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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:आदित्य चोपड़ा बिना किसी प्रचार के करते हैं अपने काम, वे दादा साहब फाल्के पुरस्कार के हकदार

एक महीने पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

पारंपरिक रूप से दादा साहेब फाल्के पुरस्कार 2 मई को दिया जाता है परंतु उसकी घोषणा मार्च या अप्रैल में की जाती है। इस वर्ष महामारी के चलते संभवत: समारोह आयोजित नहीं किया जाएगा। धुंडिराज गोविंद फाल्के का जन्म ग्राम त्र्यम्बकेश्वर में हुआ जो पावन नगर नासिक से कुछ मील दूर बसा है। भारतीय शास्त्रों और संस्कृत में पारंगत इस परिवार ने शिक्षा देने का काम किया। धुंडिराज गोविंद के पिता का तबादला मुंबई हुआ। धुंडिराज को चित्रकला सीखने का अवसर मिला।

कुछ वर्ष पश्चात उन्हें महाराज बड़ौदा के वाचनालय को सहेजने का काम मिला, जहां उन्हें ‘बायोस्कोप’ नामक पत्रिका पढ़ने का अवसर मिला।गौरतलब है कि महात्मा गांधी का जन्म 1869 में हुआ था। महात्मा गांधी ने अपने बचपन में ‘राजा हरिश्चंद्र’ नामक नाटक देखा था। उन्होंने अपने जीवन में कभी कोई फिल्म नहीं देखी परंतु उनके आदर्श से अनगिनत फिल्में प्रेरित रही हैं। गांधी जी की एक लंदन यात्रा में चार्ली चैपलिन उनसे मिलने आए और गांधी जी से प्रेरित फिल्म ‘मॉडर्न टाइम्स’ भी बनाई।

खाकसार ने ‘महात्मा गांधी और सिनेमा’ नामक किताब लिखी जिसे उत्तम झंवर ने मौर्या प्रकाशन के तहत प्रकाशित किया। किताब का अंग्रेजी और कन्नड़ भाषाओं में अनुवाद हुआ है और मराठी भाषा में भी प्रयास किया गया है। किताब में गांधी जी और चैपलिन का दुर्लभ चित्र भी शामिल किया गया है। महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन किए। स्वतंत्रता विविध रूपों में सामने आई है, तो सिनेमा भी डिजिटल तक यात्रा कर चुका है। हिटलर के दौर में सिनेमा को प्रचार के लिए उपयोग किया गया।

आज भी यह प्रचार का महत्वपूर्ण माध्यम है। नेता-अभिनेता विविध छवियां गढ़ते हैं। छवियों के इस खेल में अवाम रचा-रमा हुआ है। ट्रिक फोटोग्राफी का अविष्कार हुआ और ट्रिक राजनीति में प्रवेश किया। यह भी गौरतलब है कि धुंडिराज फाल्के, कृष्ण जीवन से प्रेरित फिल्म बनाना चाहते थे परंतु साधन सीमित थे, अत: उन्होंने ‘राजा हरिश्चंद्र’ बनाई। यह इत्तेफाक भी गौरतलब है कि उन दिनों तवायफों तक ने फिल्म में अभिनय करने से इन्कार किया।

दादा फाल्के ने तारामती की भूमिका सोलंके नामक पुरुष से अभिनीत करवाई। पुरुष पाखंड प्रेरित समाज में आए दिन दुष्कर्म होते हैं। आजकल उत्तम प्रदेश में यह आए दिन हो रहा है। ऑलिवर स्टोन ने ‘जेएफके’ नामक राजनैतिक फिल्म बनाई जिसके अंत में प्रेसीडेंट जॉन एफ कैनेडी की हत्या का षड्यंत्र रचने वाले का नाम भी उजागर किया। हमारे यहां प्रकाश झा ने राजनैतिक फिल्में बनाईं जैसे ‘मृत्युदंड’, ‘गंगाजल’, ‘अपहरण’, ‘दामुल’ इत्यादि परंतु ‘राजनीति’ नामक फिल्म मात्र ‘गॉडफादर’ की एक कैरीकेचर निकली।

सेंसर के लोहपाश के कारण भारत में राजनैतिक फिल्में बनाना कठिन है। प्रचार फिल्मों के लिए बहुत अवसर हैं। सामाजिक सोदेश्यता का मनोरंजन गढ़ना कठिन काम हो गया है। यह अब जादू का खिलौना है, मिल जाए तो माटी, खो जाए तो सोना है। इस वर्ष फाल्के पुरस्कार आदित्य चोपड़ा को दिया जा सकता है। उन्होंने लोकप्रिय सितारों को उनका मुंहमांगा पारिश्रमिक देकर भव्य पैमाने पर फिल्में बनाईं तो नए कलाकारों को भी अवसर दिए।

उन्होंने भूमि पेडनेकर से वजन बढ़ाने को कहा और एक मोटी लड़की की कथा बनाई। भूमि पेडनेकर ने वजन घटाकर ‘टॉयलेट एक प्रेम कथा’ और ‘सांड की आंख’ नामक सफल फिल्में कीं। उन्होंने रणवीर सिंह और अनुष्का शर्मा को अवसर दिए। उनका यशराज स्टूडियो सर्वसुविधा संपन्न वातानुकूलित स्टूडियो रहा है, जहां सेहत के लिए मुफीद भोजन कर्मचारियों को बिना लाभ कमाए उपलब्ध कराया जाता है।

आदित्य चोपड़ा बिना किसी प्रचार के अपने काम करते हैं। उनके पिता यशराज चोपड़ा को भी दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाजा गया था, अत: वे संभवत: इसे स्वीकार करें। कोविड के पहले ही वे सार्वजनिक समारोह से बचते रहे हैं। वे अपनी निजता की रक्षा करते हैं। उनकी पत्नी रानी मुखर्जी भी एक फिल्म परिवार में जन्मी हैं। बहरहाल आमिर खान भी एक उम्मीदवार माने जा सकते हैं।

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