मैनेजमेंट फंडा / पैरेंटिंग है ऊंचे प्रबंधन सिद्धांत वाला संस्थान

Dainik Bhaskar

Apr 17, 2019, 12:08 AM IST



Parenting is an institution with high management theory
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Parenting is an institution with high management theory
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  • मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन की आवाज में मोबाइल पर सुनने के लिए टाइप करें FUNDA और SMS भेजें 9190000071 पर

वे दोनों हैदराबाद की एक अर्बन सोसायटी के बीच पली-बढ़ी हैं और ढाई वर्ष की ये जुड़वां बच्चियां जब एक इल्ली को रेंगते देखती हैं तो रोमांचित हो जाती हैं। वे घंटों उस जीव को हिलते-डुलते देख सकती हैं और तभी उस जगह से हटती हैं, जब उन्हें भरोसा हो जाता है कि वह सुरक्षित है।

 

वे सुबह जल्दी उठती हैं और मस्ती में इधर-उधर डोलते हुए अपने सारे नित्यकर्म करती हैं। उन्हें ब्रश करने में मजा आता है, मुंह धोते हुए वे पानी से खेलती हैं और फिर रंगोली भी बनाती हैं- एक बहन धरती बनाती है तो दूसरी सूरज उकेरती है। दोनों में अपने आसपास मौजूद चीजों को देखकर कुछ नया बनाने की प्रतिस्पर्धा होती है। फिर वे पास के पार्क में फिसलपट्‌टियों पर खेलती हैं और घर लौटती हैं तो अखबार में छपी तस्वीरों को गौर से देखती हैं। दिन चाहे छुट्‌टी का हो या फिर कोई सामान्य कामकाजी दिन हो, वे कभी भी जल्दबाजी में नहीं होती। उनके पैरेंट्स उन्हें अपनी जगह पर ही हर चीज करने की अनुमति देते हैं और अपने जीवन की नींव रख रहे किसी भी बच्चे के लिए यह सबसे जरूरी होता है। यह मत सोचिएगा कि उनके घर में दादा-दादी, नौकर-चाकर और गृहिणी के रूप में मां होगी! बिलकुल नहीं, उनका छोटा-सा परिवार है और माता-पिता दोनों कॉर्पोरेट वर्ल्ड में ऊंचे पदों पर काम कर चुके हैं। उनके घर में बच्चों के मन बहलाव के लिए टीवी भी नहीं है।


आप जानकर हैरान होंगे कि यह चमत्कार कैसे हुआ? इसकी वजह हैं बच्चियों के पिता, चिराग मेहता, जो बिग बाजार में डिप्टी जीएम पद पर रहे हैं। वे राजकोट (गुजरात) के रहने वाले हैं और अब हैदराबाद में अपनी बच्चियों के जीवन की नींव बनाने वाले वर्षों को बेहद करीब से देख रहे हैं। उन्हें अपने कॅरिअर में ठहराव महसूस हो रहा था और तभी उन्होंने तय किया कि अब वे बच्चों के साथ घर पर ही रहेंगे। बचपन के इन बेहतरीन वर्षों के हर पल को रिकॉर्ड करने के लिए उन्होंने एक ब्लॉग ‘माय डॉटर्स एंड मी - ग्रोइंग अप टुगेदर’ शुरू किया। अब घर खर्च चलाने की पूरी जिम्मेदारी उनकी पत्नी निवेदिता मुम्माड़ी की है। अगर आप एक युवा पैरेंट हैं तो मेरी सलाह है कि आप इनके ब्लॉग को जरूर देखिए, जहां आपको बच्चों को बड़ा करने के अनुभव को लेकर कुछ बढ़िया केस स्टडीज पढ़ने को मिलंेगी।


दिलचस्प  बात यह है कि उनकी बेटियां हर तरह की सब्जियां खाती हैं और इसके पीछे एक बड़ा कारण है कि उन्होंने ऐसा करने के लिए उन्हें कभी इनाम नहीं दिया। वे अपने ब्लॉग में कहते हैं कि बच्चों से मनचाहा व्यवहार चाहने के लिए पैरेंट्स अक्सर उन्हें इनाम देते हैं। इस तरह का एक इनाम तंत्र बनने से बच्चा यह समझने लगता है कि जो काम उससे इनाम के लालच में करवाया जा रहा है वह अच्छा नहीं है और उसके करने योग्य नहीं है और बच्चा यह कभी नहीं समझ पाता कि उस काम को करने में ही एक सार्थक इनाम छुपा हुआ है। वे प्रश्न करते हैं, ‘एक इनाम, दूसरे इनाम के पीछे चलता है और फिर यही क्रम चलता रहता है। ऐसे में फिर क्या होता है?’ वे कहते हैं, ‘किसी भी बच्चे को एक बार इनाम दिया जा सकता है। भले ही ऐसा किसी लालचवश किया जाए तो, बच्चा समझ जाता है कि उसे क्या और क्यों इनाम दिया जा रहा है। एक तरह से उसे प्रशिक्षण मिलता जाता है कि अगर उसे कुछ करने के लिए कहा जाएगा तो इसके बदले में उसे कुछ ‘खास’ मिलेगा। चिराग कहते हैं कि हमारे घर में बच्चियों के लिए मछलियां पाली हुई हैं। वे जो कुछ भी करती हैं या सीखती हैं उसे अपने पालतू जीव से जोड़कर देखती हैं और उससे जुड़े हुए प्रश्न करती हैं। मछलियों को लेकर उनका पसंदीदा प्रश्न होता है- ‘फिश का टॉयलेट कहां होता है’? चिराग सहमत हैं कि बच्चों की परवरिश करना आसान काम नहीं है और कई बार कमजोर बना देने वाले मौके भी सामने आते हैं और ज़िंदगी अपेक्षाकृत परफेक्ट नहीं लगती।

 

फंडा यह है कि   पैरेंटिंग मैनेजमेंट सिद्धांतों वाला संस्थान है, जो हर घर का अलग अनुभव है। अतः अपने घर या बच्चों की दूसरों से तुलना कटु अनुभव हो सकता है।

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