मैनेजमेंट फंडा / किसी भी युद्ध के अहम शस्त्र हैं भरोसा और धैर्य



management funda: key weapon of any war is trust and patience
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management funda: key weapon of any war is trust and patience

एन. रघुरामन

एन. रघुरामन

Jul 12, 2019, 12:10 AM IST

यह हेडलाइन पढ़ते हुए अगर आप यह अनुमान लगा रहे हैं कि नीचे शायद वर्ल्ड कप क्रिकेट में भारतीय टीम के शीर्ष क्रम में धैर्य की कमी से उसके धराशायी होने के बारे में पढ़ने को मिलेगा, तो आप निराश होंगे। इस विषय पर मीडिया में विशेषज्ञों और सोशल मीडिया में खुद को सर्वज्ञानी विशेषज्ञ मानने वालों द्वारा बहुत कुछ लिखा जा चुका है।


यह सच है कि मैं भारतीय टीम का प्रशंसक हूं, लेकिन सिर्फ ‘जीतने वाली’ भारतीय टीम का प्रशंसक नहीं हूं। मैंने आज अपना ध्यान ऐसे आदमी पर केंद्रित किया है जो एक या दो नहीं, पूरे 29 महीनों से उन ताकतवर लोगों के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा था, जो एक पारंपरिक भारतीय मध्यम वर्गीय परिवार की ऑक्सीजन (पढ़ें तनख्वाह) बंद करने पर उतारू थे।

 

यह लड़ाई 2015 में  उस समय शुरू हुई, जब बॉम्बे पोर्ट ट्रस्ट ने अपने 9500 कर्मचारियों से अपने आधार नंबर की जानकारी जमा करने को कहा। शुरुआत में करीब 30 लोगों ने अपने आधार की जानकारी देने से इंकार किया। नोटिस भेजे गए और तीसरे नोटिस में कहा गया कि जानकारी नहीं देने पर तनख्वाह काट ली जाएगी। फिर पांच ही कर्मचारी बचे थे, जो इस दबाव के आगे नहीं झुके। इनमें से एक थे टेक्निकल डिर्पाटमेन्ट के 49 वर्षीय रमेश कुरहाड़े।


कुरहाड़े की यह लड़ाई तब शुरू हुई, जब आधार पर एक ऐतिहासिक फैसला आया था जिसमें कहा गया था कि सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के लिए आधार बेस्ड पहचान अनिवार्य होगी, लेकिन निजी इस्तेमाल के लिए आधार की अनिवार्यता को रोकने की बात कही गई थी। कुरहाड़े का मामला इसी दूसरे हिस्से से जुड़ा था क्योंकि उसका सवाल था कि मैं नौकरी के बदले तनख्वाह ले रहा हूं और यह कोई कल्याणकारी योजना नहीं है तो आधार क्यों देना चाहिए?

 

कई कर्मचारी यूनियनों के सक्रिय सदस्य और ट्रेड यूनियन लीडर डॉ. दत्ता सामंत के पक्के समर्थक रहे, कुरहाड़े ने अपने दम पर इस ‘मनमाने फरमान’ के खिलाफ लड़ाई लड़ी और पिछले महीने जीत भी गए। एक मिल मजदूर के बेटे के रूप में कुरहाड़े याद करते हैं कि जब वे सिर्फ 12 साल के थे तो 1982 में सामंत के नेतृत्व में साल भर चली कपड़ा मिल मजदूरों की लंबी लड़ाई में उनके पीछे चल दिए थे।


यही वह समय था जब कुरहाड़े ने डॉ. सामंत से यह सीखा कि अगर किसी मजदूर को लड़ाई लड़नी है तो, उसके घर में कम से कम छह महीने का राशन-पानी का इंतजाम होना ही चाहिए। चूंकि वे अपने चार सदस्यों के परिवार में अकेले कमाने वाले थे, तो उन्होंने 2015 में पहला नोटिस मिलने के बाद से लेकर जुलाई 2016 में तनख्वाह पूरी तरह बंद होने तक, जितना हो सकता था उतना राशन घर में जमा कर लिया।

 

जब उन्हें तनख्वाह मिलनी बंद हो गई तो वे अकेले लड़ने वाले बच गए। 2016-17 के दौरान कुरहाड़े ने पोर्ट ट्रस्ट के साथ लगातार पत्र-व्यवहार किया, नतीजा यह हुआ कि जनवरी 2018 में एक रिट याचिका दाखिल की गई। इसके बाद पोर्ट ट्रस्ट ने उनका ट्रांसफर कर दिया और कर्मचारी यूनियन ने भी उसका समर्थन बंद कर दिया, क्योंकि उनको छोड़ बाकी सभी ने हथियार डाल दिए थे। नवंबर 2018 में अपने एक अंतरिम आदेश में  बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक अादेश में बॉम्बे पोर्ट ट्रस्ट को कुरहाड़े को उनकी तनख्वाह शुरू करने को कहा और 20 जून 2019 को अंतिम आदेश में 7.5 फीसदी ब्याज समेत भुगतान करने को कहा।

 

कुरहाड़े ने कहा कि अगर आधार तनख्वाह के लिए इस्तेमाल किया जाता है तो ये निजता का हनन है। अगर कम्पनी अपने कर्मचारियों से कमाई कर रही है तो उन्हें उसका बकाया चुकता करना चाहिए। वे कहते हैं, ‘मेरी लड़ाई आधार के इस्तेमाल के सिद्धांत को लेकर थी।’ एक मिसाल कायम करने वाले फैसले के लिए सिद्धांतों की उनकी इस लड़ाई को उसकी कम्पनी कभी नहीं भूलेगी।

 

फंडा यह है कि अगर आप सिद्धांतों की लड़ाई लड़ रहे हैं, तो उद्देश्य पर भरोसा होने के साथ अापमें धैर्य होना चाहिए, क्योंकि बाहरी चीजें आपके नियंत्रण से बाहर होंगी।

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