संपादकीय / वित्त मंत्रालय व रिजर्व बैंक के बीच अनावश्यक विवाद



Reserve bank and finance ministry disputes
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Reserve bank and finance ministry disputes

 

  • मौजूदा सरकार चाहती है कि रिजर्व बैंक ब्याज दरें घटाकर बाजार को राहत दें 
  • जबकि रिजर्व बैंक को लगता है कि सरकार उसका उपयोग अपने राजनीतिक उद्‌देश्य साधने के लिए करना चाहती है।

Dainik Bhaskar

Oct 31, 2018, 10:54 PM IST

भारतीय रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने केंद्रीय बैंक में सरकार के दखल की बात सार्वजनिक रूप से कहकर जिस विवाद की शुरुआत की थी उसकी तल्खी बढ़ाते हुए वित्तमंत्री अरुण जेटली ने दस लाख करोड़ रुपए के बट्टे खाते के कर्ज के लिए रिजर्व बैंक को जिम्मेदार ठहराया है।

दोनों अंग -जिनका ये दोनों पदाधिकारी प्रतिनिधित्व करते हैं- हमारी अर्थव्यवस्था के प्रमुख अंग है। फर्क इतना ही है कि रिजर्व बैंक उतना जवाबदेह नहीं है, जितना राजनीतिक प्रक्रिया से पद पर आए वित्त मंत्री और उनका मंत्रालय। दुनिया के सारे देशों में वित्तीय और मौद्रिक नीतियों का इस्तेमाल सुस्त पड़ी अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए किया जाता है।

पेंच यह है कि राजनीतिक रूप से जवाबदेह वित्त मंत्रालय प्राय: अपनी नीतियों को चुनावों में भुनाने के हिसाब से देखता है, जबकि केंद्रीय बैंक के पेशेवर लोग अर्थव्यवस्था की दीर्घावधि सेहत को देखकर अपना दायित्व निभाते हैं। रिजर्व बैंक कीमतों की स्थिरता और बाजार में तरलता यानी नकदी की उपलब्धता पर निगाह रखता है। व्यावसायिक बैंकों का सुसंचालन भी उसी की जिम्मेदारी है।

उधर, वित्त मंत्रालय करारोपण और सरकारी खर्च का दायित्व संभालता है। इस तरह से देखें तो दोनों पूरक भूमिकाओं में हैं और एक-दूसरे से एकदम स्वतंत्र भूमिकाएं अपनाना न तो संभव है और न अर्थव्यवस्था के हित में है। मौजूदा सरकार चाहती है कि रिजर्व बैंक ब्याज दरें घटाकर बाजार को राहत दें, जबकि केंद्रीय बैंक को लगता है कि सरकार उसका उपयोग अपने राजनीतिक उद्‌देश्य साधने के लिए करना चाहती है।

जहां इस आरोप में दम हो सकता है वहां यह भी सही है कि उर्जित पटेल के नेतृत्व में ब्याज पर कड़ा रवैया अपनाकर रिजर्व बैंक ने दरें घटाने का वह मौका गंवा दिया, जिससे अर्थव्यवस्था अस्थिरता के मौजूदा दौर का सामना करने लायक बन पाती। अपनी स्वायत्तता के लिए वह घातक रुख अपना रहा है।

यह कोई भी बता सकता है कि अर्थव्यवस्था कठिन दौर से गुजर रही है तो उसे बेहवजह दवाब में लाना ठीक नहीं है। नीतिगत मुद्‌दों पर वित्त मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक में मतभेद का सार्वजनिक होना ठीक नहीं है। यह अनिश्चितता के इस दौर में गहरी निराशा का कारण बन सकता है, जिसकी ऊंची और अनावश्यक लागत भुगतनी पड़ सकती है।

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