मैनेजमेंट फंडा / त्योहार मानवता निर्मित करने वाले ट्रेनर होते हैं



एन. रघुरामन

एन. रघुरामन

Sep 30, 2019, 12:26 AM IST

शनिवार को घर में काम करने वाली उस शेल्फ की धूल साफ कर रही थी, जिसमें खिलौने रखे हुए, जो मैंने अपनी विभिन्न यात्राओं में खरीदे हैं। जब खिलौनों की जोड़ियां अलग कर दी गईं तो मैं विचलित हो गया। संतुलन का अहसास देने के लिए एक को शेल्फ के एक छोर पर तो दूसरे को उससे बिल्कुल दूसरी ओर के छोर पर रख दिया गया था। मैंने उन्हें फिर जमाया जैसे केरल से लाए खिलौनेनुमा हाथी साथ में रख दिए, कंबोडिया स्थित दुनिया के सबसे बड़े मंदिर अंगकोरवाट को देखता कोरियाई युगल आदि। मेरी बेटी मेरे इस ‘बचकाना व्यवहार’ पर हंसने लगी। उसने कहा, ‘पापा, आप खुद को मैनेजमेंट ट्रेनर कहते हैं और आप अपना वक्त घर के शेल्फ पर रखे खिलौने जमाने में व्यर्थ गंवा रहे हैं? आप खिलौनों को लेकर इतने भावुक क्यों हैं? वह जैसा चाहती है वैसा जमाने दीजिए, क्योंकि इससे उन पुराने खिलौनों को, जो आपने इतने बरसों में अपनी हर यात्रा में ला-लाकर इकट्‌ठे किए हैं, कोई नयापन तो आएगा।’ इसके बाद मैंने जो कहा वह उसे समझ में नहीं आया। मैंने कहा, ‘हाउस-हेल्प के पास नई जमावट की कोई कहानी नहीं है!’ मैं विस्तार से बताता हूं।


मेरी बेटी नई सहस्त्राब्दी में जन्मी पीढ़ी के नजरिए से एकदम ठीक हो सकती है, लेकिन मेरी कहानी बिल्कुल अलग है। असलियत में मैं खिलौने नहीं खरीदता। मैं उसके पीछे की कहानी खरीदता हूं जैसे किसने उसे बनाया है, यह कहां बना है, कैसे बनाया गया, ऐसे खिलौने बनाने की एक सदी पुरानी संस्कृति कैसे विकसित हुई, वे कैसे रहते हैं आदि। इसलिए मेरे लिए हाथियों के उस परिवार को अलग करना क्रूरता है, जिसने केरल के घने जंगल में कटहल के एक पेड़ को मिलकर झुकाया है और एक साथ खा रहा है। अचानक मेरे मन का एक हिस्सा सोचने लगा कि एक-दूसरे की मदद के बिना यह परिवार खुद का वजूद कैसे बनाए रख सकता है? हालांकि, इस तरह से सोचना मूर्खतापूर्ण है, क्योंकि खिलौने पेड़ मोड़कर कटहल नहीं खाते और उनमें भावनाएं भी नहीं होतीं। लेकिन मेरे लिए तो बात ऐसी है कि मैंने वे खिलौने उस कहानी के साथ लाए हैं, जिसमें भावनाएं हैं!


जब मैंने अपने विचारों को खंगाला कि मैंने प्रोडक्ट की बजाय कहानी खरीदने की यह आदत कहां से पाई तो मुझे अहसास हुआ कि मैंने यह आदत नवरात्रि उत्सव में पाई, जिसे भारत में कई रूपों में मनाया जाता है। हम तमिल लोग इसे ‘गोलु’ उत्सव के रूप में मनाते हैं। हम परम्परागत गुड़ियाओं को उनके परिवार के साथ 5, 7, 9 या 11 चरणों वाली सीढ़ियों पर सजाते हैं। प्रत्येक चरण की एक थीम आधारित सजावट होती है, जिसमें उन गुड़ियाओं के परिवार की काल्पनिक कहानी गढ़ी जाती है। नवरात्रि के नौ दिनों तक लोग एक-दूसरे को अपनी गुड़ियाओं की अपनी प्रदर्शनी देखने के लिए आमंत्रित करते हैं।


जब देवी की प्रशंसा में कर्नाटक शैली के गीत गाए जाते तो हम बच्चे एक-दूसरे को वे कहानियां बताते, जो हमने गढ़ी होती थीं। इन कहानियों में कई मोड़ होते थे जैसे कोई ‘बुरा’ जानवर अचानक आकर इस वन्य परिवार के बच्चों को नुकसान पहुंचाने लगता और कैसे यह परिवार मिल-जुलकर उस जंगल से भगा देता। शायद यह कारण होगा कि मुझे उन्हें अलग करना पसंद नहीं है।


चूंकि उन दिनों पैसे की मजबूरी हमेशा रहती थी और हमें अलग-अलग कहानियां निर्मित करनी होती थीं, तो पीढ़ियों से साल-दर-साल प्रदर्शित की जा रही एंटिक गुड़ियाओं के साथ हमें कार्ड बोर्ड और कलर पेंसिल से लोकेशन बनानी होती थी! इस तरह नई थीम और नई कहानियां इस एकरसता को तोड़ देतीं। लेकिन, सभी कहानियों का सुखांत होता और बुरे किरदार कभी नहीं जीतते। शाम को ‘हल्दी-कुमकुम’ होता और कुछ ‘प्रसाद’ दिया जाता, जिसे हम ‘सुंडल’ कहते हैं।
हम बच्चे हमेशा खाने की स्वादिष्ट चीजों और हमारे जैसे अन्य बच्चों से नई कहानियां सुनने के लिए मां के साथ जाते। हम पूरे नौ दिन तक अपनी कहानियों में सुधार करते रहते और जितना संभव हो सकें उसमें भावनाएं जोड़ते ताकि घर आने वाली महिलाओं से हमें ज्यादा से ज्यादा तरीफ मिले!

 

फंडा यह है कि मुझे शिद्दत से लगता है कि अपनी संस्कृति व परम्पराओं के कारण हमारे भारतीय त्योहारों में महान व्यक्तित्व निर्मित करने की बहुत बड़ी शक्ति है। इसके कारण आपके भीतर दूसरों के लिए परवाह और प्रेम पैदा होता है।

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