मैनेजमेंट फंडा / स्कूल सिर्फ नंबर लाने के लिए नहीं होते!



Schools are not just for bringing numbers!
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Schools are not just for bringing numbers!

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एन. रघुरामन

एन. रघुरामन

Oct 20, 2019, 06:14 AM IST

मैं बहुत फ्लर्ट (इश्कबाजी) करता हूं। नहीं, नहीं उस तरह नहीं, जैसा आप सोच रहे हैं। मैं किताबों से फ्लर्ट करता हूं। मैं किताब उठाता हूं और उसके साथ फ्लर्टिंग करना (पढ़ना) शुरू कर देता हूं। 15-20 मिनट के बाद अगर यह मुझे पसंद आ जाती है तो फिर वह मेरी पढ़ाई की टेबल का हिस्सा बन जाती है, अन्यथा मैं उसे वहीं रख देता हूं, जहां से उठाई थी। मैं इस बात पर पक्का यकीन करता हूं कि किसी किताब की सामग्री खुद ही अपना पाठक चुनती है और कोई वह नहीं चुन सकता जो हम चाहते हैं। क्योंकि जब आप किसी किताब के साथ फ्लर्टिंग करना शुरू करते हैं, तो यह आपकी पसंद और आप जो पढ़ रहे होते हैं, दोनों के बीच एक मेल-मिलाप चलता रहता है। और अचानक आपको महसूस होने लगता है कि आपको उस किताब से इश्क हो गया है और अब आपके लिए इसे बंद करके रखना बहुत मुश्किल होगा।


अगर आप किताब के साथ सख्ती करते हैं जैसे कि शिक्षक पढ़ने को मजबूर करते हैं या फिर ऑफिस में आपको कोई जबरदस्ती कहता है, तो किताब की बातें उस तरह आपके दिमाग में नहीं जाती, जैसे कि जानी चाहिए। यह एक किताब और उसे पढ़ने वाले के बीच 'इमोशनल कनेक्ट (भावनात्मक संबंध)' होता है।


ऐसा नहीं है कि 'किताबों का जायका' बदलता नहीं है। यह वक्त के साथ वैसे ही बदलता है जैसे हमारी लाइफस्टाइल और बाजार की मांग बदलती जाती है। और कई बार यह आपकी तात्कालिक भावनाओं या मूड के हिसाब से भी बदल जाता है। अगर आप किसी बुक स्टोर में हैं और खुश है तो आपकी खोज एक मजेदार किताब पर जाकर खत्म होगी और अगर आप गंभीर मुद्रा में सोच रहे हैं, तो संभव है कि किसी गंभीर लेखक की कोई किताब आपका ध्यान खींचेगी। संभव है कि हमारा दिमाग कुछ इसी तरह सधा हुआ हो। और, यही कारण है कि मैंने अपने स्कूल के शिक्षकों से यही सीखा कि, सब कुछ पढ़ो और खूब प्रयोग करो।


यही प्रमुख कारण है कि हाल की चेन्नई यात्रा के दौरान एक खबर ने मेरा ध्यान खींचा जो यह थी कि, एक स्कूल, श्री चैतन्य टेक्नो स्कूल ने अपने सभी छात्रों को एक ही तरह के हैंडराइटिंग फॉन्ट इस्तेमाल करने पर जोर दिया है ताकि इससे उन सभी को परीक्षा में ज्यादा नंबर मिलें। हालांकि ग्रैफोलॉजिस्ट (लेखन विशेषज्ञ) और साइकोलॉजिस्ट उनके इस कदम की आलोचना करते हुए साफ लिखावट के छुपे खतरों के बारे चेतावनी देते हैं। उनका कहना है कि ऐसी एकरूपता से बच्चे के व्यक्तित्व के विकास में ठहराव आ सकता है। इस स्कूल की प्रिंसिपल अर्पणा अरुलानंदन, इस बात को स्वीकार करती हैं कि उनके स्कूल में हर कोई, यानि एलकेजी से लेकर कक्षा ग्यारहवीं तक हर किसी को हर दिन बिना बहाना एक पेज 'लुसिडा' नामक फॉन्ट में लिखने का अभ्यास करना पड़ता है। सिर्फ इसी फोंट में लिखने की अनिवार्यता पर अर्पणा ने मीडिया से कहा कि "पिछले वर्षों के मुकाबले, इस बार हमारे बच्चों ने बोर्ड परीक्षा में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया, क्योंकि अब वे खराब 'प्रजेंटेशन' के कारण कोई नंबर नहीं गवां रहे हैं।


मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि इस कदम से तर्क की अवहेलना होती है। उनका तर्क है कि अतिरिक्त अंकों के लिए लेखन की एक ही शैली पर जोर देकर, स्कूल किसी बच्चे के व्यक्तित्व को बदल देगा, क्योंकि यह लिखावट ही होती है जो हर एक बच्चे की शारीरिक और भावनात्मक स्थिति के बारे में गहराई से बताती है। बच्चे के विकास और व्यक्तित्व के लिए सिर्फ एक फॉन्ट में जबरदस्ती लिखवाना गलत है। ग्रैफोलॉजी स्कूल ऑफ इंडिया के प्रमुख दिलीप किरानी कहते हैं कि स्कूल को बच्चों के लिखने के तरीके को बदलने के लिए अतिरिक्त जोर देना समझदार और स्वस्थ तरीका नहीं है। जिंदगी में हम सभी एक जैसी किताबें, एक जैसे विषय पढ़ते हैं और स्कूल का समय और हमारे ज्ञान की परीक्षा के नियम भी लगभग एक जैसे ही होते हैं, पूरे देश में नहीं तो कम से कम एक राज्य में तो सभी बच्चों के लिए एकसमान व्यवस्था होती है। हम कभी भी वह नहीं पढ़ते या पढ़ सकते, जो वाकई पढ़ना चाहते हैं। हम हमेशा खुद को वैसे शिक्षित करते हैं जैसा दूसरे हमें करना चाहते हैं। लेकिन आज बहस का मुद्दा यह है कि क्या समाज, स्कूल और शिक्षकों को अब यह तय करने की छूट मिल जानी चाहिए कि, नई पीढ़ी को किस हैंडराइटिंग में लिखना चाहिए ?


फंडा ये है कि जिंदगी हमेशा परीक्षा के नंबरों की मोहताज नहीं होती, यह तो इसलिए महत्वपूर्ण होती है कि आप इस विविधता भरी विशाल दुनिया में कितने भिन्न विषयों और अलग-अलग तरीकों से लिखी किताबों के बारे में क्या और कितना कुछ जानते हैं। यह निश्चित रूप से आपकी समझ के बारे में है, न कि मार्कशीट के नंबरों के बारे में। याद रखिए, हम किसी भी कार्यस्थल पर रोज सिर्फ अपनी समझ लेकर जाते हैं, मार्कशीट लेकर नहीं! 
 

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