संपादकीय / क्या संदेश दे रहा है बारिश से बेहाल मुंबई महानगर?



What is the message of rain weather in the Mumbai metropolis?
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What is the message of rain weather in the Mumbai metropolis?

Dainik Bhaskar

Jul 03, 2019, 12:49 AM IST

जैसे कोई पैथालॉजिकल रिपोर्ट मानव शरीर के रोगों की जानकारी देती है, उसी तरह देश में बारिश के बाद आने वाली खबरें भी शहरों की पैथालॉजिकल रिपोर्ट हैं। पांच दिनों से भारी वर्षा का सामना कर रही देश की औद्योगिक राजधानी मुंबई की पैथालॉजिकल रिपोर्ट सबसे खराब है। वहां दो दर्जन से ज्यादा लोग वर्षाजन्य हादसों में मारे गए हैं, जिनमें दीवार ढहने और बिजली का करंट लगने से मारे गए लोग शामिल हैं। जब हम दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के सपने देख रहे हैं, तब वर्षा के दौरान सिर्फ करंट लगने से लोगों का मारा जाना और वह भी मुंबई जैसे शहर में, क्या बताता है? यही कि हम बीती घटनाओं से कुछ नहीं सीखते।

 

इस महानगर की पुरानी समस्याएं तो कायम है ही, नई और खड़ी हो रही हैं। नई टेक्नोलॉजी आई है और उससे किसी समस्या का समाधान करना तुलनात्मक रूप से आसान हुआ है लेकिन, आपदा प्रबंधन को लेकर हम प्राथमिक कक्षा से ऊपर जाने को तैयार ही नहीं हैं। थाईलैंड की गुफा में अटके खिलाड़ियों को बचाने के लिए भारतीय टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल पर हमने अपनी पीठ खूब थपथपाई लेकिन, मुंबई में जलजमाव की समस्या दूर करने के लिए न तो देश की सर्वाधिक धनी महानगर पालिका कुछ करती है, न महाराष्ट्र सरकार।

 

मुंबई की भौगोलिक रचना ऐसी है कि भारी वर्षा के साथ समुद्र में ज्वार आने पर समुद्र सतह से नीचे के भागों में पानी का निकास नहीं हो पाता। इस हकीकत के बावजूद बरसों-बरस यह समस्या मालूम होने के बाद भी समाधान निकालने लायक टेक्नोलॉजी शासन को उपलब्ध न हो सके तो यह बहुत ही दुखद स्थिति है। मुंबई की इस हालत के अधिकांश कारण मानवनिर्मित हैं। जहां पहले जलजमाव होता था, वहां मलबा डाला गया लेकिन पानी बहने के लिए जगह नहीं रखी। खाड़ी किनारे और समुद्र से लगे दलदली क्षेत्र में अतिक्रमण के कारण जलस्तर बढ़ने पर पानी घरों में आ जाता है।

 

खेदजनक है कि पानी ले जाने वाले प्राकृतिक प्रवाह रास्तों में बदल गए हैं, पेड़ नष्ट कर दिए गए हैं और जमीन को कंक्रीट से ढंककर हमने अपने विनाश की राह खुद साफ कर दी है। मुंबई का 2034 तक का प्लान तय है लेकिन, विडंबना यह है कि पिछले प्लान का 7 फीसदी पर भी अमल नहीं हो पाया है। मुंबई तो एक प्रतीक है। देश के सभी महानगर ही नहीं अधिकांश शहरों की यही दशा है। अब वक्त है कि पैथालॉजिकल रिपोर्ट देखकर बीमारी का मुकम्मल इलाज किया जाए।

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