पानी के लिए तीसरा विश्वयुद्ध? / पानी के लिए तीसरा विश्वयुद्ध?



एन. रघुरामन

एन. रघुरामन

Sep 30, 2019, 12:18 AM IST

‘कौन बनेगा करोड़पति’ के एक एपिसोड में यह खुलासा हुआ कि भारत पानी की कमी और अपव्यय के मामले में अग्रणी देश है। धरती के भीतर जल मिलने का स्तर घटता जा रहा है। इस वर्ष सभी जगह औसत से अधिक वर्षा हुई है परंतु पानी की हार्वेस्टिंग से अनभिज्ञ होने के कारण हम पानी का संचय नहीं कर पाए। इंदौर में विभावरी नामक संस्था यह काम कर रही है। घरों में पानी के नल बंद गिए जाने के बाद भी वे रिसते रहते हैं और बूंद-बूंद पानी के अपव्यय का अर्थ हम नहीं समझते। अरसे पहले एक विचारक ने यह आशंका व्यक्त की थी कि तीसरा विश्वयुद्ध पानी के लिए लड़ा जा सकता है। पानी की आवश्यकता ग्रामीण क्षेत्र में अधिक है परंतु महानगरों को पानी उपलब्ध कराया जा रहा है। महानगरों में साधन संपन्न व्यक्ति रहते हैं और अधिकांश कॉर्पोरेट के मुख्यालय महानगरों में हैं। देश के बैंक से जो धन निकाला जाता है, वह आकी-बाकी गलियों से होता हुआ महानगर ही पहुंचता है।


विगत दशक से शेखर कपूर ‘पानी’ नामक फिल्म बनाने के लिए पूंजी निवेशकों से मिलते रहे हैं परंतु वे अपनी पटकथा किसी को नहीं सुनाते, इसी कारण पूंजी निवेशक साथ नहीं दे रहे हैं। कभी-कभी वे एक या दो दृश्य सुनाते हैं, जिनका आपस में कोई संबंध सुनने वाले को नजर नहीं आता। ज्ञातव्य है कि शेखर कपूर देव आनंद की बहन के सुपुत्र हैं और पेशे से चार्टर्ड एकाउंटेन्ट रहे हैं। उन्होंने लंदन की अपनी नौकरी छोड़ दी और मुंबई में शबाना आजमी की सहायता से ‘मासूम’ बनाने में सफल रहे। एक अमेरिकी  फिल्म से प्रेरित यह फिल्म सराही गई और रुपए में चार आने का लाभ कमाया। शबाना आजमी और जावेद अख्तर ने निर्माता बोनी कपूर से शेखर की सिफारिश की और उन्होंने श्रीदेवी और अनिल कपूर अभिनीत ‘मि. इंडिया’ बनाई। इस फिल्म ने बहुत धन कमाया। इसके बाद शेखर कपूर ने कोई फिल्म पूरी नहीं की।


ज्ञातव्य है कि शेखर कपूर के मामा चेतन आनंद ने फ्योदोर दोस्तोवस्की की ‘लोअर डेप्थ’ से प्रेरित फिल्म ‘नीचा नगर’ बनाई थी। इस फिल्म के प्रदर्शन के लिए वितरक नहीं थे और पूंजी निवेशक ने इसका प्रिंट अपने कपड़े के गोडाउन में फिंकवा दिया था। किसी करीबी की सिफारिश पर पंडित जवाहरलाल नेहरू ने फिल्म देखी और इसके प्रदर्शन का उत्तरदायित्व लिया। पंडित नेहरू ने फिल्मकार अलेक्जेंडर कोरबा से सिफारिश करके फिल्म का इंग्लैंड में प्रदर्शन संभव कराया। इस विषय की पूरी जानकारी तथा नेहरू और चेतन आनंद के बीच हुए पत्र-व्यवहार का सप्रमाण ब्योरा उमा आनंद की किताब ‘द पोएटिक्स ऑफ चेतन आनंद फिल्म्स’ में उपलब्ध है। राजस्थान में पानी की समस्या पर ख्वाजा अहमद अब्बास ने सिमी ग्रेवाल अभिनीत फिल्म ‘दो बूंद पानी’ बनाई थी। बताया जाता है कि चांद पर पानी नहीं है, अत: वहां जीवन भी संभव नहीं है।


चेतन आनंद की ‘नीचा नगर’ में पहाड़ी पर रहने वाला धनाढ्य व्यक्ति नीचे की बस्ती में रहने वालों को पानी के लिए तरसा देता है। पानी का संचय पहाड़ी पर एक विराट टैंक में किया गया है। ‘नीचा नगर’ के प्रदर्शन के दशकों बाद अमिताभ बच्चन अभिनीत ‘मि. नटवरलाल’ में भी इसी तरह का दृश्य है। ज्ञातव्य है सीमेंट की सड़कों के निर्माण के कारण वर्षा का पानी जमीन की निचली सतह तक नहीं पहुंच पाता। इस तथाकथित विकास में ही विनाश के बीज बोए जा रहे हैं। सीमेंट की सड़क के दोनों ओर जल एकत्रित होकर धरती के भीतर पहुंचे- इस साधारण सी बात को भी अनदेखा किया गया है।

 

कृषि प्रधान कहे जाने वाले भारत में बहुत ही कम जमीन पर खेती की जा रही है। कृषि क्षेत्र के विस्तार करने से अन्न  की उपज बढ़ सकती है। भूख एक सुनियोजित व्यवसाय का हिस्सा है। वॉटर हार्वेस्टिंग के लिए बढ़ावा दिया जा रहा है। उन घरों से मकान का टैक्स कम लिया जाता है, जिन घरों ने वर्षा के पानी को संचित किया है। घर की छत पर ढलान देकर पानी नीचे आता है, जहां वह धरती के भीतर जा सके, इसके लिए मामूली सा प्रयास करना पड़ता है। यह कोई स्पेस टेक्नोलॉजी नहीं है। आशुतोष गोवारिकर की फिल्म ‘स्वदेश’ में एक दृश्य है कि नाव पर सवार लोग प्यासे हैं गोयाकि जल के पास होते हुए भी प्यासे हैं।  ज्ञातव्य है कि इजरायल ने यह दिखा दिया है कि समुद्र के पानी को पीने योग्य बनाया जा सकता है परंतु यह प्रक्रिया महंगी है और गरीब देश इसे अपना नहीं सकते।


कितने आश्चर्य की बात है कि पृथ्वी के तीन-चौथाई भाग में समुद्र है और मानव रिहाइश के लिए सीमित क्षेत्र है। अब विज्ञान द्वारा ही नए किस्म का समुद्र मंथन किया जा सकता है। अंधविश्वास और कुरीतियों के कारण भी जल का अपव्यय होता है। याद आती है महाकवि कबीर की पंक्तियां, ‘पानी केरा बुलबुला, अस मानस 
की जात, देखत ही बुझ जाएगा ज्यो तारा प्रभात’।

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