मैनेजमेंट फंडा / अधिक बिक्री के लिए ‘डेकॉय प्राइसिंग’ का इस्तेमाल करें!



Dainik Bhaskar

Oct 14, 2019, 06:12 AM IST

शनिवार शाम को मैं इंदौर एयरपोर्ट पर बोर्डिंग का इंतजार कर रहा था। एक व्यक्ति जिसके पास पहले ही अच्छी तरह भरे हुए कपड़े और प्लास्टिक के कई बैग थे वह पुरुषों के जरूरत की चीजों की दुकान के पास खड़ा था। इस दुकान में जूते, बेल्ट, जीन्स, जैकेट जैसी कई चीजें और उसी श्रेणी में अपनी क्षमता के अनुसार एक जाने-माने ब्रांड की बिक्री होती है। वह व्यक्ति एक लेदर ट्रैवल बैग को देख रहा था, जिसकी कीमत सिर्फ 199 रुपए थी और प्राइस टैग के नीचे एक धमकाने वाली पंक्ति थी, जिसमें लिखा था, ‘ऑफर स्टॉक होने तक के लिए ही है।’ उस आदमी को वास्तव में उस बैग की जरूरत थी, जिसमें उसके सारे कैरी बैग समा सकते थे।

 

लेकिन, उस लैदर बैग को प्राप्त करने की शर्त यह थी कि आपको दुकान पर अन्य चीजों की खरीदी पर कम से कम 6999 रुपए खर्च करने थे! मन ही मन कुछ हिसाब लगाकर उस व्यक्ति ने 4500 रुपए के जूते और 3000 रुपए का बेल्ट खरीदा। इस तरह आखिरकार वह 199 रुपए का बैग हासिल कर खुश हो गया। मुख्यत: इसलिए कि वह क्लासिक लेदर बैग के साथ हवाई जहाज में प्रवेश करना चाहता था। इस बैग में उसकी नई-पुरानी खरीदी की सारी चीजें आ गईं।
जब मैंने दुकानदार से पूछा कि कितने लोग यह बैग खरीदते हैं, तो उसने गर्व के साथ बताया कि दुकान पर आने वाले 50 फीसदी लोग बैग का यह ऑफर ले लेते हैं और फिर वह शेखी बघारने लगा कि कंपनी को यह सेल्स आइडिया उसी ने दिया था कि इस कीमत पर एक अच्छा लेदर बैग दुकान पर रखना चाहिए, क्योंकि कई लोग एयरपोर्ट पर कई शॉपिंग बैग लेकर आते हैं। वैसे मुझे उसकी बुद्धिमत्ता पर संदेह था पर निश्चित ही यह बहुत ही अच्छा आइडिया है। मैनेजमेंट में हम इसे ‘डिकॉय प्रोडक्ट’ (लुभाने वाला प्रोडक्ट) कहते हैं!

 

आइए, इसे एक उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए कि आप आइसक्रीम प्रेमी हैं, लेकिन आइसक्रीम खरीदते वक्त आप चाहते हैं कि दाम के बदले में आपको ज्यादा से ज्यादा मिले। जब आप आइसक्रीम खरीदने जाते हैं तो दुकानदार आपको तीन विकल्प देता है। एक स्कूप आइसक्रीम 25 रुपए, दो स्कूप 40 रुपए और तीन स्कूप, जिसे अलग से ‘थ्री मैन ऑन द  बोट’ का नाम भी दिया गया है, की कीमत है 42 रुपए। दूसरे और तीसरे विकल्प के बीच कीमत में मामूली अंतर आपका ध्यान खींचता है। इसे कहते हैं ‘डिकॉय इफेक्ट या डिकॉय प्राइसिंग!’ दूसरा विकल्प सिर्फ ‘डिकॉय ऑप्शन’ है। कंपनियां डिकॉय ऑप्शन इसलिए देती है ताकि ग्राहक तथाकथित ‘डिकॉय ऑप्शन’ से एक महंगे ऑप्शन की तुलना करके देखे और फिर महंगे विकल्प का चुनाव करे। ‘डिकॉय ऑप्शन’ की गैर-मौजूदगी में ग्राहक 15 रुपए और 42 रुपए की तुलना करेगा और संभव है वह सस्ते विकल्प का चुनाव करें।

 

पहले मामले में, जहां लेदर बैग का ऑफर था, वहां वह बैग खुद ही डिकॉय इफेक्ट था। क्योंकि, यह 199 रुपए से बहुत अधिक महंगा था, लेकिन पेंच यह था कि ग्राहक अन्य उत्पादों पर 6999 रुपए खर्च किए बिना उसे हासिल नहीं कर सकते थे। इससे ग्राहक को यह अहसास होता है कि उसे बहुत महंगा बैग (जिसकी कीमत उसे मालूम नहीं है) सिर्फ 199 रुपए में मिल गया। ग्राहक खुद को सांत्वना देता है कि ये चीजें तो वैसे भी दिवाली के लिए खरीदनी ही थी। हालांकि, यह उसकी भविष्य की जरूरत थी और तत्काल उनकी जरूरत नहीं थी, कम से कम उस पल तो नहीं ही थी। लेकिन, ध्यान रहे कि आप इस रणनीति का इस्तेमाल तभी कर सकते हैं, जब आपकी शेल्फ रैंज पर सारे प्रोडक्ट बेस्ट क्वालिटी के हों। क्या आपको इसी तरह का पैटर्न कुछ मोबाइल कंपनियों की प्राइसिंग में नहीं दिखता? पहले स्तर पर कीमत होती है 600 डॉलर, फिर दूसरे स्तर पर 999 डॉलर और तीसरे स्तर पर 1099 डॉलर। ये विकल्प ग्राहक को महंगा वर्जन खरीदने के लिए प्रेरित करते हैं, क्योंकि उसका दिमाग दूसरे व तीसरे विकल्प के फर्क पर विचार करता है।

 

 

फंडा यह है कि यदि आप अधिक बिक्री अथवा महंगे प्रोडक्ट की बिक्री चाहते हैं तो एक डिकॉय प्रोडक्ट अथवा डिकॉय प्राइसिंग रखिए, लेकिन याद रहे कि दोनों मामलों में बेचे गए प्रोडक्ट और मुफ्त में या कम कीमत पर दिए गए प्रोडक्ट की क्वालिटी पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए।
  मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन की आवाज में मोबाइल पर सुनने के लिए 9190000071 पर मिस्ड कॉल करें

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