मैनेजमेंट फंडा / किसी क्षेत्र में इनोवेशन करना है तो आंकड़ों को सावधानी से पढ़ें



If you have to innovate in a field then read the data carefully
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If you have to innovate in a field then read the data carefully

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एन. रघुरामन

एन. रघुरामन

Apr 15, 2019, 03:47 AM IST

आंकड़ों की कहानी : सबसे पहले यह तथ्य जान लें कि सड़क दुर्घटनाओं में 51 फीसदी शिकार पैदल चलने वाले होते हैं। मुंबई के दो प्रमुख हाईवे ही लीजिए- वेस्टर्न और ईस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे, जो प्राणघातक दुर्घटनाओं की दृष्टि अत्यधिक जोखिम वाले दो शीर्ष जगहों में शुमार हैं। 2018 में ही 475 लोग मारे गए, जिनमें से 51 फीसदी पैदल चलने वाले, जबकि 41 फीसदी बाइक चलाने वाले और पिछली सीट पर बैठने वाले थे। ये आंकड़ें उन तथ्यों का हिस्सा है, जो ब्लूमबर्ग फिलैंथ्रॉपीज ने तैयार किए है। यह संस्था मुंबई ट्रैफिक पुलिस और बृहन्मुंबई म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (बीएमसी) के साथ मिलकर काम कर रही है। गौरतलब है कि भारत में सड़क दुर्घटना में हताहतों की सालाना संख्या दुनिया में सबसे अधिक है, जो बहुत ही गंभीर तथ्य है।

 

इन पैदल चलने वालों में 58 फीसदी को तीन पहिया अथवा चौपहिया वाहनों ने टक्कर मारी, जबकि अन्य 26 फीसदी को मोटरसाइकिल ने टक्कर मारी। पैदल चलने वालों के साथ हुई प्राणघातक दुर्घटनाओं के लिए बसें सिर्फ 6 फीसदी घटनाओं के लिए जिम्मेदार रहीं। पता चला कि सप्ताह के कामकाजी दिनों में ये दुर्घटनाएं ज्यादातर रात 8 से 9 बजे के बीच और वीकेंड पर दोपहर बाद 2 से 3 बजे की बीच हुईं। हालांकि, 2018 में हुई 475 मौतों में 15 मौतें शराब पीकर ड्राइविंग करने से हुई थीं, जो करीब तीन फीसदी होती हैं।


मुंबई देश के उन 10 शहरों में से हैं, जिन्हें ब्लूमबर्ग फिलैंथ्रॉपीज ने बेहतर सड़क सुरक्षा की पद्धतियां अपनाने के पांच वर्षीय कार्यक्रम के लिए चुना है। उनका कहना है कि वर्तमान में किसी भी शहर में सड़कें सिर्फ वाहनों को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं, जिसमें पैदल चलने वालों से कोई राय नहीं ली जाती। उनका कोई ध्यान नहीं रखा जाता। उनका कहना है कि यदि स्थानीय स्वायत्त संस्थाएं सबसे ज्यादा जोखिम वाले तबके को ध्यान में रखकर रोड का डिज़ाइन बनाए तो डिज़ाइन को सारे यूज़र के लिए समावेशी डिज़ाइन कहा जा सकता है। गौरतलब है कि प्राणघातक दुर्घटनाओं में 93 फीसदी यही तबका शिकार होता है। अध्ययन में ब्लूमबर्ग फिलैंथ्रॉपीज के साथ जुड़े वर्ल्ड रिसोर्सेस इंस्टिट्यूट इंडिया ने बताया कि पूरी सड़क पर फुटपॉथ बनाने होंगे और क्रांसिंग पर भी पूरा संरक्षण हो तथा पैदल चलने वालों के लिए रेफ्यूज़ आइलैंड भी उचित तरह से डिज़ाइन किए जाएं।


इनोवेशन की कहानी : उपरोक्त आंकड़े सबके  लिए उपलब्ध है और विभिन्न एजेंसियों द्वारा दिए सुझावों पर स्थानीय स्वायत्त संस्थाएं इन पर विचार कर सकती हैं। लेकिन, आईआईटी मुंबई में इंडस्ट्रियल डिज़ाइन में एमटेक करने वाले डिनोज जोसेफ ने एक पोर्टेबल ऑपरेशन थिएटर (ओटी) निर्मित किया है। इसका उपयोग आपदा वाले और दूरवर्ती क्षेत्रों में किया जा सकता है। इस  पोर्टेबल ओटी में एक मच्छरदानी की तरह का 2.5 गुणा 1.8 मीटर का प्लास्टिक का रोगाणुहीन (स्टराइल) किया गया एन्क्लोज़र है। इस यूनिट में सर्जिकल गाउन, एक टेबल, एक हैंड वॉश यूनिट, सर्जिकल इंस्ट्रुमेंट बॉक्स,एयर प्यूरीपायर और एक मिनी एयरकंडिशनर है।


इस प्रोडक्ट को विक्टर मेनेजेस कन्वेंशन सेंटर पर शनिवार को आयोजित पांचवें सालाना मेडिकल डिवाइस एक्स्पो में प्रोडक्ट प्रदर्शित किया गया। िसे वर्ल्ड रिसोर्सेस इंस्टिट्यूट इंडिया के बायोमेडिकल इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी (इन्क्यूबेशन) सेंटर ने आयोजित किया। यह डिवाइस करीब 25 किलोग्राम का है और यह किसी बैकपैक में आसानी से समा सकता है। जोसेफ ने महसूस किया कि हो सकता है दुर्घटना के शिकार व्यक्ति या रोगी को निकटतम अस्पताल में लाना कीमती समय की बर्बादी साबित हो। जोसेफ ने अपने इस इनोवेशन का पेटेंट पाने का आवेदन किया है। वे डिवाइस की टेस्टिंग के लिए पैराट्रूपर सर्जन की एक टीम के साथ भी काम कर रहे हैं।  अभी तो पोर्टेबल ओटी जटिल ऑपरेशन की बजाय केवल जनरल सर्जरी और सी-सेक्शन के लिए ही उपयोगी है। लेकिन, इस डिवाइस को कभी भी उन्नत बनाया जा सकता है।


भारत कई चुनौतियों के साथ अवसरों की भूमि भी है खासतौर पर किफायती स्वास्थ्य रक्षा के क्षेत्र में। इस प्रदर्शनी में मौजूद हर छात्र एक ऐसा इकोसिस्टम निर्मित करने का प्रयास कर रहा है, जो डॉक्टरों, शोधकर्ताओं, इंजीनियरों और आंत्रप्रेन्योर को स्वदेशी मेडिकल इनोवेशन के लिए साथ लाएगा ताकि इस खामी की पूर्ति की जा सके। 

 

फंडा यह है कि     इनोवेशन क्या करना है इसके लिए आंकड़ों का स्पष्ट ब्योरा होना जरूरी है। यदि किसी छात्र को समझ में न आ रहा हो कि क्या करना चाहिए, तो उसे अपने क्षेत्र में आंकड़ों के साथ कुछ वक्त बिताना चाहिए।

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