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ओम गौड़ का कॉलम:अपने मनोरंजन का परित्याग करें, नहीं तो तीसरी लहर के खतरे को कोई नहीं रोक पाएगा

2 महीने पहले
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ओम गौड़, नेशनल एडिटर (सैटेलाइट), दैनिक भास्कर - Dainik Bhaskar
ओम गौड़, नेशनल एडिटर (सैटेलाइट), दैनिक भास्कर

कोरोना की तीसरी लहर रोकनी है तो हमें अपने मनोरंजन का त्याग करना होगा। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के डॉक्टरों ने पहाड़ों पर उमड़ी सैलानियों व मंदिर में उमड़े श्रद्धा के सैलाब पर गहरी चिंता जताते हुए बकायदा एक पत्र जारी किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी नागरिकों से गुहार लगाई है कि वे कुछ माह और अपने मनोरंजन का परित्याग करें, नहीं तो तीसरी लहर के खतरे को कोई नहीं रोक पाएगा।

सबसे बड़ा सवाल है कि प्रधानमंत्री उन सरकारों को पाबंद क्यों नहीं करते, जिन्होंने अपने राज्य में पर्यटन और धार्मिक स्थलों के दरवाजे सबके लिए खोल दिए हैं? तीसरी लहर रोकने का काम अब चिंता से नहीं एक्शन से ही होगा? देश में कोरोना की पहली लहर के बाद जीत का जश्न मनाया गया, सरकारें चुनाव के मूड में आ गईं और बाजारों में भीड़ उमड़ने लगी।

नतीजा किसी से छुपा नहीं है, बेधड़क कोरोना की दूसरी लहर आई और हमारी खुशियां छिन गईं। पहली व दूसरी लहर में अपनों को खो चुके परिवारों से पूछिए कि तीसरी लहर आई तो क्या असर होगा? जब हम डेढ़ साल से अपना एन्जॉयमेंट त्याग रहे हैं तो अब महीने-डेढ़-महीने में क्या हो जाएगा। क्यों हमें अपनी और दूसरोें की चिंता नहीं है? कोरोना से लड़ने का एकमात्र तरीका है खुद का अनुशासन। अगर हमने अपने से शुरुआत की तो नि:संदेह तीसरी लहर रोक सकेंगे।

कोरोना को रोकना हमारा धर्म ही नहीं, फर्ज भी है, लेकिन सत्ताधीशों को भीड़ जुटाने जैसे फैसले देकर इसे ‘वोट बैंक’ के रूप में देखना अपराध जैसा कृत्य है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और बिहार में कावड़ यात्रा की इजाजत क्याें दी गई। क्या इसे एक साल के लिए रोक नहीं सकते थे। लेकिन चुनाव में कुछ हासिल करने के लिए आमजन को कुछ खोने को मजबूर करने वाले फैसले के पीछे सरकार की क्या मंशा है, यह किसी से छिपा नहीं है।

आज महंगाई और बेरोजगारी के लिए भी हम इस महामारी को जिम्मेदार मानते हैं। अगर तीसरी लहर आई तो वह हमें कहां लेकर जाएगी, यह सोचने वाली बात है। बात चाहे पर्यटन स्थलों को खोलने की हो या धार्मिक स्थल, खतरा हर तरफ है। कोरोना में राज्य सरकारों में जिस तरह तकरारें देखने मिली हैं, शायद इससे पहले कभी नजर नहीं आईं।

क्या कोरोना को लेकर एक देश, एक नीति की घोषणा नहीं होनी चाहिए? क्या वैक्सीन की दूसरी डोज लगने तक भीड़भाड़ वाली गतिविधियों पर पाबंदी नहीं लगानी चाहिए? हमारे लिए देश का स्वास्थ्य पहली दरकार है तो फिर इसे लागू करने के लिए क्या हमें पड़ोसी देशों की इजाजत चाहिए।

कोरोना में राज्यों को आपस में प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए, लेकिन इस बात की नहीं कि वह दूसरे राज्य को छोटा दिखाएं। महामारी को हमें राजनीति से मुक्त रखना चाहिए था, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। देश में तीसरी लहर आए, यह कौन चाहेगा? लेकिन यहां प्रश्न चाहने, न चाहने का नहीं, सिर्फ सतर्कता का है और सरकारों के लिए यह सोचने का है कि चुनाव तो फिर कभी भी हाे जाएंगे, यह इंसान की जिंदगी से बड़ा नहीं है।

आपके कदम रुकेंगे तो ही कोरोना की तीसरी लहर रुकेगी। सरकारें कहीं आईसीयू बेड, ऑक्सीजन प्लांट, कोरोना टेस्ट और वैक्सीनेशन डोज बढ़ाने की बात करती नहीं दिख रही हैं। कोरोना में मृतकों के आंकड़े छुपाकर एक्सपोज हुई सरकारों के सामने सबसे बड़ा संकट अपनी छवि बचाने का है।