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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:ओलिंपिक 2021 की सारी तैयारियां हो चुकी हैं और हर देश में प्रतियोगी लंबे समय से अभ्यास कर रहे हैं

एक महीने पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

टोक्यो में ओलिंपिक की सारी तैयारियां समय के पूर्व पूरी हो चुकी हैं। बार-बार मॉक ड्रिल भी हो रही है। यह देखा जा रहा है कि छोटी से छोटी चीज भी सही ठिकाने पर काम कर रही है या नहीं। हर देश में प्रतियोगी लंबे समय से अभ्यास कर रहे हैं। इस तरह के आयोजन में युद्ध की तरह खून नहीं बहाया जाता, परंतु पसीना बहाया जाता है। बाजार की ताकतें चीजें बेचने के लिए युद्ध प्रायोजित करती हैं। ओलिंपिक में पहले से ही वस्तुएं बेची जा रही हैं। इस तरह ओलिंपिक युद्ध का अहिंसा वाला स्वरूप सामने आता है।

खिलाड़ियों, टेलीविजन टीम और दर्शक वर्ग का मनपसंद भोजन बनाने के लिए प्रशिक्षित रसोइये महीनों पहले से काम कर रहे हैं। ऐसे उत्सव पर आतंकी हमले की आशंका बनी रहती है। आजकल आतंकवादी ताकतें देशों की सरहदों के भीतर हिंसा को अंजाम देने की ताक में रहती हैं। इन पर भी गुप्तचर, निगाह रखे हुए हैं। बहुत पहले ऐसे ही आयोजन में यहूदी खिलाड़ी मारे गए थे।

इजरायल ने काउंटर अटैक भी किया था। दूसरे विश्वयुद्ध के समाप्त होने पर इजरायल की स्थापना के लिए उस स्थान का असंवैधानिक गैर-मानवीय गठन किया गया था। इसी अतिक्रमण विरोध से आधुनिक आतंकवाद की शुरुआत हुई। शेखर कपूर की ‘फोर हॉर्सेस’ में इसका जिक्र मिलता है।

ज्ञातव्य है कि 1928 और 1932 में आयोजित खेल में भारत के ध्यानचंद ने विजय दिलाई थी। ध्यानचंद की प्रवीणता देखकर हिटलर के साथी ने ध्यानचंद के सामने प्रस्ताव रखा था कि वे जर्मन नागरिकता ले लें और भारत के लिए खेलना बंद दें। ध्यानचंद ने प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया था। उन्हें एक सुंदर महिला ने लुभाने का प्रयास भी किया, ध्यानचंद के कदम लड़खड़ाए, पर गिरे नहीं।

भारत हॉकी का स्वर्ण पदक जीत गया था। इस यथार्थ से प्रेरित काल्पनिक फिल्म ‘गोल्ड’ बनाई गई है। मनमोहन शेट्टी की पुत्री आरती के पास ध्यानचंद बायोपिक के अधिकार हैं परंतु कोई सितारा काम नहीं करना चाहता। रणबीर कपूर भी अधिक समय और परिश्रम लगने जैसे कारणों से तैयार नहीं हुए।

गौरतलब है कि एक फिल्मकार को ओलिंपिक कवर करने के लिए उपकरण दिए गए। उसने ‘ओलंपिया’ नामक डॉक्यू-ड्रामा बनाया। ओलिंपिया सिने कला का नमूना है परंतु इसे क्लासिक का दर्जा नहीं मिला। एक समर्पित पेंटर को खाकसार ने विचार दिया कि एक मानव आकृति बनाए। लेकिन, मांसपेशियों की जगह कैप्सूल और टैबलेट की आकृति बनाए और शिराओं में रक्त की जगह सिरप।

विचार दिए जाने के कारण अब वह अमूर्त चित्र नहीं बना सकता। ओलिंपिक से प्रेरित कथा फिल्में बनी हैं। उनमें ‘विंग्स ऑन फायर’ महत्वपूर्ण है। बेनहर की ‘चैरियट रेस’ काफी प्रभावोत्पादक मानी जाती है। पैरों में पंख लगाकर उड़ने वाले मिल्खा सिंह का बायोपिक ‘भाग मिल्खा भाग’ भी यादगार रही।

महिला हॉकी पर ‘चक दे इंडिया’, रानी मुखर्जी की ‘दिल बोले हडिप्पा’ में महिला को पुरुष रूप धरकर खेलना पड़ा। ओलिंपिक से प्रेरित कथा फिल्में बनाई जाएं तो उनके ज्यादा प्रचार की आवश्यकता नहीं होगी। ओलिंपिक के अमेरिकन दल में अधिकांश खिलाड़ी अश्वेत अमेरिकन हैं। मुकाबला, पीले रंग के चीनी खिलाड़ियों व अश्वेत अमेरिकन खिलाड़ियों के बीच होगा।