मैनेजमेंट फंडा / हमारा व्यवहार ही हमें ‘बड़ा’ बनाता है!



Dainik Bhaskar

Oct 06, 2019, 03:47 AM IST

बीती 17 सितंबर और 3 अक्टूबर को जब कर्नाटक में कैबिनेट की मीटिंग हुई, सरकार के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा, उनके कई मंत्री और तीन उप मुख्यमंत्री गोविंद करजोल, अश्वथ नारायण और लक्ष्मण सावदी को मीडिया फोटोग्राफरों ने कार में  बिना सीट बेल्ट के देखा और उनके फोटो उतार लिए।


ऐसे समय में जबकि एक आम आदमी ट्रैफिक नियमों को तोड़ने पर भारी पेनल्टी चुका रहा है, वहीं नेता और बड़े सरकारी अधिकारी बिना डर नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं। मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 194-बी के तहत, पैसेंजर व्हीकल में सवार ड्राइवर समेत सभी सवारों को, सीट (सुरक्षा) बेल्ट अवश्य पहनना चाहिए और इस नियम का पालन न करने पर 500 रुपए पेनल्टी भरनी पड़ती है।

 

अकेले बेंगलुरु शहर में, पुलिस ने सिर्फ 30 सितम्बर को नियम तोड़ने वाले 9,655 लोगों से करीब 31 लाख रुपए दंड के रूप में वसूल किए। इनमें से 359 मामले सीट बेल्ट न पहनने से संबंधित थे, और इन लोगों पर 1.2 लाख रुपए जुर्माना किया गया। लेकिन पुलिस अपने ही मंत्रियों को नहीं पकड़ पाई जो बिना सीट बेल्ट यात्रा कर रहे थे! बीते शुक्रवार के दिन ही, जब मुख्यमंत्री बाढ़ प्रभावित बेलागवी और बगलाकोट के दौरे पर गए थे, लोगों ने उन्हें बिना सीट बेल्ट पहने देखा और उनका ऐसा फोटो व्हाट्सएप पर खूब वायरल हुआ।


इस खबर से मुझे अपनी हाल की इंडिगो फ्लाइट से भोपाल यात्रा का एक वाकया ध्यान आया। यात्रियों को प्लेन में चढ़ने में सुविधा हो इसके लिए एयरलाइन अधिकारी यात्रियों को उनके सीट नंबर के हिसाब से तीन कतारों में बांट देते हैं। जैसे 21 से 30 वाली एक कतार, 11 से 20 वाले यात्रियों की दूसरी कतार और ऐसी ही आगे वाले कतार होती है। इस तरीके में, प्लेन में सबसे आगे की सीट पर बैठने वालों को सबसे आखिर में बोर्डिंग करनी होती है ताकि क्रू मेम्बर्स उनके पीछे वाले यात्रियों की मदद कर सके और वे आसानी से अपनी सीट व सामान को व्यवस्थित कर बैठ सके।

 

यही कारण होता है कि किसी भी एयरलाइन में पीछे वाली सीटों के यात्रियों को सबसे पहले सीट दी जाती है, और इसके पीछे कम किराया या कोई अन्य व्यावसायिक कारण नहीं होता है। दुनियाभर में यही चलन है और एयरलाइन के लिए इसकी मदद से जल्दी और तनावरहित बोर्डिंग होना फायदेमंद भी होता है। हालांकि, कई एयरलाइनों में पहली कतार की कुछ सीटें की दरें प्रीमियम रखी जाती है क्योंकि उनमें ज्यादा लेग-रूम जैसी आरामदायक सुविधा मिल जाती है। कभी-कभी प्रीमियम सीट वाले ऐसे यात्री कुछ ज्यादा सुविधाओं की मांग करते हैं और एयरलाइन स्टाफ भी उन्हें मना नहीं करता क्योंकि उसी प्लेन से एक ही जगह जा रहे बाकी यात्रियों की तुलना में वे ज्यादा पैसा देते हैं।

 

हालांकि बात जब बोर्डिंग की हो तो किसी भी एयरलाइन में व्हीलचेयर वाले यात्रियों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है और प्लेन के गंतव्य पर पहुंचने के बाद उन्हें सबसे आखिरी में उतारा जाता है। इन नियमों का सभी विमानन कंपनियां पालन करती है। लेकिन, भोपाल में एक ऐसे "बड़े’ आदमी से मेरा सामना हो गया जो अपने आपको सभी नियमों से परे मानता था। मैं 1 से 10 नंबर सीट वाली अपनी लाइन में खड़ा था क्योंकि मुझे 10वीं कतार वाली सीट पर बैठना था, तभी एक यात्री तीनों लाइनों को तोड़ते हुए सबसे आगे पहुंचकर खड़ा हो गया क्योंकि उसने ज्यादा पैसे दिए थे, और वह एयरलाइन स्टॉफ के साथ सख्ती से पेश आने लगा और मांग करने लगा कि उसे सबसे पहले अंदर जाने दिया जाए, यहां तक कि व्हीलचेयर वाले यात्रियों से भी पहले उसे सीट दी जाए।

 

एयरलाइन स्टाफ के साथ उसके बात करने का तरीका कुछ ऐसा था जिससे लग रहा था कि वह अपनी बात मनवाने के लिए झगड़ा करने से भी परहेज नहीं करेगा। इसी वजह से स्टाफ ने संयम रखते हुए, उसे जाने दिया ताकि बाकी के 179 यात्रियों के सामने वह कोई तमाशा न कर सके।


और जब मैं अपनी बारी आने पर प्लेन में पहुंचा तो देखा कि वह आदमी प्रवेश दरवाजे के ठीक सामने बैठा था और अंदर आ रहे हर यात्री की ओर देखकर व्यंग्य भरी मुस्कुराहट फेंक रहा था। और उसकी मुस्कान में एक तरह का दंभ था जिसको डि-कोड करें तो शब्द होंगे कि "क्या तुम्हें पता नहीं था कि मैं एक वीवीआईपी हूं।’ मैंने भी उसे मुस्कुरा कर देखा, लेकिन वह मेरी मुस्कान को पढ़ नहीं पाया जो स्पष्ट रूप से यह कह रही थी कि "तुम कितने बड़े असभ्य आदमी हो’।


फंडा ये है कि सार्वजनिक रूप से लोगों के बीच ताकत दिखाने से कोई बड़ा आदमी' नहीं बनता! वास्तव में ऐसे करने वालों के बारे में लोग हल्की बातें करते हैं।

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