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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:योग्यता को बर्बाद करने में जिन दुर्गुणों की भूमिका, उनमें अहंकार सबसे ऊपर

4 महीने पहले
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पं. विजयशंकर मेहता - Dainik Bhaskar
पं. विजयशंकर मेहता

किसी की योग्यता को बर्बाद करने में जिन-जिन दुर्गुणों की भूमिका होती है, उनमें अहंकार सबसे ऊपर है। रावण मरते-मरते भी कुछ गज़ब कर गया था, लेकिन युद्ध मैदान में अब जो घटना हुई, उसे देखकर तो सब चकित हो गए। इस दृश्य पर तुलसीदासजी ने लिखा- ‘तासु तेज समान प्रभु आनन। हरषे देखि संभु चतुरानन।’

मरते ही रावण का तेज श्रीराम के मुख में समा गया और यह देखकर शंकरजी व ब्रह्माजी हर्षित हो गए। यहां आश्चर्य की बात यह थी कि रावण का तेज रामजी ने अपने मुंह में ग्रहण कर लिया। यही उनके व्यक्तित्व की विशेषता थी। राम कहते हैं मैं योग्यता का मान करता हूं। रावण जैसा भी था, इसके भीतर तेज तो था। जीते-जी तो मैं उसका मान कर नहीं सकता था, क्योंकि यह अपने तेज को गलत दिशा दे चुका था। तो मैंने मरने के बाद इसे मान दिया।

रावण जैसे अहंकारी लोग अपनी योग्यता का ऐसा ही दुरुपयोग करते हैं। बर्नाड शॉ कहा करते थे अहंकारी व्यक्ति कहता है स्वर्ग भी मिले तो मैं दो नंबर पर रहना नहीं चाहूंगा और यदि एक नंबर यानी शीर्ष मिले तो नर्क में भी रहने को तैयार हूं। रावण की घोषणाएं कुछ इसी तरह की थीं। हमें सबक लेना चाहिए कि हमारी योग्यता को सम्मान देने के लिए परमात्मा सदैव तैयार है, गड़बड़ हमारी ओर से ही होती है और हम उस मान से चूक जाते हैं।