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संदर्भ / इंडो-पेसिफिक में बलशाली भारत चाहते हैं ट्रम्प



Trump wants strong India in Indo-Pacific
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Trump wants strong India in Indo-Pacific

  • हाई टेक सैन्य सामग्री देने और आर्थिक मजबूती के लिए व्यापारिक संधि करने को भी तैयार अमेरिका

Dainik Bhaskar

Dec 07, 2018, 11:22 PM IST

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड जे ट्रम्प ने अपने प्रशासन के शुरुआती दो वर्षों में भारत को ‘इंडो-पेसिफिक’ क्षेत्र में अधिक बड़ी भूमिका निभाने पर जोर दिया है।

 

वे यह भी चाहते हैं कि उस इलाके में नई दिल्ली की आवाज पर ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए, जहां अमेरिका, चीन और जापान जैसी दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं, कंबोडिया, खुद भारत, लाओस, बर्मा, नेपाल तथा फिलिपीन्स जैसी छह सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्थाएं और शीर्ष 15 सेनाओं के ठिकाने मौजूद हैं। इस दिशा में पहल ट्रम्प के पूर्ववर्ती बराक ओबामा के आठ वर्षों में हुई। ओबामा प्रशासन की ‘एशिया पेसिफिक रिबैलेंस स्ट्रैटेजी’ ने अन्य बातों के अलावा भारत की पूर्वी एशिया संबधी नीति से तालमेल बैठाया। इसे ही ट्रम्प की इंडो-पेसिफिक नीति की पृष्ठभूमि माना जा सकता है।


पिछले कुछ हफ्तों की घटनाओं से अमेरिका की यह इच्छा जाहिर होती है कि भारत इंडो-पेसिफिक क्षेत्र में ‘स्काय इज द लिमिट’ वाली भूमिका निभाएं। 30 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे और ट्रम्प ने जी-20 समूह की बैठक के मौके पर ब्यूनस आयर्स में बैठक की। तीनों नेताओं की बैठक को ऐतिहासिक बताया गया, जिसे प्रधानमंत्री ने ‘जय’ कहकर उचित ही वर्णित किया है। मोदी ने ब्यूनस आयर्स में पत्रकारों से कहा, ‘जब आप तीनों देशों के संक्षिप्त रूप ‘जेएआई’ को देखते हैं तो यह अच्छा संदेश देता है, क्योंकि हिंदी में इसका मतलब है सफलता’। उस वक्त उनके साथ ट्रम्प व आबे भी थे।


ट्रम्प ने भारत और जापान के साथ अमेरिका के रिश्तों को अत्यधिक मजबूत बताया। व्हाइट हाउस ने भी त्रिपक्षीय शिखर बैठक को ऐतिहासिक बताया। उसने इसे ट्रम्प के इंडो-पेसिफिक विज़न का हिस्सा बताया।  ओबामा प्रशासन के वक्त के अधिकारियों ने यह त्रिपक्षीय बैठक शुरू करने के लिए प्रमुख भूमिका निभाई थी और उन्होंने ताजा घटनाक्रम को सुखद आश्चर्य बताया है। लेखक से पिछले हफ्ते चर्चा करते हुए उनमें से एक अधिकारी ने कहा, ‘हम इस दिशा में बरसों से काम कर रहे थे पर किसी न किसी कारण से यह बैठक हो नहीं पाई। तीनों देशों के नेताओं का एक मंच पर आना सपना साकार होने जैसा है।’ यह अधिकारी वैसे ट्रम्प की विदेश नीति के कटु आलोचक हैं।


हालांकि, ऐसी बैठकों के भविष्य के बारे में तीनों देशों ने कुछ नहीं कहा है लेकिन, जाहिर है कि यह शिखर बैठक अपवाद नहीं थी और जो इस पहल को गहराई से जानते हैं उनका कहना है कि इसमें ‘और भी कुछ’ होने वाला है। इस बैठक के कुछ दिनों बाद रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन वाशिंगटन की पांच दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर आईं। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन के रिवर रोड प्रवेश द्वार पर उनका मेजबान रक्षा मंत्री जनरल (रिटायर्ड) जेम्स मैटिस ने लाल कार्पेट और बंदूकों की सलामी से स्वागत किया, तो यह दुर्लभ मौका था।

 

अपनी रक्षा पर अपने संसाधन खर्च करने को तैयार आर्थिक रूप से मजबूत भारत ट्रम्प को काफी पसंद आया है। ट्रम्प उन अमेरिकी सहयोगियों के आलोचक रहे हैं, जिनकी रक्षा अमेरिका को अपने करदाताओं के धन से करनी पड़ती है। उसे देखते हुए अधिकारियों को लगता है कि भारत अमेरिका पर बोझ नहीं बल्कि उसका स्वाभाविक सहयोगी है। भारत ने वहां जो सकारात्मक माहौल बनाया है वह पिछले माह व्हाइट हाउस में मनाई गई दीपावली में नज़र आया। इसमें ट्रम्प ने न सिर्फ अमेरिका में भारत के राजदूत नवतेज सिंह सरना को आमंत्रित किया बल्कि उनके साथ मंच भी साझा किया और भारत तथा प्रधानमंत्री मोदी के साथ अपने संबंधों को काफी महत्व दिया। 


इसके कुछ दिनों के भीतर ही  उपराष्ट्रपति माइक पेंस पूर्वी एशिया के शिखर सम्मेलन के मौके पर मोदी से मिले। जाहिर है दोनों नेताओं के बीच इंडो-पेसिफिक क्षेत्र चर्चा का फिर मुख्य बिंदु रहा होगा। मोदी से मिलने के बाद पेंस ने ट्वीट किया, ‘स्वतंत्र व खुले इंडो-पेसिफिक के साझा विज़न पर चर्चा हुई और सुरक्षा को मजबूत करने और आतंकवाद विरोधी सहयोग व समन्वय के प्रति वचनबद्धता जाहिर की गई।’ चूंकि भारत अपने रक्षा बलों को विस्तार और मजूबती देने के लिए तैयार है  खासतौर पर हिंद महासागर में, तो ट्रम्प प्रशासन ने भी भारतीय जरूरतों के लिए अपनी हाई टेक रक्षा इंडस्ट्री और सैन्य सामग्री उपलब्ध कराने पर सहमति दी है। अब भारत अमेरिका का प्रमुख रक्षा भागीदार है।

 

ट्रम्प प्रशासन ने भारत को वह अमेरिकी सैन्य सामग्री उपलब्ध कराने के लिए कई नियम-कायदे और निर्यात नियंत्रण शिथिल किए हैं, जो पहले भारत की पहुंच के बाहर थी। लेकिन, अमेरिका अच्छी तरह जानता है कि भारत की सैन्य शक्ति को बिना आर्थिक शक्ति बढ़ाए नहीं मजबूत किया जा सकता। रक्षा के मामले में भारत अमेरिकी सहयोगियों की तरह बोझ बनने की बजाय आत्मनिर्भर बने इसके लिए ट्रम्प प्रशासन अब मोदी सरकार के साथ द्विपक्षीय व्यापार संधि पर काम कर रहा है ताकि भारत कम से कम एशिया में  इकोनॉमिक पावर हाउस के रूप में उभरे। भारत का रिकॉर्ड देखते हुए अमेरिकी वैचारिक समुदाय को नहीं लगता कि भारत कभी अमेरिकी हितों के लिए खतरा बन सकता है जैसा कि एशिया क्षेत्र में दूसरे बड़े देश के बारे में हुआ है।


रणनीतिक समुदाय का मानना है कि आर्थिक व सैन्य स्तर पर मजबूत लोकतांत्रिक भारत विश्व शांति और स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है। इसे ट्रम्प का व्हाइट हाउस भी सहमत है। इसीलिए मोदी-पेंस बैठक के पहले व्हाइट हाउस के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ‘इंडो-पेसिफिक क्षेत्र में भारत की भूमिका के लिए आसमान ही सीमा है।’ एशिया-पेसिफिक कहलाने वाले क्षेत्र को मार्च में ‘इंडो-पेसिफिक’ नाम दिया गया, जो अधिकारियों के मुताबिक क्षेत्र में भारत का स्वामित्व का दर्जा दर्शाता है।

 

चीन के हाल के आक्रामक व्यवहार को देखते हुए अमेरिका को लगता है कि भारत का अपनी भूमिका बढ़ाना क्षेत्र में संतुलन कायम रखने और शांति बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है। क्योंकि दुनिया का आधा जीडीपी (अमेरिका सहित) यहां से आता है और मोटेतौर पर वैश्विक समुद्री परिवहन का एक-तिहाई दक्षिण चीन सागर से गुजरता है। अमेरिका का चौथाई निर्यात यहां होता है और भारत व चीन को अमेरिकी निर्यात पिछले दशक में दोगुना से ज्यादा हो गया है। लेखक - ललित झा चीफ यूएस कॉरेस्पॉन्डेंट, पीटीआई (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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