--Advertisement--

मैनेजमेंट फंडा / दिमाग सुंदरता को उसी के खेल में हमेशा मात देता है!



management funda by n raghuraman
X
management funda by n raghuraman

Dainik Bhaskar

Nov 09, 2018, 12:47 AM IST

हम सभी ने फ्रांस की सिंड्रेला की परीकथा का कोई न कोई वर्जन जरूर सुना होगा। इस कथा के सभी वर्जन्स में मुख्य पात्र सिंड्रेला है। वह अपनी सौतेली मां और दो सौतेली झगड़ालु बहनों के साथ रहती थी। सिंड्रेला को सुबह से लेकर शाम तक घर का काम करना पड़ता था। उसे सर्दियों में आग जलाने के लिए मेहनत करनी पड़ती थी, ताकि बाकी लोगों को आराम मिल सके।

 

वह पूरे दिन खाना पकाती थी और आग जलाए रखती थी। सारा दिन राख और कोयले के अंगारों (जिसे अंग्रेजी में सिंडर कहते है), के बीच काम करने के कारण वह खुद की साफ-सफाई नहीं कर पाती थी, इसलिए उसका नाम ‘सिंड्रेला’ रख दिया गया। फिर एक परी मां सिंड्रेला को खूबसूरत राजकुमारी बना देती है, और उनकी मदद से सिंड्रेला एक राजकुमार से मिलती है।

 

राजकुमार को उससे प्यार हो जाता है। पर, अचानक एक समय सीमा से बंधी उसकी खूबसूरती का जादू खत्म हो जाता है और उसे राजकुमार के महल से भागना पड़ता है। राजकुमार सिंड्रेला को ढ़ूंढ़ते हुए उसके घर तक पहुंच जाता है, लेकिन सौतेली मां सिंड्रेला को राजकुमार से मिलने नहीं देती।

 

हालांकि, बाद में वे दोनों मिलते हैं, शादी करते हैं और खुशी-खुशी जीवन बिताते हैं। इस परीकथा ने हमारे मन में बैठा दिया कि हमें राजकुमार और सिंड्रेला की तरह खूबसूरत बनना होगा, नहीं तो हमारी जिंदगी नरक बन जाएगी। मुझे यह कहानी तब याद आई जब मैंने 17 साल के गणेश बरैया  के बारे में सुना, जिसका कद सिर्फ 3 फीट और वजन 14 किलो है।

 

गणेश भावनगर (गुजरात) के तलाजा तालुका के गोरखी गांव का रहने वाला है। एक बार गणेश के पिता विठ्ठलभाई को एक सर्कस मालिक ने 1 लाख रुपए देने की पेशकश की थी, जिसके बदले में वे गणेश को जोकर की तरह इस्तेमाल करना चाहते थे। इसके बाद से डर के मारे पिता ने गणेश को कहीं भी अकेले भेजना बंद कर दिया।

 

गणेश कद में चाहे छोटा था, पर उसके इरादे बड़े थे और वह डॉक्टर बनना चाहता था। जैसे सिंड्रेला को परी मां मिली थी, वैसे ही गणेश को नीलकंठ विद्यापीठ के ट्रस्टी डॉक्टर दलपत कटारिया गॉडफादर के रूप में मिले। उन्होंने गणेश को अपने संस्थान में मुफ्त में रहकर पढ़ाई करने से लेकर हर सुविधा मुहैया करवाई, क्योंकि ‘छोटा गणेश’ पढ़ाई में बहुत तेज था।

 

गणेश ने स्कूल में अच्छा प्रदर्शन किया और उसके बाद NEET की परीक्षा दी। उसने नीट की परीक्षा में 223 अंक हासिल किए, जबकि दिव्यांगों की उसकी श्रेणी में कट ऑफ सिर्फ 86 अंक का था। उसने इंडियन मेडिकल काउंसिल की प्रक्रिया के अनुसार मेडिकल टेस्ट दिया पर पैनल ने बिना कारण बताए उसे रिजेक्ट कर दिया।

 

जब वह दोबारा विचार करने का अनुरोध लेकर अहमदाबाद सिविल हॉस्पिटल की पैनल के सामने पहुंचा, तो इस पैनल ने भी उसे रिजेक्ट कर दिया। गुजरात हाईकोर्ट से भी उसे कोई खास मदद नहीं मिली। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ही उसकी आखिरी उम्मीद थी।

 

बीती 22 अक्टूबर को गणेश को न्याय मिला और सुप्रीम कोर्ट ने अगले सत्र के लिए गणेश का प्रवेश सुनिश्चित करने का आदेश दिया। गणेश के पिता एक गरीब किसान हैं और वे उसकी पढ़ाई का खर्च उठाने में समर्थ नहीं हैं। इसीलिए डॉ. कटारिया ही मेडिकल कॉलेज में उसकी पढ़ाई का खर्च उठाएंगे।

 

डॉ. कटारिया ने गणेश को अपना दूसरा बेटा माना है और पढ़ाई व कानूनी लड़ाई में अब तक 4 लाख खर्च चुके हैं। चूंकि वह गुजराती मीडियम से है और मेडिकल की पढ़ाई अंग्रेजी में होती है, इसलिए गणेश अंग्रेजी भाषा सुधारने में जुटा हुआ है। वह आगे पोस्ट ग्रेजुएशन करके स्किन स्पेशलिस्ट बनना चाहता है, पर अभी के लिए उसे दुनिया का सबसे छोटा डॉक्टर बनने से कोई नहीं रोक सकता।

 

फंडा यह है कि  सुंदरता अस्थायी उपलब्धि है और यह शायद प्रारंभ में जीतती हुई नज़र आए, पर लंबी दौड़ में यह दिमाग को कभी नहीं हरा सकती।

Bhaskar Whatsapp

Recommended

Click to listen..