• Hindi News
  • Opinion
  • After A 2017 Meeting Of NITI Aayog, The Farmers Unions Bowed Their Heads, So The Farmers Did Not Understand The Words Of The Prime Minister.

अभय कुमार दुबे का कॉलम:नीति आयोग की 2017 की एक बैठक के बाद किसान यूनियनों का माथा ठनका इसलिए प्रधानमंत्री की बात नहीं समझी किसानों ने

13 दिन पहले
  • कॉपी लिंक
अभय कुमार दुबे, सीएसडीएस, दिल्ली में प्रोफेसर और भारतीय भाषा कार्यक्रम के निदेशक - Dainik Bhaskar
अभय कुमार दुबे, सीएसडीएस, दिल्ली में प्रोफेसर और भारतीय भाषा कार्यक्रम के निदेशक

किसान क्या चाहते हैं? प्रधानमंत्री की उनसे क्या अपेक्षा है? भारतीय राज्य के सर्वोच्च और सबसे शक्तिशाली प्रतिनिधि के रूप में प्रधानमंत्री अगर किसानों को कुछ समझाना चाहते हैं तो उनकी बात समझने के लिए किसान क्यों तैयार नहीं हुए? यही हैं वे सवाल जिसका जवाब लोकतंत्र के अध्येताओं और राजनीतिक परिस्थिति के समीक्षकों को तलाश करना है।

आंदोलन कितना भी लंबा क्यों न चले, पर उसके बाद भी किसान रहेंगे, उनकी समस्याएं भी रहेंगी। नरेंद्र मोदी कितने भी वर्ष तक सरकार क्यों न चलाते रहें, पर उनके बाद भी जो प्रधानमंत्री आएंगे उन्हें किसानों की समस्याओं को नए संदर्भों में हल करना पड़ेगा। इसलिए भी ये सवाल कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

कृषि अर्थशास्त्री और तीनों कानूनों के समर्थक प्रोफेसर अशोक गुलाटी ने संस्मरण सुनाया कि किसी ज़माने में वे महेंद्र सिंह टिकैत (राकेश टिकैत के पिता) के घर गए थे। वे अपने आप से ही यह पूछ रहे हैं कि किसान तो टिकैत के समय से ही इस तरह के कानून लाने के पक्ष में थे, लेकिन अब वे बदल कैसे गए? वे इसका उत्तर भी देते हैं कि आर्थिक परिवर्तन की प्रक्रिया लंबी, सलाह-मश्विरे के आधार पर चलने वाली होनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं होगा तो जिन्हें इस परिवर्तन से प्रभावित होना है, वे उसे मानने के लिए तैयार नहीं होंगे।

प्रोफेसर गुलाटी के इस अवलोकन से हमें एक सुराग मिलता है कि किसान प्रधानमंत्री को अपने हितों के पक्ष में अपनी नुमाइंदगी करते हुए अर्थव्यवस्था में नीतिगत हस्तक्षेप करते हुए देखना चाहते हैं। उन्हें लग रहा है कि प्रधानमंत्री ने तीन कृषि कानूनों के रूप में जो हस्तक्षेप किया, वह किसानों की बजाय कॉरपोरेट के पक्ष में जाता है और जो अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बंदोबस्त द्वारा थमाए गए नीतिगत पैकेज से संबंधित हैं। जैसे ही यह छवि बनती है, वैसे ही प्रधानमंत्री की कही गई हर बात का मतलब आंदोलनकारियों द्वारा नकारात्मक निकाला जाने लगता है। मसलन, तीन अध्यादेश जारी करने के कुछ दिन बाद ही उन्होंने इस आशय की बात कही थी कि एक युवक आएगा जो किसानों को खेती करने के बारे में बताएगा।

किसानों को खेती करने के नए बंदोबस्त के बारे में किसी विशेषज्ञ से जानकारी लेने में कोई ऐतराज नहीं रहा है। साठ और सत्तर के दशक में भी उन्होंने हरित क्रांति के नए पैकेज को विशेषज्ञों से सीखे थे। प्रधानमंत्री के वक्तव्य को अगर एक रूपक की तरह पढ़ें तो साफ हो जाता है कि अगर उन्होंने किसानों के साथ एक आत्मीय वार्तालाप के ज़रिये और तीनों अध्यादेशों को लाने से पहले यह बात कही होती तो इसका सकारात्मक अर्थग्रहण किया जाता।

लेकिन, सरकार ने पहले एक बड़ा फैसला किया, उसके ज़रिये किसानों का भविष्य तय कर दिया, और फिर किसानों को समझाने की मुहिम चलानी शुरू कर दी। सरकार का यह भी दावा है कि फैसला लेेने से पहले उसने सलाह-मश्विरे का दौर चलाया था। इसकी एक जानकारी बुज़ुर्ग किसान नेता बलबीर सिंह राजेवाल द्वारा दिए गए नीति आयोग की 2017 में हुई उस बैठक के ब्यौरे से मिलती है, जिसमें राजेवाल और एक-दो किसान नेताओं को भी बुलाया गया था।

बैठक में शामिल बाकी लोग या तो सरकारी विशेषज्ञ थे या कृषि के क्षेत्र में पूंजी लगाने को उत्सुक कॉरपोरेट जगत के प्रतिनिधि। बैठक चलती रही, लेकिन किसान नेता श्रोता बने बैठे रहे। उन्हें बोलने का मौका तब मिला जब उन्होंने बैठक का बायकाट करने की धमकी दी।

बैठक में कॉरपोरेट प्रतिनिधियों ने साफ कहा कि वे पूंजी लगाने के लिए तैयार हैं लेकिन सरकार को 50-50 हज़ार एकड़ के क्लस्टर बनाने की गारंटी करनी होगी, और यह भी सुनिश्चित करना होगा कि अपनी ही ज़मीन पर खेतिहर श्रम करने वाले किसान इन ज़मीन पर कॉरपोरेट योजना के मुताबिक होने वाली खेती पर कोई आपत्ति नहीं करेंगे। किसान कांट्रेक्ट फार्मिंग के खिलाफ नहीं हैं। पर नीति आयोग की इस बैठक से किसान नेताओं ने समझ बनाई कि कांट्रेक्ट फार्मिंग का जो प्रारूप उन्हें थमाया जाने वाला है, उसके तहत उनके हाथ में कुछ रह नहीं जाएगा।

असलियत यह है कि नीति आयोग की इस बैठक के बाद ही पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में काम कर रही किसान यूनियनों का माथा ठनक गया। उन्होंने सरकार के कदमों का पूर्वानुमान लगा कर बैठकें और पेशबंदी करनी शुरू कर दी। कोरोना काल में जब राजनीतिक गतिविधियों पर रोक लगी थी, सरकार तीन अध्यादेश लेकर आई।

पंजाब के किसान इसके खिलाफ जुलूस तो नहीं निकाल सकते थे, पर वे विरोध-स्वरूप अपनी छतों पर अध्यादेशों के खिलाफ तख्तियां लेकर खड़े हो गए। यह थी उस किसान आंदोलन की शुरुआत जो तकरीबन साल भर चला, और जिसने सरकार को संसद में पास हो चुके कानून को वापस लेने के लिए बाध्य कर दिया।

इसमें कोई शक नहीं कि चुनी हुई सरकार को फैसले लेने का अधिकार होता है, और उसे इसका उपयोग भी करना चाहिए। लेकिन, इससे पहले उसे फैसले के पीछे की नीयत का यकीन भी दिलाना होगा। मोदी सरकार ने किसानों को तरह-तरह की सब्सिडियां (जैसे किसान सम्मान योजना) देने की व्यवस्था की है। पर ये छोटी-छोटी सब्सिडियां उनकी आशंकाओं को ओझल नहीं कर सकतीं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)