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महाभारत 2019 / अब अलग विदर्भ की मांग चुनावी मुद्दा बनेगी, इसके कोई आसार नहीं



vidarbha maharashta ground report under bhaskar mahabharat 2019
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vidarbha maharashta ground report under bhaskar mahabharat 2019
  • भाजपा इसका समर्थन करती रही है, लेकिन शिवसेना के विरोध के आगे वह भी चुप
  • किसानों की आत्महत्या और विकास सबसे बड़ा मुद्दा रहेगा

Dainik Bhaskar

Oct 12, 2018, 07:45 AM IST

रमाकांत दाणी| नागपुर (महाराष्ट्र). ‘भूल जाइए विदर्भ राज्य। कोई कुछ नहीं देने वाला। वैसे भी कुछ गिने-चुने लोग ही चिल्लाते रहते हैं कि विदर्भ दो...। आम जनता में कहां दिखती है विदर्भ की मांग?’ यह जवाब हमें 55 साल के विजय बावीसकर से मिला, जब हमने विदर्भ में राजनीति के रुख को लेकर उनका मन टटोला। नागपुर के सबसे पुराने महल परिसर में कभी कपड़े की दुकान लगाने वाले बावीसकर याद दिलाते हैं कि ‘विदर्भ राज्य सत्तर-अस्सी के दशक में जरूर मुद्दा हुआ करता था।

 

विदर्भवीर जांबुवंतराव धोटे जब घर से निकलते थे तो उनके साथ भारी भीड़ विदर्भ का नारा देते हुए निकलती थी। अब लोग इस मुद्दे को खोखला मानने लगे हैं। राजनीतिक पार्टियां भी मुद्दे पर कुछ नहीं कहतींंं।’ दरअसल अब इन्हें नहीं लगता कि उपेक्षा व किसानों की आत्महत्या जैसे मुद्दों को लेकर शुरू हुई अलग विदर्भ राज्य की मांग इस बार चुनावी मुद्दा बनेगी। वैसे पहले भी इस मुद्दे का असर चुनावों पर नहीं दिखा। राज्य के भूतपूर्व महाधिवक्ता श्रीहरि अणे, जिन्होंने अलग विदर्भ के लिए राजनीतिक आंदोलन खड़ा किया, वे स्थानीय चुनावों में असफल रहे।

 

भाजपा ने भी विपक्ष में रहते हुए इस आंदोलन को तूल देने की कोशिश की। मगर यह सफलता की कुंजी नहीं बन पाया। छब्बीस साल पहले भुवनेश्वर में हुई भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में अलग विदर्भ की मांग को लेकर प्रस्ताव पारित किया गया था। तब से अब तक विदर्भ राज्य की मांग भाजपा के चुनावी घोषणा-पत्र का प्रमुख हिस्सा रही है। 2014 में कुछ विदर्भवादी आंदोलनकारियों के आग्रह पर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने तो राज्य के लिए लिखित वादा तक किया था। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने महाराष्ट्र का नेतृत्व संभालने से कुछ दिन पहले यह तक कह दिया था कि ‘मैं महाराष्ट्र के बजाय विदर्भ का मुख्यमंत्री होना पसंद करूंगा।’ मगर महाराष्ट्र में सत्ता में भागीदार शिवसेना के विरोध के चलते भाजपा नेता इस मुद्दे से बच रहे हैं।

 

किसका, क्या रुख? 
भाजपा : 
पार्टी अलग विदर्भ राज्य की पक्षधर तो है, मगर गठबंधन (एनडीए) को लेकर चिंतित है। वह किसी भी कीमत पर शिवसेना का साथ चाहती है। अगर शिवसेना साथ छोड़ती है तो भाजपा को खासकर पश्चिमी विदर्भ में कुछ हद तक नुकसान उठाना पड़ सकता है। ऐसे में भाजपा के कुछ नेताओं का कहना है कि विदर्भ का मुद्दा विकास से जुड़ा है। हम यहां विकास पर ध्यान दे रहे हैं।
शिवसेना : संयुक्त मराठी राज्य की पक्षधर शिवसेना शुरू से ही अलग विदर्भ की मांग का विरोध करती रही है।
कांग्रेस-एनसीपी : पार्टी में विदर्भ के कुछ गिने-चुने नेता ही अलग विदर्भ की मांग का समर्थन करते हैं।
बसपा-रिपब्लिकन पार्टी : इनके लगभग सभी गुट अलग विदर्भ की मांग करते रहे हैं। मगर इनका विदर्भ में कोई खास जनाधार नहीं है।

 

पिछले चुनावों में भी सत्ताविरोधी लहर और मोदी रहे फैक्टर : 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा-शिवसेना गठबंधन ने विदर्भ में सभी दस सीटों पर सफलता पाई थी। कांग्रेेस तथा एनसीपी को कोई सीट नहीं मिली। भाजपा की इस अभूतपूर्व जीत को मोदी के जादू व कांग्रेस-एनसीपी के विरोध की लहर का असल माना गया। मगर तब भी कांग्रेस-एनसीपी के विरोध का कारण किसानों की बढ़ती आत्महत्या का मुद्दा रहा। अलग विदर्भ का मुद्दा प्रभावी नहीं रहा।

 

‘यह मुद्दा सिर्फ चुनावी जुमला’ : विदर्भ में किसानों की आत्महत्याओं का मुद्दा चर्चा में लाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता किशोर तिवारी का मानना है कि ‘अलग विदर्भ का मुद्दा 2014 में नहीं चला। 2019 में भी इसके चलने की संभावना नहीं दिखती। कुछ राजनीतिक पार्टियों ने इसे सिर्फ चुनावी जुमले के तौर पर इस्तेमाल किया है। अब उन्हें भी इस मुद्दे को भुनाने में कोई लाभ नहीं दिखता।’
 

महाराष्ट्र के 11 जिले विदर्भ का हिस्सा 
1
.नागपुर, 2. अमरावती, 3. वर्धा, 4. अकोला, 5. वाशिम, 6. यवतमाल, 7. चंद्रपुर, 8. गढ़चिरौली, 9. भंडारा, 10. गोंदिया, 11. बुलढाणा।

 

विदर्भ में लोकसभा सीटों का गणित
कुल लोकसभा सीटें- 10
2014 में भाजपा को- 6
शिवसेना को मिलीं- 4

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