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मैनेजमेंट फंडा / जो मिला है उसे श्रेष्ठ बनाकर सही व्यक्ति को सौंप दें



Dainik Bhaskar

Sep 22, 2018, 11:27 PM IST

कहीं किसी बातचीत में मैंने सुना कि सारे मानव व्यक्तिगत कर्म से संचालित होते हैं और उनमें से अधिकांश संसार से बंधे होते हैं। यह बहुत ही दुर्लभ होता है कि कई जन्मों के दौरान आत्म साक्षात्कार जड़ पकड़ने लगे और फिर व्यक्ति दुनियादारी के आकर्षणों से मुक्त होने के लिए संघर्ष करे और इन्द्रियों को जीतकर ईश्वर के प्रति समर्पित रहे। यह पूरे यकीन के साथ कहा जा सकता है कि आधुनिक समय में ईश्वर के प्रति समर्पण का अर्थ है वंचितों की सेवा करना या गरीबी मिटाना, जो बिल गैट्स फाउंडेशन, इन्फोसिस फाउंडेशन और कई अन्य लोग कर रहे हैं। 


चीन के अलीबाबा समूह के सह-संस्थापक जैक मा द्वारा पिछले हफ्ते की गई रिटायर होने की घोषणा ने मेरा ध्यान उपरोक्त वाक्य की उसी तरह खींचा, जिस तरह भागवत पुराण नारद के अग्रणी शिष्य प्रियवृत का खींचता है। अपने स्टाफ, शेयरधारकों और ग्राहकों को लिखे खुले पत्र में मा ने अपने उत्तराधिकारी को चुनने में उनके द्वारा लगाई ऊर्जा व समय पर जोर दिया और इस तरह शिक्षक की अपनी पूर्ववर्ती भूमिका को छुआ। उन्होंने कहा- 'शिक्षक हमेशा चाहते हैं कि उनके शिष्य उनसे आगे जाएं। मेरी और कंपनी की जिम्मेदारी यह है कि अधिक युवा और अधिक प्रतिभाशाली लोगों को नेतृत्व की भूमिका में आने दिया जाए, ताकि उन्हें विरासत में हमारा मिशन मिले।' फिर मा ने जाहिर किया कि डेनियल झांग कंपनी के चेयरमैन पद का भार संभालेंगे। हालांकि, वे खुद अलीबाबा के डायरेक्टर बोर्ड में 2020 तक रहेंगे। मा के बारे में एक चीज ने मुझे हमेशा चकित किया है कि उन्होंने ऐसी कंपनी बनाई है, जिस पर दुनिया में कई लोग भरोसा करते हैं, निवेश करते हैं और उस चीनी भूमि से सामान खरीदते हैं, जहां 'भरोसा' शब्द पर कम भरोसा होता है! 


यदि आपने पुराण पढ़े हों तो जानते होंगे कि प्रियवृत में ईश्वर को प्राप्त करने की तड़प जल्दी ही उत्पन्न हो गई थी । लेकिन, ब्रह्मा ने उन्हें संदेश दिया कि दैवी इच्छा यह है कि वे अपने राज्य पर शासन करें और गृहस्थ का जीवन जीएं। प्रियवृत को यह अच्छा नहीं लगा पर उन्होंने इससे इनकार भी नहीं किया, क्योंकि वे जानते थे कि प्रत्येक व्यक्ति 'प्रारब्ध कर्म' से बंधा है। प्रारब्ध पिछले कर्मों का अंश होता है, जो वर्तमान शरीर के लिए जिम्मेदार होता है। इसलिए प्रियवृत ने ईश्वर की इच्छा को स्वीकार किया और चूंकि वे कर्म और उनके फलों को अच्छी तरह जानते थे तो उन्होंने सावधानी बरती कि वे कर्म या वासना में नया कुछ न जोड़ें। उन्होंने सिद्ध किया कि गृहस्थ का जीवन जीने से उनके उस मूल स्वभाव को नुकसान नहीं पहुंचा, जिसने सारे लगाव का त्याग कर दिया है। उन्होंने शुद्ध हृदय व मन से धरती पर कई वर्षों तक शासन कर न्यायसंगत शासन स्थापित किया। सबसे बड़ी बात यह रही कि उन्होंने मानव के शत्रुओं यानी इंद्रियों, इच्छाओं और क्रोध पर विजय हासिल की। अपने आप को 'एक्सीडेंटल आंत्रप्रेन्योर' यानी संयोग से बने उद्यमी कहने वाले मा ने अपने प्रशासन से अलीबाबा ग्रुप को एशिया में सबसे मूल्यवान कंपनी बना दिया। ई-कॉमर्स मार्केटप्लेस के रूप में शुरू की गई और 1999 में 60 हजार डॉलर से स्थापित अलीबाबा 420 अरब डॉलर के विशाल समूह में बदल गई, जिसके हित क्लाउड कंप्यूटिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और हॉलीवुड की फिल्मों में हैं। चीन के सबसे धनी व्यक्तियों में से एक मा की अनुमानित संपत्ति 36.6 अरब डॉलर है। मा भी 54 साल की उम्र में रिटायर हो गए और अब वे जेक मा फाउंडेशन पर ध्यान देंगे, जो बिल गैट्स फाउंडेशन की तरह ग्रामीण चीन की शिक्षा व्यवस्था को मदद पहुंचाने का काम कर रहा है। 

फंडा यह है कि  प्रियवृत व मा बताते हैं कि ईश्वर जो देता है उसे स्वीकारें, उसे सर्वश्रेष्ठ बनाएं और सही समय पर सही व्यक्ति को सौंप दें। 

 

 


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