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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:कालाबाजारी का सारा व्यवसाय गुप्त सूचनाओं को जान लेने पर टिका हुआ है

6 महीने पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

अंग्रेजों ने भारत में एक प्रशासन तंत्र की स्थापना की थी। वो यह कि आला अफसर की वार्षिक रपट पर ही कर्मचारी का ग्रेड घटाया-बढ़ाया जाता था। अफसर इस नियम के हव्वे से कर्मचारी को अपने व्यक्तिगत गुलाम की तरह धमकाए रखते थे। इसके साथ ही अंग्रेजों ने गुप्तचर विभाग में कुछ लोगों को प्रार्थना स्थल पर हो रही बातचीत का लेखा-जोखा रखने का काम दिया था।

इन्हीं सूचनाओं के कारण 1857 के पहले किए जाने वाले प्रयास को विफल कर दिया। इसके साथ ही सोच-विचार करने वाले लोगों पर भी निगाह रखी जाती थी और उनके द्वारा की गई गैर इरादतन गलती का रिकार्ड भी उन्हें नियंत्रण में रखता था। सारांश यह है कि व्यवस्था भी ब्लैकमेल करती रही है।

भारत छोड़ने के पहले अंग्रेजों ने गुप्त सूचना के रजिस्टर लंदन भेज दिए थे। उन्हें उम्मीद थी कि व्यवस्था बनाए रखने में असफल रहने पर उन्हें पुनः आमंत्रित किया जा सकता है। उन्हें बुलाया तो नहीं गया, परंतु बांटकर शासन करने और गुप्त सूचनाओं के इस्तेमाल करने का तरीका हमेशा कायम रखा गया। स्वतंत्रता मिलने के दो दशक तक व्यवस्था बनी रही परंतु कालांतर में हमारी मूल आदतें खुलकर सामने आईं।

हाल ही में एक प्रदेश के आला अफसर ने एक मासूम नागरिक की पिटाई कर दी थी। मारते-पीटते रहना और क्षमा मांगते रहना भी उनकी एक अदा है। क्या वह सचमुच शर्मिंदा है? सच यह है कि ना वे पशेमान हैं और ना ही वे दुखी हैं। बहुत ढीठ और मोटी चमड़ी के लोग हैं। एक दौर में इंग्लैंड में एक वर्ग ऐसा था, जिसे वार्षिक खर्च मिलता था और उसे कोई काम नहीं करना पड़ता था। पी.जी वुडहाऊस ने इन्हीं से प्रेरित पात्रों की रचना की।

बर्टी वूस्टर इसी तरह का निठल्ला, मनमौजी व्यक्ति है। वह प्राय: गलती कर बैठता था और उसका सेवक जीवेस उसे संकट से बचाता था। हर वर्ग के लोगों के अपने क्लब थे, जिनके बीच श्रेष्ठता को लेकर आपसी प्रतिद्वंद्विता चलती रहती थी। उनके सेवकों का भी एक क्लब था, जिसमें गुप्त सूचनाओं का एक रजिस्टर रखा जाता था। हर सेवक अपने स्वामी की कमजोरियों और गलतियों को उसमें दर्ज करता था। जब बर्टी वूस्टर बुरी तरह फंस जाता था, तब सेवक जीवेस इसी रजिस्टर में दर्ज सूचना की मदद से उसे बचा लेता था।

स्वामिभक्त और समझदार लोगों ने मालिक को हर कालखंड में संकट से बचाया है। इस परंपरा का प्रारंभ हनुमान जी से हुआ था। आज तो गुलामी और अंधभक्ति का नया मॉडल विकसित किया गया है। कारपोरेट कंपनी अपने जासूस प्रतिद्वंद्वी की कंपनी पर निगाह रखने के लिए नियुक्त करते थे।

इसका सबसे कारगर तरीका यह था कि अपने आदमी को प्रतियोगी की कंपनी में नौकरी दिला दो, इस तरह के लोगों को दो जगह से वेतन मिलता है। मधुर भंडारकर की बिपाशा बसु अभिनीत फिल्म ‘कारपोरेट’ में इसी तरह की बात प्रस्तुत की गई थी।

विकासशील देशों के अर्थ तंत्र को तोड़ने के लिए भी लोग भेजे जाते हैं। इसी तरह के काम में लगे एक व्यक्ति की आत्मकथा ‘द इकोनॉमिक हिटमैन’ प्रकाशित हुई थी। वे अफसरों और नेताओं से संबंध बनाते हैं। नेता के घर कर्मचारी को भी जासूसी के काम में लगा देते हैं। गोपनीय बजट के बारे में घोषणा से पहले जानकारी के आधार पर बाजार खूब लाभ कमाता है।

कालाबाजारी का सारा व्यवसाय गुप्त सूचनाओं को जान लेने पर टिका हुआ है। तानाशाह हिटलर के तंत्र में तो भाई ही भाई पर निगाह रखता था। सारे रिश्तों को उग्र राष्ट्रवाद के नाम पर तोड़ दिया गया था। इस तरह के लोग हर कालखंड में नए नाम रखकर अपना काम करते हैं। जयचंद का भविष्य फलता-फूलता है। विभीषण ने तो अवाम के हित में राम को सूचना दी थी। बहरहाल दवाओं की खोज करने के क्षेत्र में कोई जासूस नहीं होता।