मैनेजमेंट फंडा / टेक्नोलॉजी : अमीरों को लत लग रही, गरीब ‌अपना रहे

एन. रघुरामन

एन. रघुरामन

Feb 05, 2020, 12:00 AM IST

अमीरों की कहानी : इन परिवारों ने समस्या को पहचान लिया है और इसका इलाज कर रहे हैं, जबकि हममें से ज्यादातर लोग इस पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। हालांकि, हम जानते हैं कि हमारे घर में या पड़ोस में कोई न कोई ऐसा है, जिसे स्क्रीन की लत लग चुकी है। इनमें 13 साल के बच्चों से लेकर 30 साल तक के लोग हैं।

जी हां, मैं कॉलेज जाने वाले और कामकाजी वयस्कों की बात कर रहा हूं जो किसी न किसी स्क्रीन पर घंटों खर्च कर रहे हैं। मैं कम से कम ऐसे चार मरीजों को जानता हूं, जिनका नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेस सेंटर फॉर वेलबीइंग (निम्हांस), बेंगलुरु के शट (सर्विस फॉर हेल्दी यूज ऑफ टेक्नोलॉजी) क्लिनिक में इलाज हुआ है। शट क्लिनिक टेक की लत का इलाज करने वाला भारत का पहला सेंटर है। 


इन मरीजों ने फ्लैट की बालकनी से कूदने की धमकी दी थी, जब उनके माता-पिता ने डोटा2 और पबजी जैसे मल्टीप्लेयर ऑनलाइन वीडियो गेम्स खेलने से रोकने के लिए लैपटॉप छीन लिया था। पैरेंट्स ने उनकी इस लत की गंभीरता को तब पहचाना जब बच्चों ने 35-35 घंटे तक खेलने के लिए खाना और नींद छोड़ना शुरू कर दिया। जबकि आमतौर पर ये बच्चे शांत स्वभाव के ही थे।

जून 2018 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ‘गेमिंग डिस्ऑर्डर’ को इंटरनेशन क्लासिफिकेशन ऑफ डिसीज के 11वें एडिशन में शामिल किया। पिछले साल अमेरिका के लाइमलाइट नेटवर्क्स ने एक रिपोर्ट जारी की, जिसके मुताबिक 24.2% भारतीय गेमर्स ने गेम खेलने के लिए काम तक छोड़ दिया, जबकि 52% भारतीयों ने काम के दौरान भी गेम खेले, जो कि विश्व में सबसे ज्यादा है।

भारतीय गेमर्स ने नींद छोड़ी (45%), खाना छोड़ा (37%) और दोस्तों से मिलने के दिन भी छोड़ दिए (35%)। यह चिंताजनक है। पिछले साल की एक रिपोर्ट के मुताबिक मोबाइल गेम की लत वाले नवयुवकों में ज्यादा अवसाद, सामाजिक चिंता और अकेलेपन की समस्या देखी गई है। महिलाओं की तुलना में सामाजिक चिंता और अकेलेपन से वे पुरुष ज्यादा पीड़ित हैं, जिन्हें मोबइल गेम्स की लत थी। शट पर भी 200 मरीजों में केवल एक महिला है।


गरीबों की कहानी : जब आप बेंगलुरु आएंगे और किसी भी रोड पर गाड़ी में सफर करेंगे तो एक ऐसी चीज देखेंगे जो देश के बाकी शहरों से अलग है। यहां सब्जियों, फलों, प्लास्टिक के बर्तनों, झाड़ुओं और रोजमर्रा की जरूरत के अन्य सामानों से भरे ठेले खींचते सड़क पर सामान बेचने वाले अपनी अलग अवाजों और अनोखे अंदाज में ग्राहकों को आकर्षित करते हैं। अगर आप ध्यान देंगे तो आपको आश्चर्य होगा कि ज्यादातर अनाउंसमेंट दोहराए जा रहे हैं।

किसी इंसान के लिए तो ऐसा करना संभव नहीं है। इंसान के बोलने पर कुछ शब्द बदल सकते हैं, लेकिन बेंगलुरु के ठेले पर सामान बेचने वालों के साथ ऐसा नहीं होता। कोई लाइन सौ बार भी दोहराई जाए तो भी वैसी ही सुनाई देती है। आप जानते हैं ऐसा क्यों? क्योंकि ज्यादातर विक्रेता एम्प्लीफाइड स्टीरियो सिस्टम इस्तेमाल करते हैं, जिसमें पहले से रिकॉर्ड किए गए एनाउंसमेंट होते हैं। इन्हें उस दिन बिक्री के लिए तैयार किया जाता है, जो कि मंडी से मिली सब्जियों पर निर्भर करता है।


ये विक्रेता ऐसा माइक खरीदते हैं, जिसमें रिकॉर्ड, प्ले, पॉज और रीसेट विकल्पों के साथ साउंड बॉक्स भी होता है। करीब 2000 रुपए के सिस्टम में रोज मैसेज रिकॉर्ड करते हैं। इनबिल्ट मेमोरी चिप से एक बार रिकॉर्ड कर कई बार प्ले किया जा सकता है। रिचार्जेबल बैटरी तीन घंटे रिचार्ज करने पर 6-8 घंटे चलती है। कई आउटसोर्सिंग यूनिट्स भी हैं, जिनसे वे आकर्षक आवाज में अपनी पसंद की भाषा में मैसेज पा सकते हैं।

फंडा यह है कि  टेक्नोलॉजी से नियंत्रित होने की बजाय, टेक्नोलॉजी को हमारे नियंत्रण में होना चाहिए।

आज का राशिफल

पाएं अपना तीनों तरह का राशिफल, रोजाना