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अंडर-30Y कॉलम: / ‘मी टू’ के दुखद प्रसंग की चर्चा के केंद्र में कौन होना चाहिए?



समर्थ कश्यप, 23 क्लस्टर इनोवेसन सेंटर, दिल्ली यूनिवर्सिटी समर्थ कश्यप, 23 क्लस्टर इनोवेसन सेंटर, दिल्ली यूनिवर्सिटी
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समर्थ कश्यप, 23 क्लस्टर इनोवेसन सेंटर, दिल्ली यूनिवर्सिटीसमर्थ कश्यप, 23 क्लस्टर इनोवेसन सेंटर, दिल्ली यूनिवर्सिटी
  • करंट अफेयर्स पर 30 से कम उम्र के युवाओं की सोच

Dainik Bhaskar

Oct 13, 2018, 12:13 AM IST

भारतीय मीडिया में हाल ही में आरोपों का उफान आया हुआ है और कई महिलाओं ने सोशल मीडिया को माध्यम बनाकर यौन प्रताड़ना के अनुभवों का जिक्र किया है। यह साहस का काम है। इस प्रक्रिया में उन्होंने भिन्न क्षेत्रों के कई जाने-पहचाने व्यक्तियों के नाम लिए हैं। इससे कई बुनियादी मुद्दों पर बहस छिड़ गई है, जो न सिर्फ मीडिया को बल्कि व्यापक भारतीय आबादी को पंगु बनाए हुए हैं। इन मुद्दों में सहमति, सत्ता की राजनीति और अंतरंग लिप्तता आदि शामिल हैं।


जहां यह उत्साहवर्धक है कि लंबे समय से समाज की निचली सतह में खदाबदा रहे इन मुद्दों पर व्यापक चर्चा चल रही है वहीं, खबरों और निजी स्तर पर हो रही चर्चा को निकट से देखें तो एक अलग ही चित्र दिखाई देता है। इनमें से कई रिपोर्ट और विचार-विमर्श के केंद्र में यौन प्रताड़ना के आरोपित व्यक्ति हैं। इस अभिनेता ने यह किया, उस वरिष्ठ पत्रकार ने वह किया जैसी बातें। सारा जोर उस दुर्व्यवहार पर है, न कि उसकी शिकार हुई महिलाओं पर हुए असर पर। 


असाधारण साहस दिखाने वाली ये महिलाएं अब भी हमारी चर्चा और बहस में दोयम स्थान रखती हैं। उनके दुखद अनुभव और यंत्रणाओं को ज्यादा महत्व नहीं दिया जा रहा है। महत्व इस बात का है कि फलाना अभिनेता इतना संस्कारी नहीं है आदि। इससे पता चलता है कि महिलाओं के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार हमारी चेतना की कितनी गहराई तक मौजूद है, जब कि सारी बहस उनसे निर्मित सहानुभूति से ही पैदा हुई है और वही केंद्र में होना चाहिए।


हमें अपनी पूरी ज़िंदगी में सिखाया गया –फिर चाहे स्कूल हो, कॉलेज हो या जॉब हो- कि आप जो भाषा इस्तेमाल करते हैं उसका बहुत महत्व है। हम जो बात करते हैं उसकी न सिर्फ सामग्री बल्कि जिस भाषा में हम विचार-विमर्श व बहस करते हैं, उसका भी बड़ा महत्व है। क्योंकि भाषा के भीतर ही सूक्ष्म संकेत मौजूद होते हैं, जो हमें इस बारे में बहुत कुछ बताते हैं कि जिस मुद्दे पर बहस हो रही है, उसे किस तरह लिया जा रहा है। हैशटेग ही व्यथा कहने वाले की ओर ध्यान खींचता है # Me Too। फिर भी पूरे  मामले में जो गौण हैं वे हमारी चर्चा के ‘विषय’ क्यों हैं? हमारे विमर्श में प्रताड़ना की कहानी बताने वालों को ऑब्जेक्ट के रूप में स्थान क्यों मिलना चाहिए? यही वक्त है कि हम सोच-समझकर उस तरीके को बदलें, जिस तरह से हम इन मुद्‌दों पर बहस और चर्चा करते हैं। आइए, उन लोगों की आवाज को ‘अपराध से निपटने’ के नाम पर दबने न दें, जो वास्तव में इस चर्चा के केंद्र में हैं।


‘मी टू’ के इस अभियान ने महिलाओं में व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से अपने साथ हो रहे अनुचित व्यवहार के खिलाफ उठने का साहस दिया है। उन्हें केंद्र में रखकर हुई कोई भी सार्थक बहस ही सामाजिक और मानसिक स्तर पर बदलाव ला सकती है। वरना आरोपित पर बहस केंद्रित रही तो यह अपराध की मामलू समस्या बनकर रह जाएगी। जबकि इसका दायरा कहीं अधिक व्यापक है। अब चूंकि यह मुद्‌दा सतह पर आ ही गया है तो हमें इसका फायदा उठाकर अपने समाज की साफ-सफाई कर लेनी चाहिए।

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