मैनेजमेंट फंडा / ‘अचीवमेंट' से ज्यादा महत्वपूर्ण है ‘इंपैक्ट'



एन. रघुरामन

एन. रघुरामन

Oct 13, 2019, 12:51 AM IST

एक विवाह समारोह में करीब 40 वर्ष का एक युवा 90 वर्षीय व्यक्ति को देखकर बड़ा खुश हुआ और उनके पास पहुंचकर पूछा "सर, क्या आपने मुझे पहचाना’? बुजुर्ग ने कहा "नहीं’।  वह युवा लगभग चीखते हुए बोला "आप मुझे कैसे भूल सकते हैं सर, मैं आपका छात्र रहा हूं’। बुजुर्ग मुस्कुराए, भौंहें उठाईं, चश्मा निकालकर साफ किया और युवा को ध्यान से देखा और कहा "अरे, यह तुम हो। क्या कर रहे हो इन दिनों’?

 

युवा ने कहा कि वह भी शिक्षक है। बुजुर्ग शिक्षक ने पूछा, "बढ़ी अच्छी बात है, क्या वजह रही कि तुम भी शिक्षक बन गए?’ युवा बोला "सर, मेरे शिक्षक बनने की वजह आप और आपसे मिली प्रेरणा है।’ बुजुर्ग ने पूछा, "कैसे?’ युवा ने कहा "सर, आपके व्यक्तित्व ने मुझ पर कमाल का असर डाला था और मैंने भी सोचा कि मैं भी कैसे वही असर दूसरों पर डाल सकता हूं, इसलिए मैं शिक्षक बन गया।’ गर्व से सिर उठाए उस युवा ने आगे कहा "मुझे यकीन है कि आपको वह कलाई घड़ी के गुम होने वाली घटना याद होगी? फिर भी मैं आपको याद दिलाता हूं।’ और फिर उसने एक बीती घटना सुनाना शुरू किया।

 

"सर, क्या आपको याद है कि जब हम नवीं कक्षा में पढ़ रहे थे तो, एक दिन विक्रम की नई घड़ी गुम हो गई थी जो उसके माता-पिता ने जन्मदिन पर तोहफे में दी थी’? बुजुर्ग शिक्षक ने हामी में सिर हिलाया और कहा "हां...हां, बिल्कुल और उस घटना के बाद हमने स्कूल में घड़ी पहनने पर प्रतिबंध लगा दिया था।’ "जी हां सर, याद आया ना, जब उसने घड़ी गुम होने की शिकायत की थी, तो आपने हम सभी को एक कतार में खड़ा कर दिया था और पूछा था कि, ‘बताओ, विक्रम की घड़ी किसने ली है?' जब किसी बच्चे ने जवाब नहीं दिया तो आपने सभी को आंखें बंद करने को कहा था और हमने आपकी आज्ञा का पालन किया था।

 

उसके बाद आपने एक-एक करके सभी बच्चों की जेबों की तलाशी ली थी। मैं कतार के बीच में खड़ा था और आपको देखकर बहुत डर गया था। मुझे लगने लगा था कि आज मैं सबके सामने रंगे हाथों पकड़ा जाऊंगा, क्योंकि विक्रम की घड़ी मैंने ही चुराई थी। तभी आपने बहुत धीमे से मेरी जेब से घड़ी निकाल ली थी और आगे बढ़ गए थे, लेकिन मुझे याद है कि आपने बाकी बचे बच्चों की भी जेबें टटोली थी और बोले थे ‘अभी कोई आंखें नहीं खोलेगा'। घटना के बारे में सुनते हुए बुजुर्ग मुस्कुराए, उस युवा ने कहना जारी रखा "ऐसी स्थिति में आपने बहुत ही चौंकाने वाला काम किया था।

 

आपने कहा था कि आप एक जादूगर हैं और अगर हर एक बच्चा ईमानदारी से अपनी आंखें बंद रखेगा तो आप विक्रम की घड़ी को उसके हाथ में वापस ला सकते हैं। हम सभी ने अपनी आंखें लगभग भींचते हुए बंद कर ली थी। मेरे होंठ भगवान से प्रार्थना कर रहे थे कि मैं पकड़ा न जाऊं। कुछ मिनट के बाद आपने सबको आंखें खोलने को कहा था और हमने देखा कि गुम घड़ी वाकई विक्रम के हाथ पर आ चुकी थी और फिर सबने जमकर तालियां बजाईं थीं।’ उस युवा शिक्षक की आंखें भीग गईं थी और उसने बुजुर्ग का हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा "वह दिन था, और आज का दिन है, आपने किसी से भी उस घटना का जिक्र नहीं किया। यहां तक कि मुझसे भी नहीं।

 

कैसे सर, कैसे, आपने कभी अपने चेहरे पर उस बात को आने नहीं दिया जबकि आप तो जानते थे कि घड़ी चुराने वाला बच्चा मैं ही हूं?’ बुजुर्ग शिक्षक बोले "ईमानदारी से कहूं, तुम्हारे बताने से पहले, मुझे इतने वर्षों में आज तक पता नहीं चला था कि वह बच्चा कौन था!’ अब चौंकने की बारी युवा शिक्षक की थी और उसने पूछा "क्या? सर, वह आप ही तो थे जिसने मेरी पैंट की जेब में हाथ डाला था और घड़ी निकाल ली थी और आप कह रहे हैं कि मुझे पता नहीं कौन बच्चा था’? बुर्जुग ने शांत भाव से बोले  "हां, क्योंकि उस समय मेरी आंखें भी तो बंद थीं’।

 

फंडा ये है कि हमारे अच्छे कामों, अच्छे फैसलों और अच्छे शब्दों का ही तो जादू (इंपैक्ट) होता है जो बड़ी सहजता से गहरा असर करता है। एक अच्छाई का यह असर जिंदगी भर कमाई धन-संपदा (अचीवमेंट) से बढ़कर होता है और हमेशा याद भी रहता है।

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