मैनेजमेंट फंडा / कार सफलता की, पैदल चलना गरीबी की निशानी नहीं है

एन. रघुरामन

एन. रघुरामन

Dec 04, 2019, 01:03 AM IST

बीते सोमवार मैं छत्तीसगढ़ सरकार के एक कार्यक्रम के लिए रायपुर में था। चूंकि मुंबई से रायपुर के लिए सुबह के समय कोई कनेक्टिंग फ्लाइट नहीं है, इसलिए मुझे मजबूरन सोमवार की फ्लाइट लेनी पड़ी और इस बात को लेकर मेरा दिमाग पूरी तरह खाली था कि मैं वहां शाम को क्या करूंगा? बाकी दिनों में मेरा पसंदीदा टाइम पास कार्यक्रम लोकल मार्केट घूमना और एक ‘फूडी’ होने के कारण देसी जायके चखना होता था! चूंकि मेरा पेट ठीक नहीं था, इसलिए मैंने कुछ खाने की बजाय वहां के लोकल थिएटर में जाने का फैसला किया।

हालांकि, मूवी कॉमेडी थी, लेकिन मेरी बाजू वाली सीट पर बैठा आदमी सबको गुस्सा दिला रहा था। फिल्म करीब आधी हो गई थी, बाजू वाले के फोन की घंटी बजने लगी और वह कई मिनट तक फुसफुसाता रहा, लेकिन उसकी आवाज सभी को सुनाई दे रही थी। आजू-बाजू बैठे दर्शकों की चिढ़ साफ दिख रही थी, लेकिन उनमें से कोई भी कुछ नहीं बोल रहा था, क्योंकि वह आदमी रायपुर की तथाकथित ‘रिच क्लास’ से था।

उसने पूरी फिल्म के दौरान तीन बार अपना ‘फोन वार्तालाप’ इसी तरह किया। फिल्म जब खत्म होने को थी, तो वह खड़ा हो गया और फोन पर किसी को जवाब देने लगा। मुझसे उठकर जाने के लिए जगह मांगने लगा। मैं थोड़ा चिढ़ गया और कहा ‘एक्सक्यूज मी, अगली बार आप मूवी देखने आएं तो अपना मोबाइल बंद रखिएगा। लेकिन उन शब्दों का उस पर असर नहीं हुआ, वह तेजी से मेरे पैर पर पैर रखता हुआ बाहर चला गया। वह इतना असभ्य था कि उसने माफी तक नहीं मांगी।


कुछ देर बाद जब मैं थिएटर से बाहर आया और अपने होटल की ओर पैदल चलने लगा, तभी एक कार लगभग ‘चीखती’ हुई मेरे पीछे आई। जैसे ही वह लिमोजिन मेरे करीब आई; उसका विंडो ग्लास नीचे आया और नजर आया कि ड्रायवर सीट पर वही आदमी बैठा था। मुझे देख वह कहने लगा ‘हैलो, क्या आपको पता है कि हम जैसे व्यस्त लोग कितना कुछ करते हैं? वो तो ठीक है, लेकिन आपने अंदर क्या कहा था?’ मैंने वही शब्द दोहरा दिए जो अंदर कहे थे।

तो वह ऐसे आंखें दिखाने लगा जैसे मैंने उसके ऊपर कोई बम फेंक दिया हो और फिर मुझसे बोला ‘पूरी दुनिया को सुधारने मत निकलो, इसकी बजाय जिंदगी में कुछ कमाई करो।’ मैंने उसकी बात का बड़ी विनम्रता के साथ उत्तर देते हुए कहा ‘महंगी कार आपकी सफलता की और मेरा पैदल चलना गरीबी की निशानी नहीं है।’ उसने सुनकर बड़ा बुरा सा मुंह बनाया और तेजी से निकल गया।

इस घटना के बाद जब मैं होटल लौटा और अपने ऑर्डर का इंतजार करने लगा। अपनी चिढ़ को होटल स्टाफ पर निकालने ही वाला था कि मेरी सहज बुद्धि ने मुझे रोका और मैंने सचमुच महसूस किया कि उस थिएटर वाले असभ्य आदमी ने अपना तनाव मुझ पर लाद दिया था। मैं सजग होकर शांत हो गया।


मैं ऐसे कई लोगों से मिला हूं, जिनके पास बहुत संपत्ति है, फिर भी वे तनाव में डूबे हुए हैं। दूसरी ओर, मैं उन लोगों को जानता हूं, जिन्हें मॉल में मल्टीप्लेक्स थिएटरों पर पैसा खर्च करना खर्चीला लगता है या वे सुबह के ऐसे शो का इंतजार करते हैं, जिसका टिकट किसी सिंगल स्क्रीन थिएटर के बराबर होता है, फिर भी वे हर पल का आनंद लेते हैं।

इस विरोधाभास को किसी समाजशास्त्री से पूछें, वे इस बात से सहमत होंगे कि जब जिंदगी में आराम बढ़ जाता है तो हम चुनौतियों का सामना करने में कमजोर पड़ जाते हैं। अपने शब्दों में कहूं तो आने वाले कल की दुनिया में जो लोग तनाव को ठीक से संभाल लेंगे, उन्हें बेहतर काम मिलेंगे और समाज भी उन्हें महत्व देगा। ऐसे लोगों से सभी दूर रहना चाहेंगे जो लोगों के बीच अपने स्टेटस का दिखावा करते हैं, क्योंकि वे स्वयं अपने तनाव को संभालने में नाकाबिल हैं।

फंडा यह है कि  महंगी कार, कपड़े, घर और करोड़ों की संपदा होना किसी इंसान की वास्तवित सफलता का प्रतीक नहीं है। निश्चित रूप से सड़क पर चलना गरीबी की निशानी भी नहीं है। अपने जैसों का सम्मान करना ही वास्तविक समृद्धि है!

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