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महाभारत-2019 / आरएसएस का एक ग्रुप मोदी में समाया, अगला प्रधानमंत्री निश्चित रूप से मराठी ही होगा: दर्डा



विजय दर्डा चेयरमैन, लोकमत ग्रुप ऑफ न्यूजपेपर्स विजय दर्डा चेयरमैन, लोकमत ग्रुप ऑफ न्यूजपेपर्स
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विजय दर्डा चेयरमैन, लोकमत ग्रुप ऑफ न्यूजपेपर्सविजय दर्डा चेयरमैन, लोकमत ग्रुप ऑफ न्यूजपेपर्स

दर्डा ने कहा- सबसे बड़ी गलती यह हुई कि रघुराम राजन को देश से जाने दिया

राज्यसभा सदस्य रहे दर्डा ने कहा- सरकार की नजर में रफाल, व्यापमं कुछ नहीं

 

Dainik Bhaskar

Oct 13, 2018, 10:20 AM IST

वर्ष 1998 से 2016 तक राज्यसभा सदस्य रहे और लोकमत ग्रुप ऑफ न्यूजपेपर्स के चेयरमैन हैं विजय दर्डा। देश के वर्तमान राजनीतिक हालात और 2019 के आम चुनाव के परिदृश्य और संभावनाओं पर भास्कर के धर्मेन्द्र सिंह भदौरिया ने विशेष चर्चा की।

 

सवाल: क्या सिर्फ महागठबंधन ही मोदी को हरा सकता है? या मोदी को हरा पाना मुश्किल है?
 

जवाब: आज महागठबंधन बनने में काफी दिक्कतें हैं। ये समय के साथ बनता है। आप इस पर मत जाइए कि मध्य प्रदेश और राजस्थान में क्या हुआ। देश का चित्र यूपी और महाराष्ट्र बदल देंगे। मायावतीजी को मुलायम सिंह से परेशानी थी, एक दूसरे के जानी दुश्मन थे। वो समस्या अखिलेश जी के साथ नहीं है और इसलिए गठबंधन तय है। छोटे-छोटे दलों की अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं, जिन्हें संभालने में एनडीए असफल रहा। मोदीजी के आने के बाद बीजेपी उनके पीछे चली गई, बीजेपी को संभालने वाला आरएसएस भी उनके पीछे चला गया है। आरएसएस का एक ग्रुप मोदीजी में समा गया है। हालांकि जब इंदिरा गांधी और संजय गांधी तक खुद हार गए तो चुनावों में हार-जीत सब संभव है। 

 

सवाल: भाजपा के पास मुद्दे क्या होंगे?
 

जवाब: सरकार आएंगी, सरकार जाएंगी लेकिन लोकतंत्र जिंदा रहना चाहिए। नई पीढ़ी जिसने पहली बार वोट किया उसके साथ विश्वासघात हुआ है, उसका भरोसा टूटा है। युवाओं के दिमाग में सकारात्मकता की जगह नकारात्मकता की ज्यादा चिंता है। लोकतंत्र में तो सरकारें आती-जाती हैं। अच्छा है आना जाना चाहिए सरकारों को। बहता पानी जितना रहेगा अच्छा रहेगा। भाजपा बताने के लिए तो यही कहेगी कि विकास किया, मेक इन इंडिया किया, दुनिया में नाम किया, लेकिन वो सच में हासिल हुए हैं क्या? फिर राम मंदिर, हिंदू-मुस्लिम विवाद को लाएंगे, ध्रुवीकरण करेंगे।

 

सवाल: इस चुनाव में कांग्रेस के पास मोदी सरकार के खिलाफ क्या मुद्दे हैं?
 

जवाब: कांग्रेस के पास तो बहुत सारे मुद्दे हैं। महंगाई, पेट्रोल-डीजल के दामों में वृद्धि, घरेलू गैस की कीमतों में वृद्धि, रफाल डील में अनियमितताएं, किसान, बेरोजगारी और सांप्रदायिकता  मुद्दा है। कश्मीर में पहले कभी इतनी खराब स्थिति नहीं हुई। यह भी मुद्दा है। सवाल है कि कांग्रेस इसको कितने प्रभावी ढंग से रखती है। राहुल गांधी काफी प्रयास कर रहे हैं। अच्छी बात यह है कि वो जल्दी में नहीं हैं।

 

सवाल: चेहराविहीन विपक्ष मोदी का सामना कर पाएगा?
 

जवाब: मुझे लगता है कि चेहरा अमूर्त है, सवाल तो मुद्दे का है। चेहरे की आवश्यकता नहीं है। चेहरे बहुत हैं हमारे सामने। यह क्षेत्रीय पार्टियों का युग हो गया है। अब कांग्रेस अपने बल पर या भाजपा अपने बल पर सरकार बनाने के दिन चले गए। मुझे निश्चित रूप से ऐसा लगता है कि अगला प्रधानमंत्री जो भी बनेगा वो मराठी होगा।  

 

सवाल: यदि चुनाव में मोदी सरकार को पूर्ण बहुमत नहीं मिला तो विपक्ष की ओर से प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे सक्षम व्यक्ति कौन है और क्यों?
 

जवाब: दो लोग मुझे नजर आते हैं एक हैं राहुल गांधी और दूसरे हैं शरद पवार। राहुल जी को जल्दी नहीं है, वह सत्ता की चाह रखने वाले व्यक्ति नहीं है। सब लोग मिलकर बोलें तो बात अलग है। अगर वो मना करते हैं तो शरद पवार हैं। जैसा मैंने कहा हमारे पास जो दो मराठी लोग हैं वो बनेंगे। भाजपा की सीटें कम रहती हैं तो नितिन गडकरी।

 

सवाल: 2014 में भाजपा ने गुजरात और हिन्दीभाषी राज्यों में लगभग 50% सीटें जीती थीं। यहां भाजपा सीटें गंवाती है तो कहां से इनकी पूर्ति कर पाएगी?
 

जवाब : महाराष्ट्र में भी 42 सीटें जीती थीं। वोटिंग तो हिंदुस्तान में ही होगी (हंसते हुए)। नाॅर्थ ईस्ट और कर्नाटक में कुछ सीटें बढ़ सकती हैं। और कहीं देश में नहीं लगता कि भाजपा की सीटें बढ़ेंगी। अभी तो बीजेपी के साथ सहयोगी ही नहीं है तो सीटें कहां से लाएंगे?

 

सवाल: यूपी में सपा-बसपा गठबंधन होता है तो क्या राज्य में भाजपा 71 सीट पर जीत का प्रदर्शन दोहरा पाएगी?
 

जवाब: जहां तक मेरी समझ है उनका गठबंधन हो चुका है। प्रयास हो रहे हैं कि उसको कैसे तोड़ा जाए। कांग्रेस भी उत्तर प्रदेश में गठबंधन के साथ होगी। गठबंधन होने के बाद भाजपा को यूपी में 15 से 20 सीटें ही मिल पाएंगी।

 

सवाल : विपक्ष का आरोप है कि मोदी सरकार में सांप्रदायिकता-कट्‌टरता बढ़ी है। आप क्या मानते हैं?
 

जवाब : देश में निश्चित रूप से सांप्रदायिकता और कट्‌टरता बढ़ी है। सरकार सांप्रदायिकता बढ़ा रही है ऐसा मैं नहीं मानता। मगर, ऐसे तत्वों पर अंकुश लगाने में सरकार नाकामयाब हुई है। आप इस देश से मुसलमानों को निकाल सकते हैं क्या? जितना अधिकार आपका है हिंदुस्तान पर उतना ही मुसलमानों का भी है। तो हम मुद्दों को क्यों छोड़ रहे हैं, देश में बेरोजगारी, भुखमरी मुद्दा है। आज भी ओडिशा में लाश को अपने कंधे पर उठाकर ले जाना पड़ता है। सांप्रदायिकता, कट्‌टरता देश के लिए खतरा है, काेई भी देश इसे सहन नहीं कर सकता।  

 

सवाल : सरकार के आंकड़ों को विपक्ष झूठा बता रहा है। क्या वास्तव में देश में आंकड़ों की बाजीगरी चल रही है?
 

जवाब : आंकड़े की स्पष्टता नहीं होगी तो शंका स्वाभाविक है। आम आदमी आंकड़ों में नहीं रहता, वह देखता है कि महंगाई क्या है? पेट्रोल-डीजल-गैस-कैरोसीन, दवा, फर्टिलाइजर के भाव का उसकी जेब पर क्या असर पड़ रहा है।

 

सवाल : अभी तक सरकार में भ्रष्टाचार का कोई भी बड़ा मामला सामने नहीं आया है, क्या वास्तव में ये सरकार भ्रष्टाचार मुक्त है?
 

जवाब : सरकार भ्रष्टाचार मानती ही नहीं है। उसकी नजर में रफाल कुछ नहीं है, व्यापमं कुछ नहीं है, छत्तीसगढ़ में कुछ नहीं है, राजस्थान में कुछ नहीं है। कहीं कुछ नहीं है। कांग्रेस भ्रष्टाचार मानती थी इसलिए मुख्यमंत्री, सांसदों आदि पर कार्रवाई करती थी।

 

सवाल : अर्थव्यवस्था से जुड़े मोदी सरकार के दो बड़े फैसले- नोटबंदी, जीएसटी को आप कैसे देखते हैं। क्या ये सफल हैं?
 

जवाब : इन फैसलों से हमारी अर्थव्यवस्था बहुत पीछे गई है। सबसे बड़ी गलती यह हुई कि रघुराम राजन को देश से जाने दिया। यह भूल थी, क्योंकि वो आदमी सिद्धांतवादी था। जहां-जहां भी दुनिया में नोटबंदी हुई वो फेल हुई। नोट बंदी से देश का बड़ा नुकसान हुआ, उद्योग धंधों पर प्रतिकूल असर हुआ, रोजगार छिने, कुछ लोगों के प्राण ही चले गए। बाजार आज तक नोटबंदी से उबर नहीं पाया। जीएसटी की जो कल्पना डॉ. मनमोहन सिंह की थी, कांग्रेस पार्टी की थी और जो लाया गया उसमें जमीन-आसमान का अंतर है। जीएसटी की आवश्यकता है, लेकिन उससे परेशानियां नहीं होनी चाहिए। पेट्रोल-डीजल को इसके अंदर लाना चाहिए।

 

सवाल : मोदी सरकार की दो बड़ी कामयाबी और दो असफलताएं बताइए?
 

जवाब : स्वच्छता अभियान अच्छा है, मुझे नहीं लगता कि गांधीजी का जितने अच्छे ढंग से मोदी ने इस्तेमाल किया उतना कांग्रेस भी नहीं कर पाई। यह उनकी उपलब्धि है। दूसरी, उपलब्धि आयुष्मान स्कीम है। यह ढंग से लागू हो तो वरदान होगी, लेकिन मुझे इसे लागू करने को लेकर शंका है। गरीबों को सस्ती दवाई और स्वास्थ्य सुविधाएं मिलनी चाहिए, स्वास्थ्य सुविधाएं गांवों तक पहुंचनी चाहिए। पहली असफलता, पड़ोसी देशों से बहुत बुरे संबंध हैं। दूसरी असफलता, असहिष्णुता की है।

 

सवाल : धारणा बन रही है कि जर्नलिस्ट या तो राइटिस्ट है या लेफ्टिस्ट है या एक्टिविस्ट हैं। वह टीवी पर जज की तरह फैसले सुना रहा है। क्या आपको भी ऐसा लगता है?
 

जवाब : काफी हद तक यह सही है और इसका दुष्परिणाम भी हो रहा है। मीडिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो गए हैं। किसी भी पत्रकार से यह अपेक्षा रहती है कि वह सच कहे, सच का समर्थन करे, निष्पक्ष रहे। झूठ को बिना किसी किंतु-परंतु के सामने लाए। यह दुर्भाग्यपूर्ण है।

 

सवाल : मीडिया बंटा हुआ है। या तो प्रो-मोदी हैं या एंटी-मोदी। ऐसी धारणा बन रही है कि बड़े पत्रकार भी तटस्थ नहीं हैं?
 

जवाब : बिना दुराग्रह के रिपोर्टिंग होनी चाहिए। दुर्भाग्यपूर्ण रूप से ऐसा होता नजर नहीं आता। इसमें इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में थोड़ा फर्क करना चाहूंगा। प्रिंट मीडिया पर आज भी लोगों को विश्वास है। अखबार से यह अपेक्षा है कि निष्पक्ष होकर और किसी भी पार्टी का पक्ष लिए बिना कार्य करे। बैलेंस रखना चाहिए। हमने अपने लोकमत में ऐसा करने का प्रयास किया है। मुझे ही लीजिए मैं एक विचारधारा से आता हूं, 18 साल सांसद रहते हुए 16 साल कांग्रेस में रहा लेकिन इसका मेरे अखबार पर कोई असर नहीं है। आप देख सकते हैं।

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