मैनेजमेंट फंडा / दुर्भाग्य से निपटने का एक जरिया प्रार्थना भी है



management funda by n raghuraman
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management funda by n raghuraman

Dainik Bhaskar

May 17, 2019, 12:04 AM IST

मैनेजमेंट की पढ़ाई में  ‘जोहरी विंडो’ नामक तकनीक सिखाई जाती है। इसे मनोवैज्ञानिक जोसफ लफ्ट और हैरिंगटन इंगम ने विकसित किया था और यह लोगों को बाहरी दुनिया के साथ अपने संबंधों को बेहतर ढंग से समझने में मदद करती है। उनका ‘जोहरी’ मॉडल - उनके नामों के पहले अक्षरों से मिलकर बना है- ‘जो-हरी’- और इसे चार कमरों के चित्रों से समझाया जाता है। पहला कमरा हमारा स्वयं का हिस्सा होता है, जिसे हम और अन्य लोग देख सकते हैं। दूसरे कमरे को दूसरे तो देख सकते हैं, लेकिन हमें उसके बारे में पता नहीं होता। तीसरा कमरा निजी होता है यानी हम तो उसके बारे में जानते हैं, लेकिन दूसरों से छिपाते हैं। कमरा नंबर चार हमारा वह अचेतन हिस्सा है, जो न तो हमें और न ही दूसरों को नज़र आता है- जिसे भाग्य भी कहा जाता है। इसी मॉडल पर आधारित दो कहानियां कुछ ऐसी हैं।

 

कहानी 1:  मैं कम से कम ऐसे 30 परिवारों को जानता हूं, जिनके बच्चे सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ राजस्थान में पढ़ रहे हैं और जिन्होंने अपने बच्चों को खुश करने के लिए सभी जतन किए लेकिन, पांच साल बाद भी वे दुखी हैं!  जब इन बच्चों ने अपने माता-पिता से पूछा कि उनकी ज़िंदगी में मैथेमेटिक्स बतौर एक विषय कब दूर हो जाएगा, तो उनका जवाब था, ‘जब तुम 10वीं पास कर लोगे।’ जब वे 11वीं कक्षा में पहुंचे तो उन्होंने मैथ्स की बजाय बायोलॉजी विषय चुना, लेकिन फिजिक्स में मैथ्स की मौजूदगी उन्हें डराती थी। जब बच्चों ने पूछा कि उनकी ज़िंदगी से फिजिक्स कब विदा होगा, तो माता-पिता ने कहा, ‘जब तुम 12वीं पास कर लोगे।’ और तमाम मुश्किलों के बाद जब वे सफल हो गए तो, उनसे सेंट्रल यूनिवर्सिटी के कम्बाइंड एंट्रेस टेस्ट में बैठने को कहा गया और फिर माइक्रोबायोलॉजी में पांच साल के बीएससी और एमएससी इंटीग्रेटेड कोर्स का विकल्प चुना गया।  हालांकि, लेकिन उनकी किस्मत ही कुछ ऐसी थी, कोर्स में 12वीं कक्षा के स्तर का मैथ्स शामिल था और वे सभी 30 बच्चे पिछले पांच साल में उस एकमात्र विषय में पास नहीं हो पाए। विडंबना यह है कि अगर वे 2019 के फाइनल सेमेस्टर में मैथ्स में पास नहीं होते हैं तो उन्हें सिर्फ 12वीं पास ही माना जाएगा, भले ही उन्होंने पांच साल तक उच्च शिक्षा प्राप्त की है। अब यूनिवर्सिटी ने अगले अकादमिक सत्र से मैथ्स को हटा दिया है और इस तरह बैकलॉग के शिकार वे 30 बच्चे बच गए। हालांकि, इसी सप्ताह कुछ बच्चों की ओर से मिली आत्महत्या की धमकी के बाद प्रबंधन ने यह भी तय किया है कि वह इनके लिए एक महीने का क्रैश कोर्स इसी महीने से शुरू करेगा। 

 

कहानी 2: पत्नी के साथ उसके अच्छे संबंध नहीं थे, लेकिन वह अपनी बेटी के लिए प्यार करने वाला पिता था। चूंकि मां गृहिणी थी और कॉलेज के कोर्स के बारे में बहुत कम जानकारी रखती थीं, इसलिए पिछले हफ्ते कक्षा 12वीं की परीक्षा के नतीजों से पहले, 10वीं कक्षा में प्रथम स्थान पर रहने वाली 17 वर्षीय प्रतिभाशाली छात्रा ने ग्रेजुएट स्तर पर पत्रकारिता का कोर्स करने की इच्छा व्यक्त की। पिता ने विरोध किया और दबाव डाला कि वह केमेस्ट्री में बीएससी करे और एक शिक्षक बने। लेकिन, उसे 12 वीं में केवल 65% अंक प्राप्त हुए, जाहिर है इसकी वजह यह थी कि वह अपने माता-पिता के बीच झगड़ों से परेशान थी। परिणाम के तुरंत बाद उसके पिता बेटी के पासिंग सर्टिफिकेट्स लेकर बाहर चले गए ताकि वह अपने मन से कुछ और न कर सके। लड़की के सभी दोस्तों के बड़ी क्लास में एडमिशन हो गए, लेकिन वह पीछे रह गई, क्योंकि उसके पास ओरिजनल सर्टिफिकेट्स नहीं थे। लड़की को अचानक अपनी किताब के पीछे लिखा चाइल्डलाइन नंबर- 1098 नज़र आया और उसने मदद मांगी। चाइल्डलाइन ने चेन्नई पुलिस को दखल देने को कहा, जिसकी वजह से बुधवार को उसके पिता ने सर्टिफिकेट लौटा दिए। 

 

फंडा यह है कि  प्रत्येक की जिंदगी में कोई हिस्सा अनदेखा होता है। ऐसे में मुश्किल घड़ी में भावनात्मक शक्ति लगती है। प्रार्थना उसे पाने का जरिया हो सकती है।

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