संदर्भ / कैमरे तो लुभा लिए, अब माइक भी थामें प्रियंका



Priyanka should have an effective speech
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Priyanka should have an effective speech

  • शुरुआत के 5 सार्वजनिक कार्यक्रमों से बनने वाली छवि जनता के मन पर लंबे समय तक छाप छोड़ेगी

चेतन भगत

चेतन भगत

Feb 14, 2019, 01:33 AM IST

कुछ दिन पहले प्रियंका गांधी ने राजनीति में औपचारिक प्रवेश के बाद पहले सार्वजनिक कार्यक्रम में भाग लिया। भाई राहुल और अन्य वरिष्ठ नेताओं के साथ वे लखनऊ की गलियों से समर्थकों व प्रशंसकों की ओर अभिवादन का हाथ हिलाते हुए गुजरीं। कांग्रेस ने इस रोड शो को उत्तर प्रदेश की राजनीति और पार्टी के लिए टर्निंग पॉइंट बताया। अब यह तो समय ही बताएगा कि क्या वाकई यह बात सही है पर यह सच है कि रोड शो ने व्यापक स्तर पर लोगों का ध्यान आकर्षित किया। हर प्रमुख मीडिया आउटलेट ने इस घटना को प्रसारित किया। लगभग हर न्यूज़ चैनल पर यह रोड शो प्राइम टाइम बहस का मुद्‌दा भी बना। हर बार जब कांग्रेस उत्तर प्रदेश या अन्य कहीं रैली करती है तो उसे इतने व्यापक स्तर पर नहीं देखा जाता, जो हर प्रादेशिक या आम चुनाव के पहले दर्जनों की संख्या में होती हैं। सिर्फ इस एक तथ्य से ही कांग्रेस के लिए प्रियंका या ‘पी’ फैक्टर के महत्व का पता चलता है।

 

 

जो सवाल उठा रहे हैं कि प्रियंका के आने से क्या फर्क पड़ेगा, उन्हें बता दूं कि सबसे बड़ा फर्क तो यही है कि अपनी ताज़गी व नएपन के कारण वे कैमरे और मीडिया के आकर्षण का केंद्र रहेंगी। राहुल और मोदी दोनों ज्ञात शख्सियतें हैं और हम उन्हें 2014 से सुन रहे हैं। दूसरी तरफ, जहां तक उनके राजनीतिक रवैए का संबंध है, उसके हिसाब से प्रियंका एकदम नई हैं। हम जानना चाहेंगे कि उनके पास कहने के लिए क्या है। इससे हम ऐसी बात पर आते हैं जो हुई अथवा शायद जो रोड शो में नहीं हुई। वह यह कि प्रियंका नहीं, राहुल बोले। यह सही है कि वे अच्छा बोले पर आयोजन में नयापन प्रियंका की मौजूदगी से आया। यहां एक मुस्कान और वहां हाथ हिलाकर लोगों का अभिवादन, इससे लोगों में कुछ रुचि तो जागी लेकिन, कांग्रेस के लिए जो चीज पी-फैक्टर के फायदे को कई गुना बड़ा देगी, वह है प्रियंका के पास कहने के लिए कुछ होना।

 

लोग भी यही जानना चाहेंगे। हो सकता है कि उत्तर प्रदेश के रोड शो में प्रियंका का न बोलना रणनीति का हिस्सा हो। इसके लिए शायद कांग्रेस ने कोई बेहतर अवसर सोच रखा हो। या शायद वे धीरे-धीरे प्रियंका को सामने लाना चाहते हों ताकि मीडिया के आकर्षण और नएपन की वैल्यू को कई आयोजनों के माध्यम से लंबे समय खींचा जा सके। वे अब तक नहीं बोली हैं, ये उसके वैध कारण प्रतीत होते हैं। लेकिन, यदि उन्होंने आगे दिए जा रहे कारणों से चुप्पी साध रखी थी तो यह अच्छा नहीं होगा : एक, वे अपनी वजह से राहुल की चमक फीकी नहीं करना चाहती थीं। दो, कांग्रेस अब भी तय कर रही है कि उन्हें क्या कहना चाहिए। तीन, जान-बूझकर सोची गई  रणनीति ताकि उनके कम बोलने से रहस्य को कायम रखा जा सके।

 

चार, उन्हें अपना विज़न लोगों को बताने की जरूरत नहीं है, उनका नाम ही काफी है। यदि प्रियंका वाकई चुनाव पर अपना प्रभाव डालना चाहती हैं तो अंतत: उन्हें काफी मुखर होना होगा। यह समझना महत्वपूर्ण होगा कि यह प्रभाव व्यापक होना (और होने की संभावना है भी नहीं) जरूरी नहीं है। प्रियंका को इतना ही करना है और वे यही लक्ष्य रख सकती हैं कि भाजपा के 1-2 फीसदी वोट कांग्रेस के पक्ष में ले आएं। वोटों में 1 से 2 फीसदी हिस्सेदारी या 30 से 60 लाख मतदाताओं के पाला बदलने भर से 10-20 सीटों का फर्क पड़ सकता है। इससे चुनाव के बाद सरकार के गठन के बिल्कुल अलग ही विकल्प तैयार हो सकते हैं।


लेकिन, ऐसा करने के लिए प्रियंका को बोलना शुरू करना होगा और वह भी जल्दी ही। जब वे ऐसा करेंगी तो उनके पहले पांच भाषण या इंटरव्यू निर्णायक होंगे। उनमें उन्हें खुद को तीक्ष्ण बुद्धि व स्पष्ट सोच वाली विचारक, एक आधुनिक व स्वाभाविक रूप से धर्मनिरपेक्ष भारतीय, विशिष्ट वर्गों व व्यापक जन समुदाय से (अंग्रेजी व हिंदी) संवाद साधने में सहजता रखने वाली शख्सियत, ऐसी नेत्री जो न सिर्फ भारत में क्या गलत हो रहा है यह जानती हैं बल्कि यह भी जानती है कि क्या करने से चीजें ठीक होंगी और पसंद किए जाने व संपर्क रखने योग्य व्यक्ति के रूप में खुद को पेश करना होगा। ये सरल से गुण हैं लेकिन, यह दिखाना कि ये सब एक साथ किसी में मौजूद है, कठिन चुनौती है। व्यक्तित्व के ये सारे पहलू किसी एक भाषण या इंटरव्यू में व्यक्त होना जरूरी नहीं है।

 

उनके कुछ शुरुआती भाषण ऐसी छवि निर्मित करेंगे, जो लंबे समय तक लोगों के मन पर छाप छोड़ेगी। कहने की जरूरत नहीं कि इसके लिए व्यापक तैयारी की जरूरत है। निश्चित ही उनकी वंश परम्परा देखते हुए वे ध्यान आकर्षित करेंगी पर यह बात यहीं तक सीमित रहेगी। लोग उन्हें मंच प्रदान करेंगे और शायद कुछ वक्त भी देंगे। लेकिन, जल्द ही उन्हें प्रतिभा का प्रदर्शन करना होगा, जो साफ नज़र आए और संदेह से परे हो। चूंकि चुनाव में तीन महीने से भी कम वक्त है, शायद कांग्रेस के लिए प्रियंका के बोलने का समय व स्थान तय करना उपयोगी साबित हो। किसी उत्कृष्ट कॉलेज में छात्रों के साथ प्रश्नोत्तर का कार्यक्रम, कोई रैली, कोई कॉन्क्लेव और अंग्रेजी तथा हिंदी चैनल के साथ बेबाक इंटरव्यू जैसे मिले-जुले आयोजन यह दर्शाने की अच्छी शुरुआत हो सकती है कि वे हर जगह फिट हो जाती हैं। कोई बात नहीं यदि उन्हें प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी के रूप में पेश न किया जाए। उन्हें तो किसी वोट बैंक से अपील करने की भी जरूरत  नहीं है। इस चुनाव में तो उनका इतना ही काम है कि वे वोट शेयर में सेंध लगाएं। ध्यान आकर्षित करके और यह बताकर कि उनके पास कहने के लिए कुछ समझदारी भरी और ताज़ा बातें हैं, कुछ फीसदी वोट शेयर अपनी पार्टी के पक्ष में मोड़ दें।


ज्यादा कुछ न कहना या हाशिये पर ही बने रहने से कितनी ही सादगी व विनम्रता दिखाई दे पर इसमें जोखिम हो सकता है। हम जरूरत से ज्यादा जानकारियों के युग में रह रहे हैं। सही हो या गलत हर वोटर अपने फोन पर जानकारियां व सूचनाएं हासिल करने पर रोज कई घंटे खर्च कर रहा है। यदि पी- फैक्टर को कारगर बनाना है तो इन लोगों तक पहुंचना होगा और उनका ध्यान अपने पर टिकाए रखना होगा। इसके लिए शब्दों व दृश्यों वाला ऐसा कंटेन्ट लगेगा, जो आकर्षित करे। रोड शो का असर ज्यादा नहीं रहेगा। प्रियंका ने पहले ही बहुत सारे कैमरे आकर्षित कर लिए हैं। अब वक्त है कि वे माइक थामें। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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