मैनेजमेंट फंडा / अब ब्यूटी पार्लर की तरह नॉलेज स्पा भी खोलिए!

एन. रघुरामन

एन. रघुरामन

Dec 05, 2019, 12:44 AM IST

रविवार के दिन शाम करीब 5.30 बजे पुणे के दापोडी ब्रिज के पास 22 वर्षीय युवा मजदूर नागेश जमादार अपने ठेकेदार के निर्देश पर दो अन्य साथियों के साथ काम के लिए एक गहरे गड्‌ढे में उतर गया। अचानक वह कच्चा गड्‌ढा लगभग 25 फीट धंस गया और अंदर कीचड़ गिरने के कारण नागेश उसमें कमर तक फंस गया। दो अन्य साथी मजदूर सुरक्षित थे।

वे मदद के लिए चिल्लाए, जिससे दो और स्थानीय युवक उनके साथ आ गए। हादसे की यह खबर फैलते ही स्थानीय लोग मौके पर इकट्ठा होने लगे। अधिकांश लोग सोशल मीडिया पर घटना का वीडियो अपलोड करने में व्यस्त हो गए। जल्द ही वहां पर 500 से अधिक तमाशबीनों की भीड़ जमा हो गई।

स्थानीय फायर ब्रिगेड के फायरमैन विशाल जाधव पहली बार गड्‌ढे में उतरे। लेकिन, मामला वहां जमे पागल दर्शकों के कारण बिगड़ गया जो इस रेस्क्यू ऑपरेशन के फोटो और वीडियो क्लिक करने में व्यस्त थे। मौके पर एक बार फिर से लैंडस्लाइड हो गई और यह हादसा दोनों के लिए जानलेवा बन गया।


हर घटनास्थल पर यह ट्रेंड बढ़ता जा रहा है। वहां पर भी बहुत पास से क्लोज-अप फोटो लेने के लालच में कई दर्शक कीचड़ पर चढ़ गए। नतीजा यह हुआ कि मलबे का एक बड़ा ढेर अंदर फंसे दोनों लोगों पर गिर पड़ा। अन्य दो फायरमैन और मदद करने वाले दो स्थानीय युवक भी बाद में गिरे इस कीचड़ में फंस गए।

हालांकि, उन्हें सुरक्षित निकाल लिया गया। लेकिन नागेश और विशाल बहुत गहराई में दफन हो चुके थे। नेशनल डिजास्टर रिस्पांस फोर्स के तमाम प्रयासों के बावजूद सोमवार रात तक लगभग 12 घंटे चला यह बचाव अभियान निरर्थक साबित हुआ। दोनों को मृत अवस्था में निकाला गया। हमारे आधुनिक समाज में लोग यह समझने में विफल हैं कि टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करने के दौरान उन्हें लक्ष्मण रेखा कहां खींचनी है।

ऐसा लगता है जैसे असल जिंदगी की परिस्थितियों पर जबर्दस्ती प्रतिक्रियाएं दी जा रही हैं और किसी दुर्घटना पीड़ित की मदद करने की बजाय सोशल मीडिया पर उसके फोटो-वीडियो डालकर दूसरों का ध्यान खींचना ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। ऐसी घटनाओं से यही समझ आता है कि इन दिनों इंसानियत के लिए कोई जगह नहीं बची है, सबका ध्यान दिखावे पर है।

तेज और सस्ते डिजिटलाइजेशन ने हमारे समाज में सोशल मीडिया की गहरी पैठ बना ली है। लाइव या पोस्ट की गई कोई भी छोटी-बड़ी घटना किसी को भी कुछ पलों में मशहूर बना सकती है। सोशल मीडिया पर सबके बीच ऐसे मशहूर होने की सनक ने हमें अमानवीय बना दिया है। वीडियो अपलोड करने या किसी भी घटना की सबसे पहले तस्वीरें पोस्ट करने की होड़, जुनून बन गई है।


मुझे तो यह बात हैरान करती है कि किसी हादसे वाली जगह पर लोग फोटो-वीडियो कैसे बना लेते हैं? पीड़ित और उसके परिवार के बारे में बिना सोचे उन्हें सोशल मीडिया पर अपलोड कैसे कर देते हैं? यह न केवल एक “खराब आदत’ है, बल्कि जबरन की “तारीफ’ के लिए दी गई गलत प्रतिक्रिया भी है। मेरे मित्र का बेटा इस तरह के घृणित सार्वजनिक व्यवहार पर एक रिसर्च कर रहा है।

वह कहता है कि जो लोग अपने मोबाइल फोन पर ऐसे हादसों को शूट करते हैं, उन्हें बचपन में अपने माता-पिता, समाज या शिक्षकों से कभी प्रशंसा नहीं मिली होती है। यदि उसकी रिसर्च आने वाले दिनों में इस बात को सही साबित करती है तो फिर दोष हम माता-पिता और समाज के माथे ही पड़ेगा! क्या कम से कम ऐसी विपदा की स्थिति में समाज के सभी वर्गों के लिए करुणा और नि:स्वार्थ भाव से मदद करना हमारा कर्तव्य नहीं है?

फंडा यह है कि  हमें अपने बच्चों को मुश्किल हालात में इंसानों की तरह प्रतिक्रिया देना सिखाना चाहिए, न कि सोशल मीडिया की सस्ती तारीफ के लिए उन्हें एक पागल वीडियोग्राफर बनने देना चाहिए। 

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