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संपादकीय / विपक्षी एकता की संभावना और प्रधानमंत्री का पद

Dainik Bhaskar

Nov 09, 2018, 11:25 PM IST


possibility of opposition unity
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possibility of opposition unity

  • चंद्रबाबू ने प्रधानमंत्री पद के प्रश्न को टालते हुए लोकतंत्र बचाओ और देश बचाओ के एजेंडे को को आगे कर दिया

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू का कर्नाटक उपचुनावों के तत्काल बाद बेंगलुरू पहुंचकर मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी और पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा से मुलाकात करने से साफ है कि वे विपक्षी एकता के गर्म लोहे पर चोट करके उसे आकार देने में लगे हैं।

 

जीवंत लोकतंत्र के लिए देश को मजबूत विपक्ष चाहिए और सत्ता की कमान संभालने वाले दलों की भूमिकाएं भी बदलती रहनी चाहिए। यही कारण है कि चंद्रबाबू ने प्रधानमंत्री पद के प्रश्न को टालते हुए लोकतंत्र बचाओ और देश बचाओ के एजेंडे को ज्यादा प्रमुखता दी है। वे लगातार इस बात का उल्लेख कर रहे हैं कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया से लेकर सीबीआई तक सभी संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर किया जा रहा है, इसलिए भाजपा का विकल्प तैयार करना होगा।

उन्होंने गुरुवार को जनता दल(एस) के नेताओं से मुलाकात के बाद तमिलनाडु की राह पकड़ी है और वहां उनकी द्रमुक नेता एमके स्टालिन से भी बात करने की योजना है। देश में ऐसी पार्टियों की बड़ी संख्या है, जो भाजपा की विचारधारा से सहमत नहीं हैं और वे एकमंच पर आने को तैयार हैं। सवाल उस मंच के नेतृत्व का है जो वह अभी निर्धारित नहीं है।

उदाहरण के लिए उपचुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री कुमारस्वामी ने कहा था कि विपक्षी एकता राहुल गांधी के नेतृत्व में होगी लेकिन, चंद्रबाबू और अपने पिता देवगौड़ा की मुलाकात के बाद उन्होंने कहा कि 1996 की स्थिति दोहराई जा सकती है। चंद्रबाबू का यह कहना भी मायने रखता है कि देवेगौड़ा के नेतृत्व में केंद्र में एक ही प्रयोग हुआ है। कुमारस्वामी अपने शपथ ग्रहण समारोह की ही तरह किसान रैली के रूप में विपक्षी नेताओं का जमावड़ा दिसंबर के अंत या जनवरी के पहले हफ्ते में करना चाहते हैं। जनवरी में पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की रैली है और उसका भी उद्‌देश्य विपक्षी एकता है।

इस विपक्षी एकता में राहुल गांधी, मायावती, ममता बनर्जी और देवेगौड़ा समेत प्रधानमंत्री पद के कई दावेदार हैं। अच्छी बात यह है कि एकता के प्रयास में लगे नेताओं को इस बात का अहसास है कि कांग्रेस को किनारे रखकर एकता कायम नहीं हो सकती। देखना है पांच राज्यों के चुनावों में कांग्रेस अपनी शक्ति कैसे बढ़ाती है, क्योंकि वह आगे के समायोजन का आधार बनेगी। विपक्ष अगर साझा नेतृत्व विकसित कर सके तो उसके सत्ता में आने की संभावना असंभव नहीं रहेगी। 

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