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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:कलाकार बैंक बैलेंस या पुरस्कार से नहीं जाना जाता, उसकी यादगार फिल्में ही सिनेमा इतिहास में उसका स्थान तय करती हैं

7 महीने पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

आजकल एक्ट्रेस प्रियंका चोपड़ा, विज्ञान फंतासी ‘द मैट्रिक्स 4’ की शूटिंग कर रही हैं। ‘द मैट्रिक्स’ श्रृंखला, भविष्य में मशीन द्वारा मनुष्य पर राज करने की आशंका का दार्शनिक पक्ष रखती है। मतलब, मानव मस्तिष्क का मशीनीकरण हो जाएगा। आजकल अधिकतर लोग साधारण सा जोड़ या गुणा-भाग, कैलकुलेटर की सहायता से करते हैं। प्रश्नों के जवाब गूगल पर खोजे जाते हैं। मैट्रिक्स मायाजाल में यथार्थ को दो हिस्सों में बांट दिया गया है। संसार में परम यथार्थ कुछ नहीं है।

अरसा पहले एक कंपनी ने विज्ञापन दिया कि मोटी रकम जमा करने पर वे ग्राहक को अंतरिक्ष की यात्रा करवाएंगे। उन्होंने अपने स्टूडियो में अंतरिक्ष का वातावरण बनाया। ग्राहक की आंख पर पट्टी बांधकर कुछ दृश्य उनके अवचेतन में रोपित किए गए जिसमें ध्वनि और दृश्य भरे गए। इस व्यापार की सफलता, ग्राहक के यकीन करने की क्षमता पर आधारित थी। अवाम के यकीन करने के माद्दे को राजनीति में जमकर इस्तेमाल किया जा रहा है। यथार्थ कुछ इतना भयावह है कि ग्राहक स्वेच्छा से वैकल्पिक संसार में यकीन कर रहा है।

अवाम को सपने खरीदना पसंद है। मनुष्य के डर की कोई सीमा नहीं है। डर का हव्वा, यथार्थ के डर से बड़ा होता है। सारे निजाम, खौफ की बुनियाद पर ही कायम हैं। विष्णु खरे की कविता ‘दज्जाल’ में अवाम को यकीन दिलाया जाता है कि उसका उदय मनुष्य को कष्टों से बचाने के लिए ही हुआ है। ‘दज्जाल’ दिवास्वप्न रचता है। उसकी सारी लुभावनी बातें केवल मनुष्य पर पूरा नियंत्रण करने के लिए एक विराट छलावा मात्र हैं। मैट्रिक्स मायाजाल भी कुछ ऐसा ही है।

गौरतलब है कि मनुष्य ने ऊर्जा पाने के लिए मशीन का निर्माण किया और इस मशीनीकरण ने सारी सत्ता अपने हाथ में ले ली। विश्व विजय की कामनाएं प्राय: विनाश लाती हैं। सबसे बड़ा संघर्ष तो स्वयं को समझना है। व्यक्तित्व पर पड़े परदे हटाते-हटाते ही उम्र गुजर जाती है। दरअसल, विज्ञान फंतासी दार्शनिक बात को रोचक बना कर प्रस्तुत करती है। स्टीवन स्पीलबर्ग की सारी विज्ञान फंतासी कृतियों में कोई न कोई दार्शनिक बात अभिव्यक्त हुई है।

बहरहाल, प्रियंका चोपड़ा हॉलीवुड में प्रथम श्रेणी की सितारा तो नहीं हैं परंतु उन्होंने हॉलीवुड के जंगल में एक घोंसला जरूर बनाया है। उन्हें प्राय: प्रस्ताव मिलते रहते हैं। सार्थक सिनेमा के प्रति भी उनके मन में आग्रह-उत्साह है। फिल्म उद्योग में प्रियंका चोपड़ा को कभी किसी दल या विभाग का सदस्य नहीं माना गया। वे स्वयं के प्रयास और प्रतिभा में सफल रही हैं। मुंबई के मध्यम आय वर्ग के वर्सोवा में किराए के मकान में रहने वाली प्रियंका का अमेरिका के श्रेष्ठि वर्ग के रिहायशी क्षेत्र में सबसे ऊपरी मंजिल पर फ्लैट है। इस ऊंचाई पर निवास होते हुए भी उनके पैर जमीनी हकीकत पर टिके रहते हैं।

अनुराग बसु की रणबीर कपूर अभिनीत फिल्म ‘बर्फी’ के प्रारंभिक भाग में यकीन करना कठिन था कि क्या वे ग्लैमरस प्रियंका चोपड़ा ही हैं? ‘बर्फी’ उनकी यादगार फिल्म है। उन्होंने अपने कॅरिअर के दौरान कई फिल्मों में विविध भूमिकाएं की हैं और पुरस्कार भी जीते हैं। यह उनकी लगन, अनुशासन और परिश्रम के पुरस्कार हैं। ‘द मैट्रिक्स 4’ मल्टीस्टारर फिल्म है परंतु प्रियंका की भूमिका उसमें अत्यंत महत्वपूर्ण है। गोयाकि क्या मनुष्य सचमुच मशीन से संचालित होगा? मनुष्य सबसे विलक्षण रचना है।

कलाकार बैंक बैलेंस या पुरस्कार से नहीं जाना जाता। उसकी यादगार फिल्में ही सिनेमा इतिहास में उसका स्थान तय करती हैं। प्रियंका चोपड़ा ने कभी अपनी राजनीतिक विचारधारा पर कोई बयान नहीं दिया। क्या वे सचमुच तटस्थ हैं? पूरब-पश्चिम की फिल्मों में अभिनय करने वाली प्रियंका उदारवादी विचार की हो सकती हैं। उनका पासपोर्ट उनकी बैंक चेक बुक से बड़े आकार का है। गोयाकि प्रियंका विश्व नागरिक हैं।

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