इस इलाके में इस्लाम के मानने वालों का बड़ा समागम होता है।

 

उसमें आने वालों की संख्या तकरीबन 20 लाख बताई जाती है। जिस दिन स्याना में हिंसा हुई है वह उन लोगों के वापस लौटने का दिन था। पुलिस इतनी बड़ी संख्या में आने वालों के सुरक्षित लौटने का इंतजाम करने में लगी थी। ट्रैफिक जाम को अगर छोड़ दिया जाए तो पुलिस उस उद्देश्य में कामयाब भी रही। अच्छी बात है कि पुलिस अपनी कमियों की समीक्षा करे और आत्मालोचना भी करे।

 

इसके बावजूद पुलिस का राजनीतिक दबाव में काम करना और हर तरह के राजनीतिक उपद्रव को आंख मूंदकर देखना न तो उसके लिए ठीक है और न ही लोकतंत्र के लिए। बुलंदशहर की घटना न सिर्फ पुलिस की चौकसी और पर्याप्त संख्या बल की मांग करती है बल्कि पुलिस सुधार और इस प्रणाली के राजनीतिकरण को रोकने की जरूरत को भी रेखांकित करती है।

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