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अभय कुमार दुबे का कॉलम:खेतिहर जातियां अपेक्षाकृत संसाधन-सम्पन्न हैं, वहीं कारीगर जातियां दुर्बलता की शिकार हैं

23 दिन पहले
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अभय कुमार दुबे अम्बेडकर विवि, दिल्ली में प्रोफेसर - Dainik Bhaskar
अभय कुमार दुबे अम्बेडकर विवि, दिल्ली में प्रोफेसर

एक प्रतिष्ठित समाजशास्त्री ने आर्थिक रूप से दुर्बल वर्गों को आरक्षण देने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कहा है कि इससे सामाजिक न्याय की अंत्येष्टि हो गई है। उनका तर्क है कि ऐसा करके सुप्रीम कोर्ट ने समाज के शक्तिशाली व सुविधासम्पन्न हिस्से को विशेष सुविधाएं प्रदान की हैं।

मोटे तौर पर उनकी बात सही है, लेकिन यह अधूरा सच है। पूरा सच यह है कि आरक्षण की नीति शुरू से ही जाने-अनजाने अपने-अपने दायरों के तहत अपेक्षाकृत शक्तिशाली वर्गों को नौकरियों और शिक्षा में विशेष अवसर प्रदान करने के लिए इस्तेमाल होती रही है। एससी-एसटी के संदर्भ में यह नतीजा अनजाने में निकला है। लेकिन पिछड़ी जातियों और अब ऊंची जातियों के संदर्भ में यह परिणाम जानबूझकर निकाला गया है।

संविधान सभा जब पूर्व-अछूतों और आदिवासियों को उनकी आबादी के मुताबिक आरक्षण का प्रावधान कर रही थी तो उसके पास भारतीय परिस्थितियों में इस नीति के फलितार्थों का कोई अनुभव नहीं था। इसलिए जाटव, महार और माला जैसी दूसरों के मुकाबले बेहतर स्थिति में जीवन-यापन कर रही पूर्व-अछूत जातियों की तरफ आरक्षण के लाभों के झुकते चले जाने का पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सका था।

जनजातियों के संदर्भ में भी भीलों, संथालों और मीणाओं सरीखे समुदायों के हाथ में इन फायदों के सिमटकर रह जाने का अंदाजा लगाना मुश्किल था। उस समय यह सोचने का कोई आधार नहीं था कि दलितों और आदिवासियों के बीच बहुत छोटी और अत्यंत कमजोर जातियों या कबीलों के साथ सामाजिक न्याय करने के लिए अतिरिक्त प्रयासों की जरूरत पड़ सकती है।

आरक्षण-नीति की अंत्येष्टि हो चुकी है। जो शेष रह गया है, वह है इसका राजनीतिक दोहन। यह शुरू से ही अपने दायरों के तहत अपेक्षाकृत शक्तिशाली वर्गों को विशेष अवसर देने के लिए इस्तेमाल होती रही है।

जब नब्बे के दशक में मंडल सिफारिशों के आधार पर ओबीसी आरक्षण दिया गया तो सामाजिक न्याय की नीतियों से होने वाले लाभों के समान वितरण से संबंधित व्यावहारिक समस्याओं की पूरी जानकारी हो चुकी थी। लेकिन पिछड़े वर्गों को भी आरक्षण देने में एससी-एसटी वाली गलती दोहराई गई। अब यही गलती और विकराल रूप में आर्थिक रूप से दुर्बल ऊंची जातियों को मिले दस फीसदी आरक्षण के रूप में दोहराई नहीं, बल्कि तिहराई जा रही है।

यह तथ्य आम तौर से प्रकाश में आने से रह जाता है कि मंडल आयोग की रपट सर्वसम्मत नहीं थी। आयोग के एकमात्र दलित सदस्य आरएल नायक ने आयोग की सिफारिशों पर असहमति दर्ज कराई थी। नायक का कहना था कि ओबीसी को मोटे तौर पर बराबर-बराबर के दो हिस्सों में बांटकर देखना चाहिए।

एक हिस्सा उन जातियों का है जो खेतिहर हैं। दूसरा उनका है जो कारीगर हैं। खेतिहर जातियां अपेक्षाकृत संसाधन-सम्पन्न हैं और कारीगर जातियाँं छुआछूत को छोड़कर ऐसी प्रत्येक दुर्बलता की शिकार हैं, जिनका सामना पूर्व-अछूत समुदाय करते हैं। बाजार और तकनीक के विकास से उनकी रोजी-रोटी की संभावनाओं का क्षय हो रहा है। इन जातियों को आरक्षण की कहीं अधिक आवश्यकता है।

इस विश्लेषण का नतीजा यह था कि पिछड़ी जातियों को मिलने वाले आरक्षण में से एक अच्छा-खासा हिस्सा कारीगर जातियों के लिए अलग से निर्धारित किया जाना चाहिए। नायक की सिफारिश को मंडल आयोग ने ठुकरा दिया। बाद में जब वीपी सिंह ने इन सिफारिशों को लागू किया तो उन्होंने भी नायक की आपत्तियों को नजरअंदाज कर दिया। कुल-मिलाकर मंडल कमीशन की रपट खेतिहर जातियों के सशक्तीकरण और कारीगर जातियों को दुर्बलता के लिए अभिशप्त रखने की कवायद साबित हुई।

उसी कहानी को आज दूसरे रूप में दोहराया जा रहा है। संविधान संशोधन और उसकी तस्दीक करने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार जिन ऊंची जातियों की आमदनी आठ लाख या उससे कम है, वे दस फीसदी आरक्षण की हकदार हैं। यानी ऊंची जातियों के जो परिवार 67,000 रु. प्रतिमाह कमाते हैं, वे इस सीमा के मुताबिक आर्थिक रूप से दुर्बल माने जाएंगे। क्या यह निर्धारित करते समय गरीबी की सीमा-रेखा पर विचार नहीं किया गया था?

जब वीपी सिंह ने ओबीसी आरक्षण लागू किया था, उस समय भाजपा अकेली ऐसी थी, जिसने अपने घोषणापत्र में आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की मांग की थी। वह ओबीसी आरक्षण का विरोध नहीं कर सकती थी, लेकिन अपने ऊंची जातियों के जनाधार को सम्बोधित करना उसके लिए जरूरी था। विडम्बना यह है कि आज तकरीबन हर पार्टी उसके तय किए इस एजेंडे को ही आगे बढ़ाते हुए दिख रही है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)