मैनेजमेंट फंडा / अच्छा इंसान होना इस कलयुग में सबसे बड़ी योग्यता है

एन. रघुरामन

एन. रघुरामन

Jan 16, 2020, 12:12 AM IST

को लकाता एयरपोर्ट में अंदर आ रहे सभी यात्री देख सकते थे कि ममता अग्रवाल न सिर्फ बैगेज ट्रॉली के ऊपर पूरी तरह झुकी हुई थीं, बल्कि अपने पति तोलाराम पर भी, जो कि किसी हवाई यात्री के लिए असामान्य है। उनकी रीढ़ पर, कूल्हों के बिल्कुल ऊपर चौड़ा ऑर्थोपीडिक बेल्ट बंधा हुआ था, जिसे देखकर स्पष्ट था कि उनकी रीढ़ में कोई बड़ी परेशानी है।


ममता का एयरपोर्ट पर यह बुरा अनुभव मंगलवार सुबह करीब 10.15 बजे शुरू हुआ, जब वे और उनके पति कोलकाता एयरपोर्ट पर डिपार्चर गेट 2ए पर पहुंचे। जब उन्होंने गेट पर खड़े सीआईएसएफ के सुरक्षाकर्मी से व्हीलचेयर के बारे में पूछा, तो उसने उन्हें उस एयरलाइन (स्पाइसजेट) से संपर्क करने को कहा, जिससे वे सफर कर रही थीं।

सहारे के लिए सामान की ट्रॉली पर ही झुके-झुके वे स्पाइसजेट के काउंटर पर पहुंचीं। वहां उन्हें काउंटर नंबर 15 पर जाने को कहा गया। जब उन्होंने काउंटर पर निवेदन किया तो एक्जीक्यूटिव ने कहा कि यह संभव नहीं है। उस महिला एक्जीक्यूटिव का सीधा जवाब था, ‘आपने टिकट बुक करते समय इसकी रिक्वेस्ट क्यों नहीं की? अब व्हीलचेयर मिलना मुश्किल है।’

ममता और उनके पति द्वारा दी गई तमाम दलीलों और तर्कों को एक्जीक्यूटिव ने अनसुना कर दिया। यहां तक कि तोलाराम ने पत्नी की रीढ़ की समस्या के बारे में भी बताया। यह भी बताया कि गुरुवार को कोयंबटूर के गंगा हॉस्पिटल में ऑपरेशन है और हॉस्पिटल सर्जरी के कागज भी दिखाए, लेकिन एयरलाइन स्टाफ कथित तौर पर टस से मस नहीं हुई। यहां तक कि दूसरे यात्रियों द्वारा उसे समझाना बेकार रहा। 


तब एक यात्री जो लाइन में पीछे खड़ा था, आगे आया और एयरलाइन स्टाफ से निवेदन किया कि सभी औपचारिकताओं को भूलकर व्हीलचेयर उपलब्ध करवाएं, क्योंकि यह सभी को स्पष्ट था कि ममता कष्ट में हैं और उन्हें मदद की जरूरत है। उस यात्री ने काउंटर नंबर 16 के पास, केवल 10 मीटर की दूरी पर रखीं दर्जनभर से ज्यादा व्हीलचेयर्स की ओर इशारा किया।

लेकिन एयरलाइन स्टाफ अपनी बात पर अड़ी रही और इस बात पर कायम रही कि व्हीलचेयर्स नहीं हटाई जा सकतीं और ये उन्हीं यात्रियों के लिए हैं, जिन्होंने पहले से इन्हें बुक किया हो। एक्जीक्यूटिव यहीं नहीं रुकी। उसने कहा, ‘आप कॉल सेंटर पर फोन करें और वहां रिक्वेस्ट करें। मैं आपको व्हीलचेयर नहीं दे सकती। आप एक तरफ हो जाएं और मेरा समय बर्बाद न करें।’


इस बीच एक दूसरे यात्री ने एयरपोर्ट डायरेक्टर के ऑफिस में फोन कर दिया और कुछ ही मिनटों में एक सीनियर एयरलाइन एक्जीक्यूटिव आ गई और उसने व्हीलचेयर की व्यवस्था की। उसने ममता को हुई परेशानी के लिए उनसे माफी भी मांगी।


वरिष्ठ अधिकारी ने इसलिए भी माफी मांगी क्योंकि मामला न केवल उच्च अधिकारियों तक पहुंच गया था बल्कि साथी यात्री इस विवाद का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट कर रहे थे। रोचक बात यह है कि काउंटर पर बैठी उस युवा एक्जीक्यूटिव की तरफ से कोई माफी नहीं मांगी गई, जिसने व्हीलचेयर देने से इंकार कर दिया था। 


अब मेरा सवाल यह है कि क्या यह समझना इतना मुश्किल था कि यात्री को चलने-फिरने में परेशानी हो रही है और उसे मदद की जरूरत है? वे शायद नियम के अनुसार पहले से व्हीलचेयर बुक करना भूल गए होंगे, जो कि वैसे भी मुफ्त सुविधा है। अगर इस सुविधा के लिए पैसे लगते तो क्या एयरलाइन कर्मचारियों ने कंपनी का रेवेन्यू बढ़ाने के लिए आगे बढ़कर पैसे नहीं लिए होते? हमें मालूम है, वे ऐसा जरूर करते। 


व्हीलचेयर देने से इंकार करने वाली युवा एक्जीक्यूटिव का व्यवहार हमारे समाज में पढ़ाई और परवरिश के तरीकों पर सवाल उठाता है। क्या हम स्कूलों में पढ़ाई के अलावा किसी के अच्छे कार्यों को सम्मानित करते हैं? क्या हम मार्क्स की दौड़ के बीच बच्चों को मानवता का पाठ भी पढ़ाते हैं? अगर इन सवालों के जवाब न हैं, तो हम उस एक्जीक्यूटिव जैसे युवाओं से मानवीय व्यवहार करने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?

फंडा यह है कि इससे फर्क नहीं पड़ता कि आपने किस यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है। बेशक अच्छा इंसान होना ही इस कलयुग में सबसे बड़ी योग्यता है।

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