मैनेजमेंट फंडा / समुदाय के बड़े मुद्दे सुलझाने हैं तो ‘जड़ों’ पर लौटिए



Dainik Bhaskar

Oct 21, 2019, 12:22 AM IST

कुपोषण कोई गोपनीय तथ्य नहीं है। इसे छिपाने का कोई अर्थ नहीं है कि देश के कुछ हिस्सों में कम वजन और जरूरत से अत्यधिक कम वजन वाले हजारों बच्चे हैं। फोलिक एसिड जैसे सप्लीमेंट देने के बावजूद एनिमिया के मामले बहुत अधिक है। कम से कम गुजरात के लिए तो यह बात सही है। कुपोषण ऐसा मुद्दा है, जिसने इस राज्य की छवि को कुछ हद तक नुकसान पहुंचाया है।


स्वास्थ्य और परिवार कल्याण के प्रधान सचिव पद पर बैठे लोगों की जिम्मेदारी है कि वे इस पर ध्यान दें। उन्हीं में से एक गुजरात की जयंती रवि को अहसास हुआ कि सेहत में सुधार के लिए ग्रामीण लोगों को गोलियां खाने पर मजबूर करने का कोई फायदा नहीं है। जरूरत इस बात की है कि यह उनके तरीके से किया जाए। उन्हें यह बताएं कि कैसे पोषक तत्वों से भरपुर सब्जियां उगाएं और खाएं। इस तरह उनकी खून की कमी की समस्या सुलझाई जा सकती है। लेकिन समस्या यह है कि उनके जैसे लोग, जो लोकस्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) के दफ्तरों में बैठे होते हैं, मैदान में नहीं उतर सकते। इसलिए उन्होंने यूनिसेफ जैसे वैश्विक संगठनों का ध्यान आकर्षित किया ताकि वे इस प्रोजेक्ट को अपनाए। उन्होंने राज्य के विभिन्न पीएचसी में उच्च पोषक स्तर वाली सब्जियां इमारत के पीछे आंगन में अथवा टैरेस पर उगाना शुरू किया। उसके बाद ये सब्जियां ग्रामीण  क्षेत्रों में गर्भवती महिलाओं और कुपोषण के रोगियों को मुफ्त दी गईं। जयंती की सोच से निकला यह प्रोजेक्ट इस साल फरवरी में गांधी नगर के उनावा पीएचसी में शुरू किया गया।


पीएचसी अधिकारियों का कहना था कि राज्य के कुछ हिस्सों की महिलाएं दवाइयांं लेने से बचती हैं। उनकी परम्परागत मान्यताएं उन्हें दवाइयां लेने से रोकती हैं। इसलिए उन्होंने यह प्राकृतिक तरीका निकाला, जिसमें न सिर्फ उन्हें सब्जियां दी जाती हैं बल्कि सब्जियां उगाना भी सिखाया जाता है। सरकार ने उनामा में पर्यावरण हितैषी हर्बल गार्डन में ऑर्गेनिक खेती के लिए विशेषज्ञों की मदद ली। तमिलनाडु स्थित वैल्लोर के  ठोस द्रव संसाधन प्रबंधन विभाग की भी मदद ली गई। मिट्‌टी के बर्तन, बांस, कोको पीट या क्वायर (एक प्रकार की घास) और जूट की रस्सी का उपयोग किया गया। उनावा पीएचसी में पीछे के आंगन और टैरेस पर 120 सब्जियां उगाई जा रही हैं जैसे पत्ता गोभी, पालक, धनिया, चुकंदर, फूल गोभी, मैथी, चौलाई, लुनाई, गोंगूरा आदि। उन्हें उगाने की प्रक्रिया भी बहुत सरल है। 40 फीसदी गाय के गोबर, 40 फीसदी मिट्‌टी और 20 फीसदी नदी से प्राप्त रेत का मिश्रण गमले में डालकर उसमें सब्जियां उगाई जाती हैं। ये सब्जियां अत्यधिक पोषक हैं और लोगों में पोषक तत्वों की कमी से लड़ने में मददगार हैं। समुदाय के स्तर पर की जाने वालीर यह नई विधि कुपोषण की ऐसी समस्या से लड़ने में लंबे समय तक मददगार हो सकती है, जो पिछले कुछ वर्षों से राज्य को पीछे खींच रही है खासतौर पर ग्रामीण गुजरात में।


उनावा में सफलता मिलने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने अब यह प्रोजेक्ट राजकोट के बिरसारा और नाडियाड के थामला में शुरू किया है। इसे राज्य के छह अन्य केंद्रों पर भी दोहराया जा रहा है। सिर्फ गुजरात 
में ही 1,433 पीएचसी हैं। सरकार की कोशिश है कि इसे सारे पीएचसी, सीएचसी और सरकारी कॉलेजों में शुरू किया जाए। यूनिसेफ इस प्रोजेक्ट को बड़े पैमाने पर विस्तार देने और अमल में लाने के लिए मदद मुहैया कराने पर विचार कर रहा है। इस बड़ी पहल से राज्य को उन सांस्कृतिक व परम्परागत आपत्तियां दूर करने की उम्मीद है, जो महिलाओं को दवाइयां लेने  से रोकती हैं।

 

 

फंडा यह है कि बड़े सामुदायिक मुद्दे जो समाज को व्यापक स्तर पर परेशान करते हैं उन्हें ‘जड़ों’ पर लौटकर (सब्जियां), ‘जड़ों’ में जाकर (खेती की संस्कृति) और ‘जड़ों’ (परम्परागत विधि) की मदद से सुलझाया जा सकता है। यही तो हमारे पुरखों का विश्वास था और यही उन्होंने किया। यह कड़वी गोली निगलने से आसान है।

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