पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

कागज रंगना पुराना हुआ, अब कोडिंग नया रंग

एक वर्ष पहलेलेखक: एन. रघुरामन
  • कॉपी लिंक
प्रतीकात्मक फोटो। - Dainik Bhaskar
प्रतीकात्मक फोटो।

शायद ही ऐसा कोई बच्चा हो जिसे ड्राइंग बुक रंगना या होली के त्योहार के दौरान रंग लगाना पसंद न हो। उन्हें चमकदार रंग बहुत अच्छे लगते हैं। लेकिन यहां छह साल के बच्चों की एक पूरी पीढ़ी कलरिंग की तरह कोडिंग में लगी हुई है, क्योंकि उन्हें इसमें गणित से ज्यादा मजा आ रहा है।  आमतौर पर 6 साल की उम्र में बच्चों को कुछ तरह के खेलों के अलावा संगीत, चित्रकला, यहां तक कि नाट्यकला आदि सिखाई जाती है। और वे इन क्लासेस को कोचिंग क्लास कहते हैं। लेकिन नई पीढ़ी अपनी क्लास को ‘कोडिंग क्लास’ कहती है, जहां वे एबीसी अल्फाबेट नहीं, बल्कि कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग की एबीसी सीखते हैं। ऐसी ही एक कोडिंग क्लास के मालिक अशोक अनंतरमैया को लगता है कि कोडिंग बच्चों की मदद करने का एक तरीका है, जैसे समस्या को पहचानना, उसे छोटे-छोटे चरणों में बांटना और उसे समाधान के लायक बनाना, जो कि कम्प्यूटिंग की आधारभूत प्रक्रिया है। यह बच्चों के लिए आसान और संभव इसलिए भी हो पाया क्योंकि वे टेक्नोलॉजी से पहले से ही परिचित हैं।    वे यह भी मानते हैं कि कोडिंग दरअसल पाठ्य पुस्तकों की तुलना में गणित सीखने का ज्यादा बेहतर तरीका है क्योंकि इसमें बच्चे सहज रूप से खुद की सीखने की इच्छा रखते हैं। इसलिए छह वर्ष की उम्र में कोडिंग अब नई गणित बन चुकी है। कोटा या हिसार या किसी भी टीयर-टू और थ्री शहर की कोचिंग क्लासेस की तरह बेंगलुरु में कई दर्जन कोडिंग क्लास खुल गई हैं। कैम्पके12, स्माउल और मूव फॉर्वर्ड कुछ ऑनलाइन और एजुकेशन टेक स्टार्टअप हैं, जो बच्चों को कम से कम उम्र में कोडिंग सिखाने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।    अगर आपका तर्क है कि कोडिंग से दिमाग का केवल बायां भाग विकसित होगा और बच्चों में कलात्मकता विकसित नहीं हो पाएगी तो कैम्पके12 के अंशुल भागी के पास इसका जवाब है। वे कहते हैं कि कोडिंग, हिन्दी, अंग्रेजी या फ्रेंच की तरह ही एक भाषा है। अंशुल के मुताबिक, जैसे भाषा से हम अभिव्यक्ति और कविता जैसे रचनात्मक स्वरूप, इन दोनों तरह के संवाद कर पाते हैं, कोडिंग में भी उसी तरह कलात्मकता और अभिव्यक्ति की बहुत संभावनाएं हैं।    आईआईटी दिल्ली से पढ़े, स्माउल के सह-संस्थापक शैलेंद्र धाकड़ मानते हैं कि 12 से 14 साल स्कूल की पढ़ाई उन नए बच्चों को बहुत परफेक्ट बना सकती है और कम्प्यूटर की बेसिक समझ दे सकती है, जो टेक्नोलॉजी के क्षेत्र कॅरिअर बनाना चाहते हैं। और उन्हें लगता है कि स्कूलों को इस नई जरूरत के मुताबिक खुद को ढालना होगा। शैलेंद्र यह भी मानते हैं कि कोडिंग केवल एक अलग माध्यम है, जो युवा मनों को कुछ बनाने का एक मंच प्रदान करती है। शैलेंद्र कहते हैं, ‘जैसे बच्चे क्रेयॉन्स से कागज पर चित्र बनाते हैं, वैसे ही कोडिंग ड्रॉइंग की तरह कुछ खूबसूरत और रचनात्मक बनाने के लिए प्रोग्रामिंग का इस्तेमाल करती है।’ वहीं माता-पिता भी कोडिंग की इन ऑनलाइन या फिजिकल कोचिंग क्लासेस का साथ दे रहे हैं, मुख्यत: इसलिए क्योंकि उन्हें लगता है कि किसी भी बच्चे के लिए डिग्री के सर्टिफिकेट्स के साथ कौशल होना भी जरूरी है। इन मॉड्यूल्स के खत्म होने के बाद ये बच्चे मोबाइल एप्स, छोटे गेम्स और यहां तक कि अपने पैरेंट्स के बिजनेस के लिए जानकारी वाली वेबसाइट्स तक बना पा रहे हैं। वे दिन गए जब मेहमानों के आने पर बच्चों का परिचय यह कहकर करवाते थे कि ‘यह पिआनो या तबला बजा सकता है’। बच्चों का परिचय करवाने का नया तरीका है, ‘यह रंग-बिरंगी वेबसाइट्स और मोबाइल एप इसने बनाया है।’ हालांकि कोडिंग भविष्य है, लेकिन इसका सबसे बड़ा नुकसान है बच्चों द्वारा स्क्रीन के सामने बिताने वाले समय का बढ़ना। खासतौर पर तब, जब आधुनिक समय में पैरेंटिंग की सबसे बड़ी चुनौती बच्चों के लिए गैजेट्स की उपलब्धता है। शायद माता-पिता को भी बच्चों की जिंदगी रंग-बिरंगी बनाने के लिए संतुलन और निगरानी का नया कोर्स करना पड़ेगा।

फंडा यह है कि रंगों के त्योहार होली पर यह समझें कि बच्चों के युवा मन को कौन-से विषय रंगों से भरते हैं। फिलहाल कोडिंग उनके लिए सबसे रंगीन विषय लग रहा है। इनका भविष्य परफेक्ट बनाने के लिए आने वाले शैक्षणिक सत्र में कोडिंग का ये रंग जोड़ सकते हैं।

खबरें और भी हैं...