मैनेजमेंट फंडा / जिम्मेदारी वाले बिजनेस से सफलता की गारंटी



Dainik Bhaskar

Sep 29, 2019, 06:27 AM IST

मुझे शुक्रवार या शनिवार की शाम किसी मॉल में जाना पसंद नहीं है, और ऐसा भीड़ के कारण या फिर मॉल में घुसने और पार्किंग से निकलने में लगने वाले समय के कारण नहीं, बल्कि इसलिए है कि जब कभी शॉपिंग के दौरान थोड़ा सा कुछ खाने की इच्छा होती है तो अच्छे विकल्प नहीं मिलते और हर बार पिज्जा या बर्गर पर ही खोज खत्म होती है, जिनके दाम भी ऊंचे होते हैं।


इस शुक्रवार के दिन घर का दबाव ऐसा था कि मुझे ऑउटिंग के लिए निकलना ही पड़ा, जिसे मैं लम्बे समय से मॉल न जाने के बहाने टाल रहा था। शॉपिंग के बीच में, मेरी मुलाकात अचानक अपनी एक फूड कंसल्टेंट मित्र से हो गई जो मॉल से लगी एक बिल्डिंग में रहती है। चूंकि उसे मेरे खाने की पसंद के बारे में पता है कि मैं जंक फूड से परहेज करता हूं, तो उसने मेरा चेहरा पढ़ते हुए लगभग विज्ञापन वाली मॉडल की तरह से पूछा, "हंगरी क्या (भूख लगी है क्या)"? जब मैंने 'हां' में सिर हिलाया, तो उसने कहा "बारिश हो रही है और ऐस में चाय के साथ पकोड़े से अच्छा क्या होगा, घर आओ, मैं तुम्हारे लिए कुछ बढ़िया बनाती हूं"!

 

मैं लगभग चीख पड़ा "क्या"? जवाब में मेरी मित्र ने "पकौड़ा - द स्नैक्स फॉर ऑल सीजन" किताब की लेखक न्यूट्रीशन कोच और कलनेरी कंसल्टेंट संगीता खन्ना की बात का हवाला देते हुए कहा "पकोड़े आमतौर पर दालों से बनते हैं, वे ग्लूटेन-फ्री होते हैं और इन्हें हेल्दी स्नैक्स बनाने की ट्रिक है कि आप तलने के लिए अच्छी क्वालिटी का कोल्ड-प्रेस्ड तेल इस्तेमाल करें"।


मुझे खींचकर घर ले जाने के अपने फैसले पर मुहर लगाते हुए उसने कहा "चाय या कॉफी के साथ पकौड़े तृप्त कर देने वाले स्नैक्स लगते हैं क्योंकि कुकीज़ और ब्रॉउनीज जैसी मीठी चीजों या कम फैट्स वाले स्नैक्स हम बिना दिमाग लगाए ऐसे ही बहुत सारा खा जाते हैं।" अब हमारे पास उसके साथ जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। घर पहुंचने के बाद उसने मेरे हाथों में संगीता खन्ना की किताब रख दी, जिसमें देशभर से जमा की गई पकोड़ों की 200 और 40 तरह की चटनियों की लिस्ट थी और इससे पकौड़ों के बारे में कही उसकी बात भी ठीक लग रही थी। एकदम ताजा बने पकौड़ों के साथ हम देशभर के रेस्तराओं की खासियतों, उनके कारोबार के बारे में बात करते रहे और एक-दूसरे से पूछते रहे कि, क्या वाकई हमारे यहां खाने के ऐसे ठिकाने हैं जिन्हें हमारी सेहत की फिक्र है?


और इस पर एक नया नाम चेन्नई के सिर्फ दो हफ्ते पुराने 'मिक्स्ड कैफे' का आया, जो यहां के रायपेट्‌टा इलाके में एक्सप्रेस एवेन्यू मॉल में स्थित है। इस फूड ऑउटलेट के बाहर लगा बोर्ड आपको चौंकाएगा जिस पर लिखा है "नो रिफाइंड फ्लोर, नो रिफाइंड शुगर"। वे अपने यहां बनने वाले सभी पेय पदार्थों में शक्कर की जगह गुड़ का इस्तेमाल करते हैं।

 

इनके एक पार्टनर भाई-बहन प्रवीण और सुनीता राजा हैं, जो shredify.me नाम की वेबसाइट और सोशल मीडिया अकाउंट चलाते हैं और लोगों को सही न्यूट्रीशन और फिटनेस को समझने में मदद करते हैं। सुनीता ने पॉवर लिफ्टिंग में राज्य स्तर गोल्ड मेडल जीता है। और वे अपने ऑउटलेट में विजेता वाली ऐसी ही भावना चाहते हैं। इस कैफे के सभी पार्टनर्स मानते हैं कि "मेन्यू में न्यूट्रीशन के हिसाब से संतुलन" हमारा मिशन होना चाहिए।


'पकौड़ों पे चर्चा' के दौरान केरल के कुमराकम के पास स्थित 'समृद्धि इथनिक फूड रेस्तरां' की भी बात चली जिसे आठ महिलाएं चलाती हैं और उन्हें इसी महीने पेसिफिक एशिया ट्रैवल एसोसिएशन की ओर से तीन गोल्ड अवार्ड प्राप्त हुए है। यह रेस्तरां 2011 में केरल सरकार के टूरिज्म मिशन के एक प्रकल्प के रूप में शुरू हुआ था, और लक्ष्य था कि क्वालिटी के जरिये इसे टिकाऊ और साथ ही पाक कला में रुचि रखने वाली स्थानीय महिलओं को सशक्त बनाया जाएगा।

 


संगीता के घर से सेहतमंद स्वाद लिए जब हम मॉल लौटे तो देखा कि कई युवा लड़कियां अमेरिका की एक मशहूर और महंगी ब्रांड की आइस्क्रीम के मिनी-कप मुफ्त बांट रही थीं। जैसे ही उसने मुझसे पूछा "सर, क्या आप इसे चखना पसंद करेंगे? यह फ्री है" हम एक साथ बोल पड़े "नहीं" और अचानक वहां मौजूद सभी लोगों के चेहरों पर खिलखिलाहट आ गई। शायद, हम मन ही मन जान गए थे कि मुफ्त में शुगर देने के पीछे हमारे दिमाग को आगे और ज्यादा शुगर लेने के लिए उकसाना है और यह किसी भी "जिम्मेदारी भरे बिजनेस" में नहीं होना चाहिए, कम से कम रेस्तरां ऑउटलेट में तो बिलकुल नहीं!


फंडा यह है कि जब अच्छी सेहत की चिंता सभी के लिए एक ट्रेंड बन रही है, ऐसे में "जिम्मेदार बिजनेस" को भी अपने ग्राहकों की सेहत को महत्व देना चाहिए जो आने वाले समय में उनकी सफलता का कारण बनेगी।

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